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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् पुष्कलं प्राग्भवायातं बोधित्रितयमुत्तमम् । तस्य प्रज्ञागुणाः केऽन्ये वर्णनीयाः मनीषिभिः॥ ४०॥ न वाच्यः पृथगुत्साहो यद्ययं हन्तुमीहते । मोहशत्रुसशेषाघ खलं रैलोक्यकण्टकम् ॥४१॥ उद्मेऽपि प्रतापोऽस्य माध्यन्दिनदिनाधिपम् । निःप्रतापं करोत्यय तमन्यः सहते नु कः ॥४२॥ लिलयिषवोऽन्योन्यं वर्द्धन्तेऽस्याखिला गुणाः। समानं वर्द्धमानानां स्पर्धा केन 'निषिध्यते ॥४३॥ एवं संसारसारोरुविसरनोगभागिनः। उप्रान्तबोधदिनाधीशप्रोद्मोदयभूभृतः ॥ ४५ ॥ खचतुष्केन्द्रियवग्निमितपूर्वेषु निष्ठिते । राज्यकाले जगद्भतरष्टपूर्वागशेषतः ॥ १५॥ प्रादुर्भूतक्षणप्रान्तविनश्यत्सौधविभ्रमे । गन्धर्वनगरे साक्षाद्याते सातबोधिकः ॥ ४६॥ अवश्यं भङ्गरा भोगा भक्षयन्स्यत्र मां स्थितम् । न पातयति किं स्वस्थं भङ्गरो विटपः स्फुटम् ॥ ७ ॥ तनुर्मयेप्सितैः सर्वैः स्वीकृतापि त्यजेद्ध्वम् । प्रायः पण्याङ्गनेवेति विरक्तः स तनावभूत् ॥४८॥ सत्यायुषि मृतिस्तस्मिन्नसत्यत्रास्ति सापि न । बिभेति चेन्मृतेस्तेन भेतव्यं पूर्वमायुषः ॥ ४९ ॥ गन्धर्वनगरेणैव संवादः सर्वसम्पदाम् । विधाय्यभ्रविलायित्वविधेरपधियामपि ॥ ५० ॥ इत्यपश्यदैवैनमानचुरमरद्विजाः । सुरैः सम्प्राप्तनिष्कान्तिकल्याणः शमितेन्द्रियः ॥५१॥ हस्तचित्राख्ययानाधिरूढोऽग्रोद्यानमागतः। माघे सिते ४स्वगर्भः द्वादश्यामपरागः॥५२॥ दीक्षां षष्ठोपवासेन जैनी जग्राह राजभिः । सहस्रसङ्ख्यैविख्यातैस्तदाप्तज्ञानतुर्यकः ॥ ५३ ॥ ही उनकी सेवा करनेके लिए देवोंके आसन कम्पायमान क्यों होते ? ॥ ३६॥ उनका उत्तम रत्नत्रय प्रचुर मात्रामें पूर्वभवसे साथ आया था तथा अन्य गुणोंकी क्या बात ? उनकी बुद्धिके गुण भी विद्वानोंके द्वारा वर्णनीय थे॥४०॥ उनके उत्साह गुणका वर्णन अलगसे तो करना ही नहीं चाहिये क्योंकि वे तीनों लोकोंके कण्टक स्वरूप मोह शत्रुको अन्य समस्त पापोंके साथ नष्ट करना ही चाहते थे ॥४१॥ जन्मके समय भी उनका प्रताप ऐसा था कि दोपहरके सूर्यको भी प्रतापरहित करता था फिर इस समय उसे दूसरा सह ही कौन सकता था ? ॥४२॥ इनके गुण इस प्रकार बढ़ रहे थे मानो परस्परमें एक दूसरेका उल्लंघन ही करना चाहते हों। सो ठीक है क्योंकि एक साथ बढ़नेवालोंकी ईर्ष्याको कौन रोक सकता है ? ॥४३॥ इस प्रकार संसारके श्रेष्ठतम विशाल भोगोंके समूहका उपभोग करनेवाले भगवान् अभिनन्दननाथ केवलज्ञान-रूपी सूर्यका उदय होनेके लिए उदयाचलके समान थे ।। ४४ । जब उनके राज्यकालके साढ़े छत्तीस लाख पूर्व बीत गये और आयके आठ पूर्वाङ्ग शेष रहे तब वे एक दिन आकाशमें मेघोंकीशोभा देख रहे थे कि उन मेघोंमें प्रथम तो एक सुन्दर महलका आकार प्रकट हुआ परन्तु थोड़े ही देरमें वह नष्ट हो गया। इस घटनासे उन्हें आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया। वे सोचने लगे कि ये विनाशीक भोग इस संसारमें रहते हुए मुझे अवश्य ही नष्ट कर देंगे। क्या टूटकर गिरनेवाली शाखा अपने ऊपर स्थित मनुष्यको नीचे नहीं गिरा देती ? ॥४५॥ यद्यपि मैंने इस शरीरको सभी मनोरथों अथवा समस्त इष्ट पदार्थोंसे परिपुष्ट किया है तो भी यह निश्चित है कि वेश्याके समान यह मुझे छोड़ देगा। इस तरह विचार कर वे शरीरसे विरक्त हो गये ।। ४६-४८ ॥ उन्होंने यह भी विचार किया कि आयुके रहते हुए मरण होता है, आयुके न रहने पर मरण नहीं होता। इसलिए जो मरणसे डरते हैं उन्हें सबसे पहिले अायुसे डरना चाहिये ॥४६॥ समस्त सम्पदाओंका हाल गन्धर्वनगरके ही समान है अर्थात जिस प्रकार यह मेघोंका बना गन्धर्वनगर देखते-देखते नष्ट हो गया उसी प्रकार संसारकी समस्त सम्पदाएं भी नष्ट हो हैं यह बात विद्वानोंकी कौन कहे मूर्ख भी जानते हैं ।। ५०॥ जिस समय भगवान् ऐसा विचार कर रहे थे उसी समय लौकान्तिक देवोंने आकर उनकी पूजा की। देवोंने भगवान्का निष्क्रमणकल्याणक किया। तदनन्तर जितेन्द्रिय भगवान् हस्तचित्रा नामकी पालकी पर आरूढ़ होकर अग्रउद्यानमें आये। वहाँ उन्होंने माघ शुक्ल द्वादशीके दिन शामके समय अपने जन्म नक्षत्रका उदय १ जन्मकालेऽपि । २ निष्ध्यते क०, ख०, घ० । सर्व किम् निषेध्यते (१) ग० । ३ प्रान्ते बोध ल । ४ स्वगर्भनक्षत्रे। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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