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________________ द्विसप्ततितम पर्व भथ 'स्वज्ञातपूर्वञ्च जगस्त्रयसभावनौ । प्रकाशयितुकामेन बलदेवेन धीमता ॥१॥ प्रद्युम्नशम्भवोत्पतिसम्बन्धः पृच्छयते स्म सः । नरदत्तगरणेन्द्रोनु रुन्द्रबुद्धयेत्थमब्रवीत् ॥ २॥ द्वीपेऽस्मिन्मगधे देशे शालिग्रामनिवासिनः । द्विजस्य सोमदेवस्य भार्याऽभूदग्निलाख्यया ॥ ३ ॥ अग्निभूतिरभूत्सूनुर्वायुभूतिस्तयोरनु । तावन्येधुः पुरे नन्दिवर्धनाख्ये मनोहरे ॥ ४ ॥ निन्दने नन्दिघोषाख्ये वने मुनिमपश्यताम् । नन्दिवर्धननामान "मुनिसङ्घविभूषणम् ॥ ५ ॥ दुष्टावुपागतौ दृष्टा तौ मुनीन्द्रोऽब्रवीन्मुनीन् । विसंवदितुमायातावेतौ मिथ्यात्वदूषितौ ॥ ६ ॥ भवनिः कैश्चिदप्याभ्यां न कार्या सह सङ्कथा । एतन्निबन्धनो भूयानुपसर्गो भविष्यति ॥ ७ ॥ इति तद्वचनं श्रत्वा गुरुशासनकारिणः । मौनव्रतेन सर्वेऽपि स्थिताः संयमिनस्तदा ॥ ८॥ दृष्टा तावत्य सर्वेषां मूकीभूय व्यवस्थितिम् । कृतापहासौ स्वं ग्रामं गच्छन्तावशितुगतम् ॥ ९ ॥ ग्रामान्तरात्समायात मुनिमालोक्य सत्यकम् । तत्समीपमहङ्कारप्रेरितावुपगम्य तम् ॥ १० ॥ नास्त्याप्तो नागमो नैव पदार्थो नग्न केवलम् । किं क्लिश्नासि वृथोन्मार्गे मूढो दृष्टविनाशिनि ॥११॥ इत्यध्यक्षिपतां सोऽपि जिनवक्त्रविनिर्गतम् । विवक्षितेतरानेकस्वरूपान्तसमाश्रयम् ॥ १२ ॥ द्रव्यतत्त्वं यथारष्टं कथयन्तं 'सहेतुकम् । स्याद्वादमवलम्ब्योच्चैस्तत्प्रणेतृप्रमाणताम् ॥१३॥ प्रसाध्यादृष्टभागेऽपि तदुक्तागम'सुस्थितिम् । निरूप्य वादकण्डूतिमपनीय दुरात्मनोः ॥ १४ ॥ महकार प्रेरित निवस्त्रविबलम् । अथानन्तर–तीनों जगत्की सभाभूमि अर्थात् समवसरणमें अपने पूर्वभव जानकर बुद्धिमान बलदेवने सबको प्रकट करनेके लिए प्रद्युम्नकी उत्पत्तिका सम्बन्ध पूछा सो वरदत्त गणधर अनुग्रहकी बुद्धिसे इस प्रकार कहने लगे ॥१-२॥ इसी जम्बूद्वीपके मगधदेश सम्बन्धी शालिग्राममें रहनेवाले सोमदेव ब्राह्मणकी एक अनिला नामकी स्त्री थी॥३॥ उन दोनोंके अग्निभूति और वायुभूति नामके दो पुत्र थे, किसी एक दिन वे दोनों पुत्र नन्दिवर्धन नामके दूसरे सुन्दर गाँवमें गये । वहाँ उन्होंने नन्दिघोष नामके वनमें, मुनि संघके आभूषणस्वरूप नन्दिवधेन नामक मुनिराजके दर्शन किये ॥ ४-५॥ उन दोनों दुष्टोंको आया हुआ देख, मुनिराजने संघके अन्य मुनियोंसे कहा कि 'ये दोनों मिथ्यात्वसे दूषित हैं और विसंवाद करनेके लिए आये हैं अतः आप लोगोंमेंसे कोई भी इनके साथ बातचीत न करें। अन्यथा इस निमित्तसे भारी उपसर्ग होगा' ॥ ६-७ ।। शासन करनेवाले गुरुके इस प्रकारके वचन सुनकर सब मुनि उस समय मौन लेकर बैठ गये ॥८॥ वे दोनों ब्राह्मण सब मुनियोंको मौनी देखकर उनकी हँसी करते हुए अपने गाँवको जा रहे थे कि उन मुनियोंमेंसे एक सत्यक नामके मुनि आहार करनेके लिए दूसरे गाँवमें गये थे और लौटकर उस समय श्रा रहे थे। अहंकारसे प्रेरित हुए दोनों ब्राह्मण उन सत्यक मुनिको देख उनके पास जा पहुंचे और कहने लगे कि 'अरे नंगे! न तो कोई प्राप्त है, न आगम है, और न कोई पदार्थ ही है फिर क्यों मूर्ख बनकर प्रत्यक्षको नष्ट करनेवाले इस उन्मार्गमें व्यर्थ ही क्लेश उठा रहा है। इस प्रकार उन दोनोंने उक्त मुनिका बहुत ही तिरस्कार किया। मुनिने भी, जिनेन्द्र भगवानके मुखकमलसे निकले विवक्षित तथा अविवक्षित रूपसे अनेक धर्मोंका निरूपण करनेवाले, एवं प्रत्यक्ष सिद्ध द्रव्य तत्त्वका हेतु सहित कथन करनेवाले अतिशय उत्कृष्ट स्याद्वादका अवलम्बन लेकर उसका उपदेश देनेवाले प्राप्तकी प्रामाणिकता सिद्ध कर दिखाई तथा परोक्ष तत्त्वके विषयमें भी उन्हीं प्राप्तके द्वारा कथित आगमकी समीचीन स्थितिका निरूपण कर उन दुष्ट ब्राह्मणोंकी वाद करनेकी खुजली दूर की एवं विद्वज्जनोंके १तद्ज्ञान-ल । २ गणीन्द्रो ख० । ३ मागधे ख० । ४ नन्दान ल०।५ मुनि सङ्घ ल । ६ निबस्वतो ल०। ७ नाश ल. सुहेतुकम्ल ।६ संस्थितिम् ल । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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