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________________ ४३६ महापुराणे उत्तरपुराणम् नागी नागश्च तच्छेदाद् द्विधा खण्डमुपागतौ । तन्निरीक्ष्य सुभौमाख्यकुमारः समभापत ॥ १०३ ॥ अहं गुरुस्तपस्वीति गर्व दुर्वहमुद्वहन् । पापास्त्रवो भवत्यस्मान वेत्येतच्च वेसि न ॥ १०४ ॥ अज्ञानतपसानेन दुःखं तेऽत्र परन च । इति तद्वचनात्कोपी मुनिरित्थं तमब्रवीत् ॥ १०५ ॥ अहं प्रभुर्ममायं किं वा करोतीत्यवज्ञया। तपसो मम माहात्म्यमबुद्धवैवं अवीपि किम् ॥ १०६ ॥ पञ्चाग्निमध्यवर्तित्वं पवनाहारजीवनम् । ऊर्ध्वबाहुतया पादेनैकेनैव चिरं स्थितिः ॥ १.७॥ स्वयंपतितपर्णादेरुपवासेन पारणम् । इत्यादिकायसन्तापि तापसानां सुदुर्धरम् ॥ १०८ ॥ तपो नाधिकमस्त्यस्मादिति तद्वचनश्रतेः। सुभौमः सस्मितोऽवादीन भवन्तमहं गुरुम् ॥ १०९॥ अवमन्ये पुनः किन्तु सन्त्यज्यासागमादिकम् । मिथ्यात्वादिचतुष्कण पृथिव्यादिषु षट्स्वपि ॥ ११ ॥ वाचा कायेन मनसा कृतकादित्रिकेण च । वधे प्रवर्तमानानामनासमतसंश्रयात् ॥ १११ ॥ निर्वाणप्रार्थनं तेषां तण्डुलावाप्तिवान्छया। तुषखण्डनखेदो वा घृतेच्छा वाम्बुमन्थनात् ॥ ११२॥ हेमोपलब्धिबुद्धिा दाहादन्धाश्मसंहतेः। अन्धस्येवाग्निसम्पातो दावभीत्या प्रधावतः ॥ ११३ ॥ ज्ञानहीनपरिक्लेशो भाविदुःखस्य कारणम् । इति प्ररूप्यते युष्मत्स्रहेन महता मया ॥ ११४ ॥ इत्येतदुक्त' ज्ञात्वापि पूर्ववैरानुबन्धनात् । निजपक्षानुरागित्वाद् दुःसंसारादिहागतेः ॥ ११५॥ प्रकृत्यैवातिदुष्टत्वादनादाय विरुद्धधीः । सुभौमको भवानत्र सस्मयोऽयं कुमारकः ॥ ११६ ॥ पराभवति मामेवमिति तस्मिन् प्रकोपवान् । सशल्यो मृतिमासाद्य शम्बरो ज्योतिषामरः ॥ ११७ ॥ नानाभवत्सकोपानां तपसाऽपीदृशी गतिः। नागी नागश्च सम्प्राप्तशमभावौ कुमारतः ॥ ११८॥ कहने लगा कि तू 'मैं गुरु हूं, तपस्थी हूँ, यह समझकर यद्यपि भारी अहंकार कर रहा है परन्तु यह नहीं जानता कि इस कुतपसे पापास्रव होता है या नहीं। इस अज्ञान तपसे तुझे इस लोकमें दुःख हो रहा है और परलोकमें भी दुःख प्राप्त होगा।' सुभौमकुमारके यह वचन सुनकर वह तपस्वी । इस प्रकार उत्तर देने लगा ॥६३-१०५ ।। कि 'मैं प्रभु हूँ, यह मेरा क्या कर सकता है। इस प्रकारकी अवज्ञासे मेरे तपका माहात्म्य बिना जाने ही तू ऐसा क्यों बक रहा है ? पश्चाग्निके मध्यमें बैठना, वायु भक्षण कर ही जीवित रहना, ऊपर भुजा उठाकर चिरकाल तक एक ही पैरते खड़े रहना, और उपवास कर अपने आप गिरे हुए पत्ते आदिसे पारण करना । इस प्रकार शरीरको सन्तापित करनेवाला तपस्वियोंका तप बहुत ही कठिन है, इस तपश्चरणसे बढ़कर दूसरा तपश्चरण हो ही नहीं सकता। उस तपस्वीके ऐसे वचन सुन सुभौमकुमार हँसकर कहने लगा कि मैं न तो आपको गुरु मानता हूं और न आपका तिरस्कार ही करता हूँ किन्तु जो आप्त तथा आगम आदिको छोड़कर मिथ्यात्व एवं क्रोधादि चार कषायोंके वशीभूत हो पृथिवीकायिक आदि छह कायके जीवोंकी हिंसामें मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदनासे प्रवृत्ति करते हैं और इस तरह अनाप्तके कहे हुए मतका आश्रय लेकर निर्वाणकी प्रार्थना करते हैं-मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं सो उनकी यह इच्छा चावल पानेकी इच्छासे धानके छिलके कूटनेके प्रयासके समान है, अथवा जल मथकर घी प्राप्त करनेकी इच्छाके समान है, अथवा अन्धपाषाणके समूहको जलाकर सुवर्ण करनेकी इच्छाके समान है, अथवा जिस प्रकार कोई अन्धा मनुष्य दावानलके डरसे भागकर अग्निमें जा पड़े उसके समान है। ज्ञानहीन मनुष्यका कायक्लेश भावी दुःखका कारण है। यह बात मैं, आप पर बहुत भारी स्नेह होनेके कारण कह रहा हूँ। ।। १०६-११४ । इस प्रकार सुभौमकुमारके कहे वचन, विपरीत बुद्धिवाले उस तापसने समझ तो लिये परन्तु पूर्व वैरका संस्कार होनेसे, अथवा अपने पक्षका अनुराग होनेसे अथवा दुःखमय संसारसे आनेके कारण अथवा स्वभावसे ही अत्यन्त दुष्ट होनेके कारण उसने स्वीकार नहीं किये प्रत्युत, कुमार अहंकारी होकर मेरा इस तरह तिरस्कार कर रहा है, यह सोचकर वह भगवान पार्श्वनाथ पर अधिक क्रोध करने लगा। इसी शल्यसे वह मरकर शम्बर नामका ज्योतिषी देव हुआ सो ठीक ही है क्योंकि क्रोधी मनुष्योंकी तपसे ऐसी हो गति होती है। इधर सर्प और सर्पिणी कुमारके १-मुना ल•। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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