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________________ चतुःसप्ततितमं पर्व स्वयं गृहीतुमारब्धः फलं प्रावरणादिकम् । इष्ट्रातं देवता नार्य क्रमो नैन्थ्यधारिणाम् ॥ ५४ ॥ गृहाण वेषमन्यं त्वं यथेष्टमिति चाब्रुवन् । श्रुत्वा तद्वचनं सोऽपि गाढमिथ्यात्वचोदितः ॥ ५५ ॥ परिव्राजकदीक्षायाः प्राथम्यं प्रत्यपद्यत । दीर्घाजवजवानां तत्कर्म दुर्मार्गदेशनम्'। ५६ ॥ तच्छास्त्रचुञ्चताप्यस्य स्वयमेव किलाजनि । सतामिवासतां च स्याद्वोधः स्वविषये स्वयम् ॥ ५७ ।। श्रुत्वापि तीर्थकृद्वाचं सद्धर्म नाग्रहीदसौ। पुर्यथात्मनैवात्र सर्वसङ्गविमोचनात् ॥ ५८ ॥ भुवनत्रयसंक्षोभ कारिसामर्थ्यमाप्तवान् । मदुपज्ञं तथा लोके व्यवस्थाप्य मतान्तरम् ॥ ५९ ॥ अहञ्च तलिमिचोरुप्रभावात्रिदिवप्रभोः। प्रतीक्षा प्राप्तमिच्छामि तन्मेऽवश्यं भविष्यति ॥ ६॥ इति मानोदयात्पापी न व्यरंसीच्च दुर्मतात् । तमेव वेषमादाय तस्थिवान् दोषदूषितः ॥ ६ ॥ त्रिदण्डधारकोऽप्येष सहण्डपरिवर्जितः । प्राप्ता कुराजवद्दण्डान् बहुव्रत्नप्रभादिषु ॥ १२॥ सम्यग्ज्ञानविहीनत्वात्सकमण्डलुरप्यसौ । अशौचवृत्तिरेवासीजलैः किं शुद्धिरात्मनः ।। ६३ ॥ प्रातः शीतजलस्नानात्कन्दमूलफलाशनात् । परिग्रहपरित्यागात्कुर्वन्प्रख्यातिमात्मनः ॥ ६४॥ महेन्द्रजालकानीतचन्द्राम्भिोधिसन्निभम् । तत्त्वाभासमिदं तत्त्वमिति सन्दष्टमात्मना ॥६५॥ कपिलादिस्वशिष्याणां यथार्थ प्रतिपादयन् । सूनुर्भरतराजस्य धरित्र्या चिरमचमत् ॥६६॥ स जीवितान्ते सम्भूय ब्रह्मकल्पेऽमृताशनः । दशाब्ध्युपमदेवायुरनुभूय सुखं ततः ॥६७ ॥ आदि परीषह भी सहे परन्तु संसार-वासकी दीर्घताके कारण पीछे चलकर वह उन्हें सहन करनेके लिए असमर्थ हो गया इसलिए स्वयं ही फल तथा वस्त्रादि ग्रहण करनेके लिए उद्यत हुआ। यह देख वन-देवताओंने कहा कि निर्ग्रन्थ वेष धारण करनेवाले मुनियोंका यह क्रम नहीं है। यदि तुम्हें ऐसी ही प्रवृत्ति करना है तो इच्छानुसार दूसरा वेष ग्रहण कर लो । वन-देवताओंके उक्त वचन सुनकर प्रबल मिथ्यात्वसे प्रेरित हुए मरीचिने भी सबसे पहले परिव्राजककी दीक्षा धारण कर ली सो ठीक ही है क्योंकि जिनका संसार दीर्घ होता है उनके लिए वह मिथ्यात्व कर्म मिथ्यामार्ग ही दिखलाता है ।। ५२-५६ ।। उस समय उसे परिव्राजकोंके शास्त्रका ज्ञान भी स्वयं ही प्रकट हो गया था सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंके समान दुर्जनोंको भी अपने विषयका ज्ञान स्वयं हो जाता है ॥ ५७ ।। उसने तीर्थंकर भगवान्की दिव्यध्वनि सुनकर भी समीचीन धर्म ग्रहण नहीं किया था। वह सोचता रहता था कि जिस प्रकार भगवान् वृषभदेवने अपने आप समस्त परिग्रहोंका त्याग कर तीनों लोकोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाली सामर्थ्य प्राप्त की है उसी प्रकार मैं भी संसारमें अपने द्वारा चलाये हुए दूसरे मतकी व्यवस्था करूँगा और उसके निमित्तसे होनेवाले बड़े भारी प्रभावके कारण इन्द्रकी प्रतीक्षा प्राप्त करूँगा-इन्द्र द्वारा की हुई पूजा प्राप्त करूँगा । मैं इच्छा करता हूं कि मेरे यह सब अवश्य होगा ॥५८-६० ॥ इस प्रकार मानकर्मके उदयसे वह पापी खोटे मतसे विरत नहीं हुआ और अनेक दोषोंसे दूषित होनेपर भी दही वेष धारण कर रहने लगा ॥ ६१ ।। यद्यपि वह तीन दण्ड रखता था परतु समीचीन दण्डसे रहित था अथोत् इन्द्रिय दमन रूपी समीचीन दण्ड उसके पास नहीं था। जिस प्रकार खोटा राजा अनेक प्रकारके दण्डोंको, सजाओंको पाता है उसी प्रकार वह भी रत्नप्रभा आदि पृथिवियोंमें अनेक प्रकारके दण्डोंको पानेवाला था॥६२ ॥ वह सम्यग्ज्ञानसे रहित था अतः कमण्डल सहित होनेपर भी शौच जानेके बाद शुद्धि नहीं करता था और कहता था कि क्या जलसे आत्माकी शुद्धि होती है ॥६३॥ वह यद्यपि प्रातःकाल शीतल जलसे स्नान करता था और कन्दमूल तथा फलोंका भोजन करता था फिर भी परिग्रहका त्याग बतलाकर अपनी प्रसिद्धि करताथा. लोगोंमें इस बातकी घोषणा करता था कि मैं परिग्रहका त्यागी हूँ ॥६४|| जिस प्रकार इन्द्रजालियाके द्वारा लाये हुए सूर्य चन्द्रमा तथा समुद्र अवास्तविक होते हैं-आभास मात्र होते हैं उसी प्रकार उसके द्वारा देखे हुए तत्त्व अवास्तविक थे-तत्त्वाभास थे॥६५॥ इस प्रकार कपिल आदि अपने लए अपने कल्पित तत्त्वका उपदेश देता हुआ सम्राट् भरतका पुत्र मरीचि चिरकाल तक इस पृथिवीपर भ्रमण करता रहा ।। ६६ ।। आयुके अन्तमें मरकर वह ब्रह्म स्वर्गमें दश सागरकी १ दर्शनम् म०, ग०, प० । २ करि-ल. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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