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________________ द्विसप्ततितम पव ४० काध वर्तत इत्येतत्परिपृष्टो मुनिर्जगी। जिनधर्मविरुखस्वात्कृतपापोऽभवन्भृतः ॥ ३०॥ रत्नप्रभाबिले सर्पावर्तनानि ततोऽजनि। मातङ्गः काकजहाख्यः सोमदेवो भवत्पिता ॥३१॥ माताग्निला च तस्यैव जायते स्म शुनी गृहे । इहेस्याकर्ण्य तत्प्रोक्त तेन तौ परिबोधितौ ॥ ३२॥ सम्प्राप्योपशमं भावं सन्न्यस्य विधिना मृतः। काकजवोऽभवनन्दीश्वरद्वीपे निधीश्वरः ॥ ३३ ॥ तत्पुराधीश्वरारिन्दमाख्यभूभृत्पतेः सुता । श्रीमत्याश्च शुनी सुप्रबुद्धाख्याजायत प्रिया ॥ ३५॥ सम्पूर्णयौवना यान्ती सा स्वयंवरमण्डपम् । यक्षेण बोधिता दीक्षामित्वाप्य प्रियदर्शनाम् ॥ ३५॥ जीवितान्तेऽभवदेवी मणिचूलेति रूपिणी । सौधर्माधिपतेः पूर्णभद्रस्तदनुजोऽपि च ॥ ३६ ॥ सप्तस्थानगतौ ख्यातश्रावको तौ दृढव्रतौ। प्रान्ते सामानिकौ देवौ जातौ सौधर्मनामनि ॥ ३ ॥ द्विसागरोपमातीतौ द्वीपेऽत्र कुरुजाङ्गले । हास्तिनाख्यपुराधीशस्याहदासमहीपतेः ॥ ३८ ॥ काश्यपायाश्च पुत्रौ तौ मधुक्रीडवनामको । समभूतां तयो राजा राजत्वयुवराजते ॥ ३९ ॥ विधाय विमलां प्रापद्विमलप्रभशिष्यताम् । कण्ठान्तामलकाख्यस्य पुरस्येशः कदाचन ॥ ४०॥ स्थान्तकनकस्य स्वं समायातस्य सेवितम् । कान्तां कनकमालाख्यां समीक्ष्य मदनातुरः ॥ ४ ॥ स्वीचकारमधुः शोकाद्रथान्तकनकाइयः । पावे 'द्विजटिसज्ञस्य तापसव्रतमाददे ॥ ४२ ॥ मधुक्रीडवयोरेवं काले गच्छत्यथान्यदा । सम्यगाकर्ण्य सर्म मधुविमलवाहनात् ॥ ४३ ॥ गहणं स्वदुराचारे कृत्वा क्रीडवसंयुतः । संयम समवाप्यान्ते संश्रित्याराधनाविधिम् ॥ १४ ॥ मुनिराजसे पूछा कि हमारे पूर्वभवके माता-पिता इस समय कहाँ पर हैं ? उत्तरमें मुनिराज कहने लगे कि तेरे पिता सोमदेवने जिनधर्मसे विरुद्ध होकर बहुत पाप किये थे अतः वह मरकर रत्नप्रभा पृथिवीके सर्पावर्त नामके विलमें नारकी हुआ था और वहाँ से निकलकर अब इसी नगरमें काकजंघ नामका चाण्डाल हुआ है। इसी तरह तेरी माता अग्निलाका जीव मरकर उसी चाण्डालके घर कुत्ती हुआ है। मुनिराजके वचन सुनकर पूर्णभद्रने उन दोनों जीवोंको संबोधा जिससे उपशम भावको प्राप्त होकर दोनोंने विधिपूर्वक संन्यास धारण किया और उसके फलस्वरूप काकजङ्क तो नन्दीश्वर द्वीपमें कुबेर नामका व्यन्तर देव हुआ। और कुत्ती उसी नगरके स्वामी अरिन्दम नामक राजाकी श्रीमती नामकी रानीसे सुप्रबुद्धा नामकी प्यारी पुत्री हुई ।। २५-३४ ।। जब वह पूर्ण यौवनवती होकर स्वयंवर-मण्डपकी ओर जा रही थी तब उसके पूर्वजन्मके पति कुवेर नामक यक्षने उसे समझाया जिससे उसने प्रियदर्शना नामकी आर्यिकाके पास जाकर दीक्षा धारण कर ली और आयुके अन्तमें वह सौधर्म इन्द्रकी मणिचूला नामकी रूपवती देवी हुई । इधर पूर्णभद्र और उसके छोटे भाई मणिभद्रने बड़ी दृढ़तासे श्रावकके व्रत पालन किये, सात क्षेत्रो में धन खर्च किया और आयुके अन्तमें दोनों ही सौधर्म नामक स्वर्गमें सामानिक जातिके देव हुए ॥ ३५-३७॥ वहाँ उनकी दो सागरकी आयु थी, उसके पूर्ण होने पर वे इसी जम्बूद्वीपके कुरुजांगल देश सम्बन्धी हस्तिनापुर नगरके राजा अहहासकी काश्यपा नामकी रानीसे मधु और क्रीडव नामके पुत्र हुए। किसी एकदिन राजा अहहासने मधुको राज्य और क्रीडवको युवराज पद देकर विमलप्रभ मुनिकी निर्दोष शिष्यता प्राप्त कर ली अर्थात् उनके पास दीक्षा धारण कर ली। किसी समय अमलकण्ठ नगरका राजा कनकरथ (हेमरथ) राजा मधुकी सेवा करनेके लिए उसके नगर आया था वहाँ उसकी कनकमाला नामकी स्त्रीको देखकर राजा मधु कामसे पीड़ित हो गया। निदान उसने कनकमालाको स्वीकृत कर लिया-अपनी स्त्री बना लिया। इस घटनासे राजा कनकरथको बहुत निर्वेद हुआ जिससे उसने द्विजटि नामक तापसके पास व्रत ले लिये। इधर मधु और क्रीडवका काल सुखसे व्यतीत हो रहा था। किसी एक दिन मधुने विमलवाहन नामक मुनिराजसे अच्छी तरह धर्मका स्वरूप सुना, अपने दुराचारकी निन्दा की और क्रीडवके साथ-साथ संयम धारण कर लिया। आयुके अन्तमें विधिपूर्वक आराधना कर मधु और क्रीडव दोनों ही महाशुक्र स्वर्गमें इन्द्र हुए। आयुके अन्तमें वहाँसे च्युत होकर बड़ा भाई भधुका १ द्विजादि-म० । जटिल इत्यपि कचित् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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