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________________ द्विसप्ततितम पर्व ध्वंसं समाप तदपास्तपरिग्रहाणां माकृध्वमल्पमपि पापधियापकारम् ॥ २८२ ॥ चाणूरमेणमिव यो हतवान् हरिर्वा कंसच कंसमिव बाशनिरन्वभैसास । मृत्युर्यधाहृत शिशुं शिशुपालमाजौ तेजस्विनां कथमिहास्तु न सोऽग्रगण्यः ॥ २८६ ।। शिखरिणी जरासन्धं हत्वोजितमिव गज शौर्यजलधि नजारिवा गर्जन प्रतिरिपुजयाद्विश्वविजयी । त्रिखण्डां निखण्डां करविकृतदण्डोऽप्रतिहतां यथापाद्वाल्ये गाः किल खलु स गोपोऽन्वपि ततः ॥ २८४ ॥ मालिनी क सकलपृथुशत्रुध्वंसनात्साद्भुतश्रीः ___ क्व च स भुवनबाह्यो ही हरेर्मूलनाशः । स्वकृतविधिविधानात्कस्य किं वान न स्याद् भ्रमति हि भवचक्र चक्रनेमिक्रमेण ॥ २८५॥ वसन्ततिलका बध्वायुराप दशमयमथान्स्यनाम चास्मादधोऽगमदसौ एतराज्यभारः। तद्धीधनाः कुरुत यत्नमखण्डमायु बन्धं प्रति प्रतिपदं सुखलिप्सवश्रेत् ॥ २८६ ॥ कृष्णके जीवने चाण्डाल अवस्थामें मुनिके साथ द्रोह किया था इसलिए वह दुर्बुद्धि नरक गया और उसी कारणसे तपश्चरणके द्वारा राज्यलक्ष्मी पाकर अन्तमें उसके विनाशको प्राप्त हुआ इसलिए आचार्य कहते हैं कि परिग्रहका त्याग करनेवाले मुनियोंका पाप-बुद्धिसे थोड़ा भी अपकार मत करो ॥ २२॥ जिस प्रकार सिंह हरिणको मार डालता है उसी प्रकार जिसने चाणूरमल्लको मार डाला था, जिस प्रकार वत्र कंस (कांसे) के टुकड़े-टुकड़े कर डालता है उसी प्रकार जिसने कसके (मथुराके राजाके) टुकड़े-टुकड़े कर डाले थे और जिसप्रकार मृत्यु बालकका हरण कर लेती है उसी प्रकार जिसने युद्धमें शिशुपालका हरण किया था-उसे पराजित किया था। ऐसा श्रीकृष्ण नारायण भला प्रतापी मनुष्योंमें सबसे मुख्य क्यों न हो ? ॥ २८३ ॥ जिस प्रकार सिंह बलवान् हाथीको जीतकर गरजता है उसी प्रकार शूरवीरताके सागर श्रीकृष्णने अतिशय बलवान् जरासन्धको जीतकर गरजना की थी, इन्होंने अपने समस्त शत्रुओंको जीत लिया था इसलिए ये विश्वविजयी कहलाये थे तथा जिस प्रकार इन्होंने बाल अवस्थामें गायोंकी रक्षा की थी इसलिए गोप कहलाये थे उसी प्रकार इन्होंने तरुण अवस्थामें भी हाथमें केवल एक दण्ड धारणकर किसीके द्वारा अविजित इस तीन खण्डकी अखण्ड भूमिकी रक्षा की थी इसलिए बाद भी वे गोप (पृथिवीके रक्षक) कह ॥ २८४ ॥ देखो, कहाँ तो श्रीकृष्णको बड़े-बड़े समस्त शत्रुओंका नाश करनेसे उस आश्चर्यकारी लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई थी और कहां समस्त जगत्से जुदा रहकर निर्जन वनमें उनका समूल नाश हुमा सो ठीक ही है क्योंकि इस संसारमें अपने किये हुए कर्मों के अनुसार किसे क्या नहीं प्राप्त होता है.१ यथार्थमें संसाररूपी चक्र पहियेकी हालकी तरह घूमा ही करता है ॥ २५॥ देखो, श्रीकृष्णने Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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