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________________ ३६४ महापुराणे उत्तरपुराणम् राकट भाण्डसम्पूर्ण बलीवरयोजयत् । सर्पस्सन्मदितोऽकामनिर्जरो विगतासुकः ॥ २८२ ॥ 'पुरे श्वेतविकानाम्नि वासवस्य महीपतेः । वसुन्धयां सुता नन्दयशाः समुदपाद्यसौ ॥ २८३ ॥ पुननिरनुकम्पश्व भ्राना दुःखनिमितकम् । त्वयेदृशं न कर्तव्यमित्युक्तः शममागतः ॥ २८४ ॥ स्वायुरन्ते समुत्पन्नः सोऽयं निर्नामकाख्यया । ततः पूर्वभवोपात्तपापस्य परिपाकतः ॥ २८५ ॥ जायते नन्दयशसः कोपो निर्नामक प्रति । इति तस्य वचः श्रत्वा ते निर्वेगपरायणाः ॥ २८६॥ नरेन्द्रपटसुता दीक्षां शङ्को निर्नामकोऽप्ययुः । तथा नन्दयशा रेवतीनामादित संयमम् ॥ २८॥ सुव्रताख्यायिकाभ्याशे पुत्रस्नेहाहितेच्छया । अन्यजन्मनि चामीषामेव लाभे च वर्धने ॥ २८८॥ ते निदानं विमूढत्वादुभे चाकुरुतां समम् । ततः सर्वे तपः कृत्वा समाराध्य यथोचितम् ॥२८९॥ महाशुक्र समुत्पन्नाः प्रान्ते सामानिकाः सुराः । षोडशाब्ध्युपमायुष्का दिव्यभोगवशीकृताः ॥ २९० ॥ ततः प्रच्युत्य शङ्खोऽभूदलदेवो हलायुधः । मृगावत्याख्यविषये दशार्णपुरभूपतेः ॥ २९१ ॥ देवसेनस्य चोत्पन्ना धनदेव्याश्च देवकी । त्वं सा नन्दयशाः स्त्रीत्वमुपगम्य निदानतः ॥ २९२॥ भद्रिलाख्यपुरे देशे मलयेऽजनि रेवती । सुदृष्टेः श्रेष्ठिनः श्रेष्ठा श्रेष्ठिनी सालकाख्यया ॥ २९३ ॥ प्राक्तनाः षट्कुमाराश्च यमा भूतास्तव त्रयः । तदानीमेव शक्रस्य निदेशात्कसतो भयात् ॥ २९४ ॥ ते नैगमर्षिणा नीताः श्रेष्ठिन्या न्वलकाख्यया । वचिंता देवदत्तश्च देवपालोऽनुजस्ततः॥ २९५ ॥ अनीकदत्तश्वानीकपाल: शत्रुघ्नसज्ञकः । जितशत्रुश्च जन्मन्येवात्र निवृतिगामिनः ॥ २९६ ॥ नवे वयसि दीक्षित्वा भिक्षार्थ पुरमागताः । त्वया दृष्टास्ततस्तेषु स्नेहो जन्मान्तरागतः ॥ २९७॥ रोकनेपर भी दयासे दूर रहनेवाले निरनुकम्पने उस अन्धे साँपपर बर्तनोंसे भरी गाड़ी बैलोंके द्वारा चला दी। उस गाड़ीके भारसे साँप कट गया और अकामनिर्जरा करता हुआ मर गया ॥२८१२८२ ।। मरकर श्वेतविका नामके नगरमें वहाँ के राजा वासबके उसकी रानी वसुन्धरासे नन्दयशा नामकी पुत्री हुआ ।। २८३ ।। छोटे भाई सानुकम्पने निरनुकम्प नामक अपने बड़े भाईको फिर भी समझाया कि आपके लिए इस प्रकार दूसरोंको दुःख देनेवाला कार्य नहीं करना चाहिए। इस प्रकार समझाये जानेपर वह शान्तिको प्राप्त हुआ।॥२४॥ वही निरनुकम्प आयुके अन्तमें मरकर यह निर्नामक हुआ है। पूर्वभवमें उपार्जन किये हुए पापकर्मके उदयसे ही नन्दयशाका निर्नामकके प्रति क्रोध . रहता है। राजा द्रमसेनके यह वचन सुनकर राजाके छहों पुत्र, शङ्क तथा निर्नामक सब विरक्त हुए और सभीने दीक्षा धारण कर ली। इसी प्रकार पुत्रोंके स्नेहसे उत्पन्न हुई इच्छासे रानी नन्दयशा तथा रेवती धायने भी सुव्रता नामक आर्यिकाके समीप संयम धारण कर लिया। किसी एक दिन उन दोनों आर्यिकाओंने मूर्खतावश निदान किया। नन्दयशाने तो यह निदान किया कि 'आगामी जन्ममें भी ये मेरे पुत्र हों और रेवतीने निदान किया कि 'मैं इनका पालन करूँ।। तदनन्तर तपश्चर्या कर और अपनी योग्यताके अनुसार अाराधनाओंकी आराधनाकर आयुके अन्तमें वे सब महाशुक्र स्वर्गमें सामानिक जातिके देव हुए। वहाँ सोलह सागरकी उनकी आयु थी और सब दिव्य भोगोंके वशीभूत रहते थे ।। २८५-२६० ॥ वहाँसे च्युत होकर शङ्खका जीव हलका धारण करनेवाला बलदेव हुआ है और नन्दयशाका जीव मृगावती देशके दशार्णपुर नगरके राजा देवसेनके रानी धनदेवीसे देवकी नामकी पुत्री पैदा हुई है। निदान-बन्धके कारण ही तू स्त्रीपर्यायको प्राप्त हुई है ।। २६१२६२॥ रेवतीका जीव मलय देशके भद्रिलपुर नगरमें सुदृष्टि सेठकी अलका नामकी सेठानी हुई है। पहलेके छहों पुत्रोंके जीव दो दो करके तीन बारमें तेरे छह पुत्र हुए। उसी समय इन्द्रकी आज्ञासे कंसके भयके कारण नैगमर्षि देवने उन्हें अलका सेठानीके घर रख दिया था इसलिए अलकाने ही उन पुत्रोंका पालन किया है । देवदत्त, देवपाल, अनीकदत्त, अनीकपाल, शत्रुघ्न और जितशत्रु ये उन छहों पुत्रों के नाम हैं, ये सभी इसी भवसे मोक्ष प्राप्त करेंगे ॥ २६३-२६६ ॥ ये सब नई , अवस्थामें ही दीक्षा लेकर भिक्षाके लिए नगरमें आये थे इसलिए इन्हें देखकर तेरा पूर्वजन्मसे चला १ पुर-ल० । २वसुधायां ल० । ३ नरेन्द्रः ल० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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