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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् प्रत्यागत्य साकेते कपिल ब्राह्मणप्रभोः । काल्याश्च तनयो जज्ञे जटिलो नाम वेदवित् ॥ ६८ ॥ परिब्राजकमार्गस्थस्तन्मार्गं सम्प्रकाशयन् । पूर्ववत्सुचिरं मृत्वा सौधर्मेऽभूत्सुरः पुनः ॥ ६९ ॥ द्विसमुद्रोपमं कालं तत्र भुक्त्वोचितं सुखम् । प्रान्ते ततः समागत्य भरतेऽस्मिन्पुरोत्तमे ॥ ७० ॥ स्थूणागाराभिधानेऽभूद्भारद्वाजद्विजस्य सः । तनूजः पुष्पदत्तायां पुष्य मिश्राह्वयः पुनः ॥ ७१ ॥ स्वीकृत्य प्राक्तनं वेषं प्रकृत्यादिप्ररूपितम् । पञ्चविंशतिदुस्तस्वं मूढानां मतिमानयत् ॥ ७२ ॥ निष्कषायतया बद्ध्वा देवायुरभवत्सुरः । सौधर्मकल्पे तत्सौख्यमेकवार्व्युपमायुषा ॥ ७३ ॥ भुक्त्वा ततः समागत्य भरते 'सूतिकाह्वये । पुरेऽग्निभूतेर्गौतम्यामभूदनिसहः सुतः ॥ ७४ ॥ परिब्राजकदीक्षायां नीत्वा कालं सपूर्ववत् । सनत्कुमार कल्पेऽल्पं देवभूयं प्रपन्नवान् ॥ ७५ ॥ सप्ताब्ध्युपमितायुष्को भुक्त्वा तत्रामरं सुखम् | आयुषोऽन्ते ततश्च्युत्वा विषयेऽस्मिन् पुरेऽभवत ॥ ७६ ॥ मन्दिराख्येऽग्निमित्राख्यो गौतमस्य तनूद्भवः । * कौशिक्यां दुःश्रुतेः पारं गत्वागत्य पुरातनीम् ॥ ७७ ॥ दीक्षां माहेन्द्रमभ्येत्य ततश्च्युत्वा पुरातने । मन्दिराख्यपुरे शालङ्कायनस्य सुतोऽभवत् ॥ ७८ ॥ मन्दिरायां जगख्यातो भारद्वाजसमाह्वयः । त्रिदण्डमण्डितां दीक्षामक्षूणां च समाचरन् ॥ ७९ ॥ सप्ताब्ध्युपमितायुः सन् कल्पे माहेन्द्रनामनि । भूत्वा ततोऽवतीर्यात्र दुर्मार्गप्रकटीकृतेः ॥ ८० ॥ फलेनाधोगतीः सर्वाः प्रविश्य गुरुदुःखभाक् । श्रसस्थावरवर्गेषु सङ्ख्यातीतसमाश्विरम् ॥ ८१ ॥ परिभ्रम्य परिश्रान्तस्तदन्ते मगधाह्वये । देशे राजगृहे जातः सुतोऽस्मिन्वेदवेदिनः ॥ ८२ ॥ शाण्डिलाख्यस्य : मुख्यस्य पारशयां स्वसन्ज्ञया । स्थावरो वेदवेदाङ्गपारगः पापभाजनम् ॥ ८३ ॥ मतिः श्रुतं तपः शान्तिः समाधिस्तत्त्ववीक्षणम् । सर्वं सम्यक्त्वशून्यस्व मरीचेरिव निष्फलम् ॥ ८४ ॥ आयुवाला देव हुआ। वहाँ से च्युत हुआ और अयोध्या नगरीमें कपिल नामक ब्राह्मणकी काली नामकी स्त्रीसे वेदोंको जाननेत्राला जटिल नामका पुत्र हुआ ।। ६७-६८ ।। परिव्राजकके मत में स्थित होकर उसने पहले की तरह चिरकाल तक उसीके मार्गका उपदेश दिया और मरकर सौधर्म स्वर्ग में देव हुआ। दो सागर तक वहाँ के सुख भोगकर आयुके अन्तमें वह वहाँ से च्युत हुआ और इसी भरत क्षेत्रके स्थूणागार नामक श्रेष्ठ नगर में भारद्वाज नामक ब्राह्मणकी पुष्पदत्ता स्त्रीसे पुष्यमित्र नामका पुत्र उत्पन्न हुआ ।। ६६-७१ ॥ उसने वही पहला पारिव्राजकका वेष धारणकर प्रकृति आदिके द्वारा निरूपित पच्चीस मिध्यातत्त्व मूर्ख मनुष्योंकी बुद्धिमें प्राप्त कराये अर्थात् मूर्ख मनुष्यों की पच्चीस तत्त्वोंका उपदेश दिया। यह सब होनेपर भी उसकी कषाय मन्द थी अतः देवायुका बन्धकर सौधर्म स्वर्ग में एक सागरकी आयुवाला देव हुआ ।। ७२-७३ ।। वहाँ के सुख भोगकर वहाँ से आया और इसी भरत क्षेत्र सूतिका नामक गाँव में अभिभूति नामक ब्राह्मणकी गौतमी नामकी स्त्रीसे अभिसह नामका पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ७४ ॥ वहाँ भी उसने परिव्राजककी दीक्षा लेकर पहले के समान ही अपनी आयु बिताई और आयुके अन्त में मरकर देवपदको प्राप्त हुआ। वहाँ सात सागर प्रमाण उसकी आयु थी । देवोंके सुख भोगकर आयुके अन्त में वह वहाँ से च्युत हुआ और इसी भरत क्षेत्र के मंदिर नामक गाँव में गौतम ब्राह्मणकी कौशिकी नामकी ब्राह्मणी से अमिमित्र नामका पुत्र हुआ। वहाँपर भी उसने वही पुरानी परिव्राजककी दीक्षा धारणकर मिथ्याशास्त्रों का पूर्णज्ञान प्राप्त किया। अबकी बार वह माहेन्द्र स्वर्ग में देव हुआ, फिर वहाँ से च्युत होकर उसी मंदिर नामक नगर में शालङ्कायन ब्राह्मणकी मंदिरा नामकी भारद्वाज नामका जगत्प्रसिद्ध पुत्र हुआ और वहाँ उसने त्रिदण्डसे सुशोभित अखण्ड दीक्षाका आचरण किया । तदनन्तर वह माहेद्र स्वर्ग में सात सागरकी आयु वाला देव हुआ। फिर वहाँ से च्युत होकर कुमार्ग प्रकट करनेके फलस्वरूप समस्त अधोगतियोंमें जन्म लेकर उसने भारी दुःख भोगे । इस प्रकार त्रस स्थावर योनियों में असंख्यात वर्ष तक परिभ्रमण करता हुआ बहुत ही श्रान्त हो गया - खेद खिन्न हो गया । तदनन्तर आयुका अन्त होनेपर मगधदेशके इसी राजगृह नगर में वेदोंके जानने वाले शाण्डिल्य नामक ब्राह्मणकी पारशरी नामकी स्त्रीसे स्थावर नामका पुत्र हुआ। वह वेद वेदाङ्गका पारगामी था, साथ ही अनेक पापोंका पात्र भी था ।। ७५-८३ ।। वह सम्यग्दर्शनसे शून्य १ वेतिकाइये इत्यपि कचित्। २ कौशाम्ब्यां ल० । ३ विप्रस्य घ० । मुखे भवो मुख्यो विप्रस्तस्य । ४४८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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