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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् एतद्वितयमनत्र पुराणे जिनभाषिते । नान्येषु दुष्पुराणेषु तस्माद् ग्रामि दे बुरैः ॥ १३ ॥ अथ जम्बूद्रमालक्ष्ये द्वीपानां मध्यवर्तिनि । द्वीपे विदेहे पूर्वस्मिन् सीतासरिदुदक्तटे ॥१४॥ विषये पुष्कलावत्यां नगरी पुण्डरीकिणी। मधुकाख्ये' वने तस्या नाना व्याधाधिपोऽभवत् ॥१५॥ पुरूरवाः प्रियास्यासीत्कालिकाख्यानुरागिणी । अनुरूप विधचे हि वेधाः सङ्गममङ्गिनाम् ॥ १६॥ कदाचिस्कानने तस्मिन् दिग्विभागविमोहनात् । मुनि सागरसेनाख्यं पर्यटन्तमितस्ततः ॥१७॥ विलोक्य सं मृगं मत्वा हन्तुकामः स्वकान्तया । वनदेवाश्चरन्तीमे मावधीरिति वारितः ॥ १८ ॥ तदेव स प्रसमात्मा समुपेत्य पुरूरवाः । प्रणम्य तद्वचः श्रत्वा सुशान्तः श्रद्धयाहितः ॥ १९ ॥ शीतलाम्भस्तटाकं वा निदाघे तृषितो जनः । संसारदुःखहेतो भीरुजैनेश्वरं मतम् ॥ २०॥ शास्त्राभ्यासनशीलो वा ख्यातं गुरुकुलं महत् । मध्वादित्रितयत्यागलक्षणं व्रतमासदत् ॥ २१ ॥ जीवितावसितौ सम्यक्पालयित्वादराद् व्रतम् । सागरोपमदिव्यायुः सौधर्मेऽनिमिषोऽभवत् ॥ २२ ॥ द्वीपेऽस्मिन्भारते देशः कोसलाख्योऽस्ति विश्रुतः। आर्यक्षेत्रस्य मध्यस्थः सौस्थित्यं सर्वदा भजन ॥२३॥ बाधाभावादरक्षात्र रक्षकेभ्यो विना न सा । अदातारो न 'कैनाश्यात्ते तृप्त्या ग्राहकैविना ॥ २४ ॥ काठिन्यं कुत्रयोरेव नैव चेतसि कस्यचित् । देहि पाहीति सम्प्रेषो नाथित्वेन भयेन वा ॥ २५॥ कलङ्कक्षीणते राशि चन्द्र एव परत्र न । स्थितिस्तपोधनेष्वेव विनाहारात्परेषु न ॥ २६ ॥ जीवोंका उपकार करता हो ।। १२ । ये दोनों ही अर्थात् कथा और कथक, जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहं हुए इसी महापुराणमें हैं अन्य मिथ्या पुराणोंमें नहीं हैं इसलिए विद्वानोंके द्वारा यही पुराण ग्रहण करनेके योग्य है।।१३।। अथानन्तर-सब द्वीपोंके मध्यमें रहनेवाले इस जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें सीता नदीके उत्तर किनारेपर पुष्कलावती नामका देश है उसकी पुण्डरीकिगी नगरीमें एक मधु नामका वन है। उसमें पुरूरवा नामका एक भीलोंका राजा रहता था। उसकी कालिका नामकी अनुराग करनेवाली खी थी सो ठीक ही है क्योंकि विधाता प्राणियोंका अनुकूल ही समागम करता है॥१४-१६॥ किसी एक दिन दिग्भ्रम हो जानेके कारण सागरसेन नामके मुनिराज उस वनमें इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे। उन्हें देख, पुरूरवा भील मृग समझकर उन्हें मारनेके लिए उद्यत हुआ परन्तु उसकी स्त्रीने यह कहकर मना कर दिया कि 'ये बनके देवता घूम रहे हैं इन्हें मत मारो' ||१७-१८॥ वह पुरूरवा भील उसी समय प्रसन्नचित्त होकर उन मुनिराजके पास गया और श्रद्धाके साथ नमस्कारकर तथा उनके वचन सुनकर शान्त हो गया ॥ १६ ॥ जिस प्रकार ग्रीष्मऋतु में प्यासा मनुष्य शीतल जलसे भरे हुए तालाबको पाकर शान्त होता है अथवा जिस प्रकार संसार-दुःखके कारणोंसे डरनेवाला जीव, जिनेन्द्र भगवानका मत पाकर शान्त होता है अथवा जिस प्रकार शास्त्राभ्यास करनेवाला विद्यार्थी किसी बड़े प्रसिद्ध गुरुकुलको पाकर शान्त होता है उसी प्रकार वह भील भी सागरसेन मुनिराजको पाकर शान्त हुआ था। उसने उक्त मुनिराजसे मधु आदि तीन प्रकारके त्यागका व्रत ग्रहण किया और जीवन पर्यन्त उसका बड़े आदरसे अच्छी तरह पालन किया। श्रायु समाप्त होने पर वह सौधर्म स्वर्गमें एक सागरकी उत्तम आयुको धारण करनेवाला देव हा ।।२०-२२॥ इसी जम्बूद्वीपके भरत-क्षेत्र सम्बन्धी आर्यक्षेत्रके मध्यभागमें स्थित तथा सदा अच्छी स्थितिको धारण करनेवाला एक कोसल नामका प्रसिद्ध देश है ।। २३ ।। उस देशमें कभी किसीको बाधा नहीं होती थी इसलिए अरक्षा थी परन्तु वह अरक्षा रक्षकोंके अभावसे नहीं थी। इसी तरह घहाँपर कोई दातार नहीं थे, दातारोंका अभाव कृपणतासे नहीं था परन्तु संतुष्ट रहनेके कारण कोई लेनेवाले नहीं थे इसलिए था ॥ २४ ॥ वहाँ कठोरता स्त्रियोंके स्तनोंमें ही थी, वहाँ रहनेवाले किसी के चित्त कठोरता-करता नहीं थी। इसी तरह मुझे कुछ देओ, यह शब्द माँगनेके लिए नहीं । निकलता था। और हमारी रक्षा करो यह शब्द भयसे निकलता था ॥ २५ ॥ इसी प्रकार कलङ्क १ मधुकाख्यवने ल०।२ विश्रुतिः ग०।३ कानाशस्य भावः कैनाश्यं तस्मान् कार्पण्यात् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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