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________________ एकसप्ततितमं पर्व ३८३ खेचराचलवाराशिगङ्गामध्यगतान् पुनः । वशीकृत्य वशी तूर्णं म्लेच्छराजान् संखेचरान् ॥ १२० ॥ भरतार्धमहीनाथो दूरोच्छ्रितपताकिकाम् । उद्धद्धतोरणां द्वारवतीं हृष्टो विवेश सः ॥ १२१ ॥ प्रविष्टवन्तं तं देवविद्याधरधराधिपाः । त्रिखण्डाधिपतिश्चक्रीत्यभ्यषिञ्चन्नयाचितम् ॥ १२२ ॥ स सहस्रसमायुष्को दशचापसमुच्छ्रितिः । । लसनीलाब्जवर्णाभो लक्ष्म्यालिङ्गितविग्रहः ॥ १२३ ॥ चक्रं शक्तिर्गदा शङ्खो धनुर्दण्डः सनन्दकः । बभूवुः सप्तरत्नानि रक्षाण्यस्याक्षपालकैः ॥ १२४ ॥ रत्नमाला गदा सीरो मुसलञ्च हलेशिनः । महारत्नानि चत्वारि स्फुरविंष्यभवन् विभोः ॥ १२५ ॥ रुक्मिणी सत्यभामा च सती जाम्बवतीति च । सुसीमा लक्ष्मणा गान्धारी गौरी सप्तमी प्रिया ॥ १२६ ॥ पद्मावती च देव्योमूरष्टौ पट्टप्रसाधनाः । सर्वाः देव्यः सहस्राणि चाणूरान्तस्य षोडश ॥ १२७ ॥ बलस्याष्ट सहस्राणि देव्योऽभीष्टसुखप्रदाः । ताभिस्तावामरं सौख्यमाप्तौ वा प्रीतिमीयतुः ॥ १२८ ॥ स्वपूर्वकृतपुण्यस्य परिपाकेन पुष्कलान् । भोगान्प्राप्नुवतस्तस्य काले गच्छति शाङ्गिणः ॥ १२९ ॥ अन्येद्युर्वारिदान्तेऽन्तः पुरेणामा सरोवरे । मनोहराभिधानेऽभूज्जलकेली मनोहरा ॥ १३० ॥ तत्र नेमीशितुः सत्यभामायाश्चाम्बुसेचनात् । सल्लापोऽभवदित्युच्चैश्चतुरोक्तया मनोहरः ॥ १३१ ॥ प्रियावत्कुतो रन्ता मयि त्वं किं ममाप्रिया । "प्रियास्मि चेशव भ्राता यातु कां कामदायिनीम् ॥ १३२ ॥ कासौ किं तां न वेत्सि त्वं सम्यक्सा वेदयिष्यति । वदन्ति त्वामृजुं सर्वे कुटिलस्त्वं तथापि च ॥१३३॥ पर्वत के बीच म्लेच्छ राजाओंसे नमस्कार कराकर उनसे अपने पैरोंके नखोंकी कान्तिका भार उठवाया ॥ ११६ ॥ तदनन्तर विजयार्ध पर्वत, लवणसमुद्र और गङ्गानदी के मध्य में स्थित म्लेच्छ राजाओं को विद्याधरोंके साथ ही साथ जितेन्द्रिय श्रीकृष्णने शीघ्र ही वश कर लिया ।। १२० ।। इस प्रकार आधे भरतके स्वामी होकर श्रीकृष्णने, जिसमें बहुत ऊँची पताकाएँ फहरा रही हैं और जगह जगह तोरण बाँधे गये हैं ऐसी द्वारावती नगरी में बड़े हर्ष से प्रवेश किया ॥ १२१ ॥ प्रवेश करते ही देव और विद्याधर राजाओंने उन्हें तीन खण्डका स्वामी चक्रवर्ती मानकर उनका बिना कुछ कहे सुने ही अपने आप राज्याभिषेक किया ।। १२२ ॥ श्रीकृष्णकी एक हजार वर्षकी आयु थी, दश धनुषकी ऊँचाई थी, अतिशय सुशोभित नीलकमल के समान उनका वर्ण था, और लक्ष्मीसे श्रालिङ्गित उनका शरीर था ।। १२३ ।। चक्र, शक्ति, गदा, शङ्ख, धनुष, दण्ड, और नन्दक नामका खड्ग ये उनके सात रत्न थे। इन सभी रत्नोंकी देव लोग रक्षा करते थे । १२४ ॥ रत्नमाला, गदा, हल और मूसल ये देदीप्यमान चार महारत्न बलदेव प्रभुके थे ।। १२५ ।। रुक्मिणी, सत्यभामा, सती जाम्बवती, सुसीमा, लक्ष्मणा, गान्धारी, सप्तमी गौरी और प्रिया पद्मावती ये आठ देवियां श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ थीं। इनकी सब मिलाकर सोलह हजार रानियाँ थीं तथा बलदेवके सब मिलाकर अभीष्ट सुख देनेवाली आठ हजार रानियां थीं । ये दोनों भाई इन रानियोंके साथ देवोंके समान सुख भोगते हुए परम प्रीतिको प्राप्त हो रहे थे ॥१२६-१२८।। इस प्रकार पूर्व जन्ममें किये हुए अपने पुण्य कर्मके उदयसे पुष्कल भोगोंको भोगते हुए श्रीकृष्णका समय सुखसे व्यतीत हो रहा था। किसी एक समय शरद् ऋतुमें सब अन्तःपुरके साथ मनोहर नामके सरोवर में सब लोग मनोहर जलकेली कर रहे थे। वहीं पर जल उछालते समय भगवान् नेमिनाथ और सत्यभामा के बीच चतुराईसे भरा हुआ मनोहर वार्तालाप हुआ ॥ १२६१३०|| सत्यभामा ने कहा कि आप मेरे साथ अपनी प्रियाके समान क्रीड़ा क्यों करते हैं ? इसके उत्तर में नेमिराजने कहा कि क्या तुम मेरी प्रिया ( इष्ट ) नहीं हो ? सत्यभामा ने कहा कि यदि मैं आपकी प्रिया (स्त्री) हूं तो फिर आपके भाई (कृष्ण) किसके पास जायेंगे ? नेमिनाथने उत्तर दिया कि वे कामिनीके पास जावेंगे ? सत्यभामाने कहा कि सुनूँ तो सही वह कामिनी कौन सी है ? उत्तरमें मिनाथने कहा कि क्या तुम नहीं जानती ? अच्छा अब जान जाओगी । सत्यभामाने कहा कि १ सुमुच्छ्रितः ल० । २ - क्षपाटकैः ख०, ग० ।-क्षवारकैः ल० ( रक्षितान्यक्षपालकैः इति पाठः सुष्ठु भाति) ३ प्रभोः म० । ४ त्वं प्रियावत् ल० । ५ प्रिया चेत्तव भ्राता ल० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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