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________________ (एकसप्ततितम पर्व ३८१ सजनावयं निर्णिक्तसौवर्णोरुगलन्तिका । जलैराचम्य शुद्धाच्छक्षिप्रपूर्णजलाञ्जलिः ॥ ११ ॥ गन्धपुष्पादिभिर्विघ्नविनायकमनायकम् । भक्तथा जिनेन्द्रमभ्यर्थ्य भव्यकल्पमहीरुहम् ॥ १२ ॥ अभिवन्द्याप्तसामन्तैः समन्तात्परिवारितः । प्रतिपक्षमपक्षेप्तुं न्यक्षेणाभिमुखं ययौ ॥ १३ ॥ ततः कृष्णेन निर्दिष्टाः प्रशास्तृपरिचारिणः । सैन्यं यथोक्तविन्यासं रचयन्ति स्म रागिणः ॥ १४ ॥ जरासन्धोऽपि संग्रामरङ्गमध्यमधिष्ठितः । स्वसैन्यं निष्ठरारावैरध्यक्षरन्वयोजयत् ॥ ५५ ॥ इति विन्यासिते सैन्ये दध्वने समरानकैः । शूरधानुष्कनिर्भुक्तशरनाराचसङ्कलम् ॥ १६ ॥ नभो न्यरुणदुष्णांशुप्रसरत्करसन्ततिम् । वियोगमगमन्मोहात्तदास्तमयशङ्कया ॥ ९७ ॥ कोकयुग्मं विहङ्गाश्च रुवन्तो नीडमाश्रयन् । नेक्षन्ते स्म भटा योद्धमन्योन्यं समराङ्गणे ॥ १८ ॥ संक्रुद्धमरामातङ्गदन्तसङ्कटजन्मना । सप्ताचिषा विधूतेऽन्धकारे दिगवलोकनात् ॥ ९९ ॥ पुनः प्रवृत्तसंग्रामाः'सर्वशस्त्रविचक्षणाः । नदी रक्तमयीं चक्रुविक्रमैकरसाः क्षणम् ॥१०॥ करालकरवालाग्र निकराचरणद्वयाः। तुरङ्गमा गतिं प्रापुर्वने नष्टतपोधनाः ॥ १०१ ॥ विच्छिन्नचरणाः पेतुर्द्विपाः प्रान्तमहामा-1 निर्मूलपातितानीलविपुलाचललीलया ॥ १.२॥ पातितानां परैः स्तूयमानसाहसकर्मणाम् । प्रसादवन्ति वक्त्राणि स्थलपद्मश्रियं दधुः ॥ १०३ ॥ भटैः परस्परास्त्राणि खण्डितानि स्वकौशलात् । तत्खण्डैस्तत्र पार्श्वस्था बहवो व्यसवोऽभवन् ॥ १०४ ॥ इस प्रकार बन्दीजन उनका मङ्गलपाठ पढ़ रहे थे जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो चातकोंकी सुन्दर ध्वनिसे युक्त नवीन मेघ ही हो ॥६०। उन्होंने सजनोंके द्वारा धारण की हुई पवित्र सुवर्णमय झारीके जलसे आचमन किया, शुद्ध जलसे शीघ्र ही पूर्ण जलाञ्जलि दी और फिर गन्ध पुष्प आदि द्रव्योंके द्वारा विघ्नोंका नाश करने वाले, स्वामी रहित (जिनका कोई स्वामी नहीं) तथा भव्य जीवोंका मनोरथ पूर्ण करनेके लिए कल्पवृक्षके समान श्री जिनेन्द्र देवकी भक्तिपूर्वक पूजा की, उन्हें नमस्कार किया। तदनन्तर चारों ओर गुरुजनों और सामन्तोंको अथवा प्रामाणिक सामन्तोंको रखकर स्वयं ही शत्रुको नष्ट करने के लिए उसके सामने चल पड़े ॥६१-६३॥ तदनन्तर कृष्णकी आज्ञासे अनुराग रखनेवाले प्रशंसनीय परिचारकोंने यथायोग्य रीतिसे सेनाकी रचना की ।।४।। जरासन्ध भी संग्राम रूपी युद्धभूमिके बीचमें आ बैठा और कठोर सेनापतियोंके द्वारा सेनाकी योजना करवाने लगा ।। ६५ ।। इस प्रकार जब सेनाओंकी रचना ठीक-ठीक हो चुकी तब युद्धके नगाड़े बजने लगे। शूर-वीर धनुषधारियोंके द्वारा छोड़े हुए बाणोंसे आकाश भर गया और उसने सूर्यकी फैलती हुई किरणोंकी सन्ततिको रोक दिया-ढक दिया। 'सूर्य अस्त हो गया है। इस भयकी आशङ्कासे मोहवश चकवा-चकवी परस्पर विछुड़ गये। अन्य पक्षी भी शब्द करते हुए घोंसलोंकी ओर जाने लगे। उस समय युद्धके मैदानमें इतना अन्धकार हो गया था कि योद्धा परस्पर एक दसरेको देख नहीं सकते थे परन्तु कुछ ही समय बाद क्रुद्ध हुए मदान्मत्त हाथियोके दा से उत्पन्न हुई अग्निके द्वारा जब वह अन्धकार नष्ट हो जाता और सब दिशाएँ साफ-साफ दिखने लगतीं तब समस्त शस्त्र चलाने में निपुण योद्धा फिरसे युद्ध करने लगते थे। विक्रमरसप्ते भरे योद्धाओंने क्षण भरमें खूनकी नदियाँ बहा दीं॥६६-२००॥ भयङ्कर तलवारकी धारसे जिनके आगेके दो पैर कट गय है ऐसे घोड़े उन तपस्वियोंकी गतिका प्राप्त हो रहे थे जो कि तपध कर उसे छोड़ देते हैं । १०१ ॥ जिनके पैर कट गये हैं ऐसे हाथी इस प्रकार पड़ गये थे मानो प्रलय कालकी महावायुसे जड़से उखड़ कर नीले रङ्गके बड़े-बड़े पहाड़ ही पड़ गये हों ।। १०२॥ शत्रु भी जिनके साहसपूर्ण कार्योंकी प्रशंसा कर रहे हैं ऐसे पड़े हुए योद्धाओंके प्रसन्नमुखकमल, स्थल कमल (गुलाब) की शोभा धारण कर रहे थे । १०३ ॥ योद्धाओंने अपनी कुशलतासे परस्पर एक दुसरेके शस्त्र तोड़ डाले थे परन्तु उनके टुकड़ोंसे ही समीपमें खड़े हुए बहुतसे लोग मर र १संग्रामे ख०, ग०, घ० । २ निकुन्त ल० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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