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________________ चतुःसप्ततितम पर्व विधाय हृदि योगीन्द्रयुग्मं भकिभराहितः । मुहः प्रदक्षिणीकृत्य प्रप्रणम्य मृगाधिपः ॥ २०७॥ तत्वश्रद्धानमासाद्य सद्यः कालादिलब्धितः । प्रणिधाय मनःश्रावकवतानि समाददे ॥ २०८॥ दया मुनिगिरास्यन्ती क्रूरतां तन्मनोऽविशत् । कालस्य बलमप्राप्य को विपक्षं निरस्यति ॥ २०९ ॥ स्थिररौद्ररसः सद्यः स शर्म समधारयत् । यच्छैलूषसमो मोहक्षयोपशमभावतः ॥ २१॥ व्रत नैतस्य सामान्यं निराहारं यतो विना। क्रव्यादन्यस्य नाहारः साहसं किमतः परम् ॥ २११॥ व्रतं प्राणव्ययात्तेन यन्नियंढमखण्डितम् । ततोऽभूत्फलितं शौर्य प्राच्य तस्यैव घातकम् ॥ २१२॥ तमस्तमाप्रभायाञ्च खलु सम्यक्त्वमादिमम् । निसर्गादेव गृहन्ति तस्मादस्मिन विस्मयः ॥ २१३ ॥ निरुद्धसर्वदुर्वृचः सर्वसद्वत्तसंमुखः । प्रावर्तत चिरं धीरः समीप्सुः परमं पदम् ॥ २१४॥ संयमासंयमावं तिरश्चां नेति सूनृते। रुद्धस्तेनान्यथा मोक्तेस्युक्तेरासीत्स गोचरः ।। २१५॥ तच्छौर्य क्रौर्यसन्दीप्यं किल सम्प्रति सङ्क्षयम् । कलधौतमिवातप्तं निक्षिप्तं शीतलेऽम्भसि ॥ २१६ ॥ स्वार्थ मृगारिशब्दोऽसौ जहौ तस्मिन् दयावति । प्रायेण स्वामिशीलत्वं संश्रितानां 'प्रवर्तते ॥ २१७॥ "लिखितो वा सजीवाना वपुषैव न चेतसा । अभयाय तथा शान्तो दयामाहात्म्यमीदशम् ॥ २१८ ॥ एवं व्रतेन सन्न्यस्य समाहितमतिय॑सुः । सद्यः सौधर्मकल्पेऽसौ सिंहकेतुः सुरोऽजनि ॥ २१९ ॥ ततो द्विसागरायुष्को निर्विष्टामरसौख्यकः। निष्कम्य धातकीखण्डपूर्वमन्दरपूर्वगे ॥ २२० ॥ स्थिर रहना चाहता है तो आप्त आगम और पदार्थों की श्रद्धा धारण कर ।। २०६॥ ___इस प्रकार उस सिंहने मुनिराजके वचन हृदयमें धारण किये तथा उन दोनों मुनिराजोंकी भक्तिके भारसे नम्र होकर बार-बार प्रदक्षिणाएँ दी. बार-बार प्रणाम किया, काल आदि लब्धियोंके मिल जानसे शीघ्र ही तत्त्वश्रद्धान धारण किया औरमन स्थिर कर श्रावकके व्रत ग्रहण किये ।।२०७२०८ ॥ मुनिराजके वचनोंसे क्रूरता दूरकर दयाने सिंहके मनमें प्रवेश किया सो ठीक ही है क्योंकि कालका बल प्राप्त किये विना ऐसा कौन है जो शत्रुको दर हटा सकता है ? ॥२०६॥ मोहनीय कर्मका क्षयोपशम होनेसे उस सिंहका रौद्र रस स्थिर हो गया और उसने नटकी भाँति शीघ्र ही शान्तरस धारण कर लिया॥२१०॥ निराहार रहनेके सिवाय उस सिंहने और कोई सामान्य व्रत धारण नहीं किया क्योंकि मांसके सिवाय उसका और आहार नहीं था। आचार्य कहते हैं कि इससे बढ़कर और साहस क्या हो सकता है ? ॥ २११ ॥ प्राण नष्ट होनेपर भी चूँ कि उसने अपने व्रतका अखण्ड रूपसे पालन किया था इससे जान पड़ता था कि उसकी शूरवीरता सफल हुई थी और उसकी वह पुरानी शूरता उसीका घात करनेवाली हुई थी ॥२१२॥ तमस्तमःप्रभा नामक सातवें नरकके नारकी उपशम सम्यग्दर्शनको स्वभावसे ही ग्रहण कर लेते हैं इसलिए सिंहके सम्यग्दर्शन ग्रहण करने में आश्चर्य नहीं है ।।२१३ ॥ परमपदकी इच्छा करनेवाला वह धीरवीर, सब दुराचारोंको छोड़कर सब सदाचारोंके सन्मुख होता हुआ चिरकाल तक निराहार रहा ॥ २१४॥ 'तियश्चोंके संयमासंयमके आगेके व्रत नहीं होते ऐसा आगममें कहा गया है इसी लिए वह रुक गया था अन्यथा अवश्य ही मोक्ष प्राप्त करता' वह इस कहावतका विषय हो रहा था॥ २१५ ॥ जिस प्रकार अनिमें तपाया हुआ सुवर्ण शीतल जलमें डालनेसे ठंडा हो जाता है उसी प्रकार करतासे बढ़ी हुई उसकी शूरवीरता उस समय बिल्कुल नष्ट हो गई थी ॥२१६ ॥ दयाको धारण करनेवाले उस सिंहमें मृगारि शब्दने अपनी सार्थकता छोड़ दी थी अर्थात् अब वह मृगोंका शत्रु नहीं रहा था सो ठीक ही है क्योंकि आश्रित रहनेवाले मनुष्योंका स्वभाव प्रायः स्वामीके समान ही हो जाता है ॥ २१७ ॥ वह सिंह सब जीवोंके लिए केवल शरीरते ही चित्रलिखितके समान नहीं जान पड़ता था किन्तु चित्तसे भी वह इतना शान्त हो चुका था कि उससे किसीको भी भय उत्पन्न नहीं होता था सो ठीक ही है क्योंकि दयाका माहात्म्य ही ऐसा है॥ २१८ ।। इस प्रकार व्रत सहित संन्यास धारण कर वह एकाग्रचित्तसे मरा और शीघ्र ही सौधर्म स्वर्गमें सिंहकेतु नामका देव हुआ ॥ २१६ ॥ वहाँ उसने दो सागरकी १ प्रवर्तितम् प० । २ लिखितः सोऽन्यजीवानां क०,म.३ द्विसागरायुष्यः ल.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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