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________________ एकसप्ततितमं पर्व ३६५ स्वयम्भूकेशवैश्वयं तपःकाले निरीक्ष्य सः । निर्नामकसुतस्तेऽद्य कंसशत्रुरजायत ॥ २९८ ॥ स्वं कुतस्ते कुतः कोऽयं सम्बन्धो निनिंबन्धनः । विधेविलसितं चित्रमगम्यं योगिनामपि ॥ २१॥ इति नैसर्गिकाशेषभव्यानुग्रहभावुकः । न्यगदद्भगवानेवं भक्तयावन्दत देवकी ॥ ३०॥ अथानन्तरमेवैनं सत्यभामापि २भाक्तिकी । स्वपूर्वभवसम्बन्धमप्राझीदक्षरावधिम् ॥ ३०१ ॥ सोऽपि व्यापारयामास तदभीष्टनिवेदने । न हेतुः कृतकृत्यानामस्त्यन्योऽनुग्रहाद्विना ।। ३०२ ॥ शीतलाख्यजिनाधीशतीर्थे धर्मे विनश्यति । भद्रिलाख्यपुराधीशो नाम्ना मेघरथो नृपः ॥ ३०३॥ प्रेयसी तस्य नन्दाख्या भूतिशर्मा द्विजाग्रणीः । तस्यासीत्कमला पत्नी मुण्डशालायनस्तयोः ॥ ३०४ ॥ तनुजो वेदवेदाङ्गपारगो भोगसक्तधीः । वृथा तपःपरिक्लेशो मूखैरेष प्रकल्पितः ॥ ३०५ ॥ निर्धनैः परलोकार्थं स्वयं साहसशालिभिः । भूसुवर्णादिदानेन सुखमिष्टमवाप्यते ॥ ३०६॥ इतीत्यादिकुदृष्टान्तकुहेतुनिपुणैर्नृपम् । कायक्लेशासह वाक्यैरयथार्थमबूबुधत् ॥ ३०७ ॥ तथा परांश्च दुर्बुद्धीन् बोधयन् जीवितावधौ। भूत्वा सप्तस्वधोभूमिष्वतस्तिर्यक्षु च क्रमात् ॥ ३०८ ॥ गन्धमादनकुध्रोत्थमहागन्धवतीनदी। समीपगलभ लकीनामपल्ल्यां स्वपापतः ॥ ३०९ ॥ जातो वनेचरः कालसज्ञः स तु कदाचन । वरधर्मयतिं प्राप्य मध्वादिविनिवृत्तितः ॥ ३१ ॥ विजयार्धेऽलकापुर्याः पत्युः पुरुबलस्य च । ज्योतिर्मालाभिधायाश्च सुतो हरिबलोऽभवत् ॥ ३११॥ आया स्नेह इनमें उत्पन्न हो गया है ।। २६७॥ पूर्व जन्ममें जो तेरा निर्नामक नामका पुत्र था उसने तपश्चरण करते समय स्वयंभू नारायणका ऐश्वर्य देखकर निदान किया था अतः वह कंसका मारनेवाला श्री कृष्ण हुआ है ॥२८॥ गणधर देव देवकीसे कहते हैं कि 'हे देवकी! तू कहाँ से आई ? तेरे ये पुत्र कहाँसे आये ? और बिना कारण ही इनके साथ यह सम्बन्ध कैसे आ मिला ? इसलिए जान पड़ता है कि कर्मका उदय बड़ा विचित्र है और योगियोंके द्वारा भी अगम्य है। इस प्रकार स्वभावसे ही समस्त भव्य जीवोंका उपकार करनेवाले गणधर भगवान्ने यह सब कथा कही। कथा सुनकर देवकीने उन्हें बड़ी भक्तिसे वन्दना की॥ २६६-३००॥ ___ तदनन्तर-भक्तिसे भरी सत्यभामाने भी, अक्षरावधिको धारण करनेवाले गणधर भगवानसे अपने पूर्व भवोंका सम्बन्ध पूछा ।। ३०१॥ तब गणधर भगवान् भी उसका अभीष्ट कहने लगे सी ठीक ही है क्योंकि कृतकृत्य मनुष्योंका अनुग्रहको छोड़कर और दूसरा कार्य नहीं रहता है ।। ३०२ ॥ वे कहने लगे कि शीतलनाथ भगवान्के तीर्थमें जब धर्मका विच्छेद हुआ तब भद्रिलपुर नगरमें राजा मेघरथ राज्य करता था, उसकी रानीका नाम नन्दा था। उसी समय उस नगरमें भूतिशर्मा नामका एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था, उसकी कमला नामकी स्त्री थी और उन दोनोंके मुण्डशालायन नामका पुत्र था। मुण्डशालायन यद्यपि वेदवेदाङ्गका पारगामी था परन्तु साथ ही उसकी बुद्धि हमेशा भोगों में आसक्त रहती थी इसलिए वह कहा करता था कि तपका क्लेश उठाना व्यर्थ है, जिनके पास धन नहीं है ऐसे साहसी मूर्ख मनुष्योंने ही परलोकके लिए इस तपके क्लेशकी कल्पना की है। वास्तवमें पृथिवीदान, सुवर्ण-दान आदिसे ही इष्ट सुख प्राप्त होता है। इस प्रकार उसने अनेक कुदृष्टान्त और कुहेतुओंके बतलानेमें निपुण वाक्योंके द्वारा कायक्लंशके सहने में असमर्थ राजाको झूठमूठ उपदेश दिया। राजाको ही नहीं, अन्य दुबुद्धि मनुष्योंके लिए भी वह अपने जीवन भर ऐसा ही उपदेश देता रहा । अन्तमें मर कर वह सातवें नरक गया। वहाँसे निकल कर तिर्यश्च हुआ। इस तरह नरक और तिर्यश्च गतिमें घूमता रहा ॥३०३-३०८ ।। अनुक्रमसे वह गन्धमादन पर्वतसे निकली हाई गन्धवती नदीके समीपवर्ती भल्लंकी नामकी पल्ली में अपने पापकर्मके उदयसे काल नामका भील हा । उस भीलने किसी समय वरधर्म नामक मुनिराजके पास जाकर मधु आदि तीन मकारोंका त्याग किया था। उसके फलस्वरूप वह विजयाध पर्वत पर अलकानगरीके राजा पुरबल और उनकी रानी ज्योतिर्मालाके हरिबल नामका पुत्र हुआ। उसने अनन्तवीर्य नामके मुनिराजके पास १ तपकाले ल• । २ भाक्तिका ल• । ३ कटोत्थ ल० । कुभ्रः पर्वतः । ४ भल्लु किन Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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