SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 386
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३५८ महापुराणे उत्तरपुराणम यागव्याज समारभ्य स मन्त्री परितो गिरिम् । 'अर्थिताहारदानार्थ देवसन्तर्पणाय च ॥ २८१॥ पाकं प्रकल्पयामास धूमज्वालाग्निसन्ततम् । ज्ञात्वा विष्णुकुमारस्तमुपसर्ग मुनीश्वरः ॥ २८२॥ गत्वा पद्मरथाभ्यर्ण वीतरागासने स्थितः। राज्ञाभिवन्ध सम्पूज्य किं कृत्यमिति भाषितः॥R८३॥ उपसर्ग व्यधान्मन्त्री तवात्रातपयोगिनाम् । निवार्यतामसावाशु त्वयेत्याह महीपतिम् ॥ २८४ ॥ प्रतिपनं मया तस्मै राज्यं सप्तदिनावधि । न निवारयितुं शक्यः सत्यभेदभयादसौ ॥ २८५ ॥ ततो भवगिरेवार्य निवार्यों दुर्जनोऽधुना । न विदन्ति खलाः स्वैरा युक्तायुक्तविचेष्टितम् ॥ २८६ ॥ इत्यवोचदसौ चैतदवगम्य मुनीश्वरः । प्रतिषिध्यामि पापिष्ठमहमेवाशु नश्वरम् ॥ २८७ ॥ इति वामनरूपेण ब्राह्मणाकारमागतः । सम्प्राप्य बलिनोऽभ्यर्ण स्वस्तिवादपुरम्सरम् ॥ २८८ ॥ ४महाभागाहमर्थी त्वां दातृमुख्यमुपागमम् । देयं त्वयेत्यवादीत्सोप्यभीष्टं प्रतिपन्नवान् ॥ २८९ ॥ अभाषत द्विजो राजन् देयं मे विक्रमैत्रिभिः । प्रमितं क्षेत्रमित्यल्पं किमेतदभियाचितम् ॥ २९॥ गृहाणेति बली पाणिजलसेकसमन्वितम् । अदितास्मै मुनिश्चाप्त विक्रियद्धिं निजक्रमम् ॥ २९ ॥ ६न्यधादेकं प्रसार्योच्चैर्मानुषोत्तरमूर्धनि । द्वितीयमपि देवाद्रिचूलिकायां स्फुरद्युतिः ॥ २९२ ।। तदा विद्याधरा भूमिगोचराचार्य संहर । चरणौ स्रसृतेहेंतं क्रोधं मा स्म कृथा वृथा ॥ २९३ ॥ इति सङ्गीतवीणादिमुखरा मुनिसत्तमम् । सद्यः प्रसादयामासुः सोप्यंनी स्वौ समाहरत् ॥ २९४ ॥ श्रस्वा लक्षणवत्तेषां तदा गीतं सुधाशिनः । तुष्ट्वा घोषसुघोषाख्ये महाघोषाञ्च सुस्वराम् ॥ २९५ ॥ चाहता था ।। २७६-२८० ॥ पापी वलि मन्त्रीने यज्ञका बहाना कर उस सौम्य पर्वतके चारों ओर याचकोंको दान देने तथा देवताओंको सन्तुष्ट करनेके लिए पाक अर्थात् रसोई बनवाना शुरू किया जिससे धुआँ तथा ज्वालाओंका समूह चारों ओर फैलने लगा। जब मुनिराज विष्णुकुमारको इस उपसर्गका पता चला तो वे आकर राजा पद्मरथके पास गये और वीतराग आसन पर बैठ गये। राजा पद्मरथने उनकी बन्दना की, पूजा की तथा कहा कि मुझसे क्या कार्य है ? ॥२८१-२८३ ॥ मुनिराज विष्णुकुमारने राजा पद्मरथसे कहा कि तुम्हारे मन्त्रीने आतप योग धारण करनेवाले मुनियोंके लिए उपसर्ग कर रक्खा है उसे तुम शीघ्र ही दूर करो ।। २८४॥ उत्तरमें राजाने कहा कि मैं उसके लिए सात दिनका राज्य देना स्वीकृत कर चुका हूं अतः सत्यव्रतके खण्डित होनेके भयसे मैं उसे नहीं रोक सकता। हे पूज्य ! इस दुष्टका इस समय आप ही निवारण कीजिए। स्वच्छन्द रहनेवाले दुष्ट जन योग्य और अयोग्य चेष्टाओंको-अच्छे-बुरे कार्योंको नहीं जानते हैं ॥२८५२८६ ।। राजा पद्मरथने ऐसा उत्तर दिया, उसे सुनकर मुनिराजने कहा कि तो मैं ही शीघ्र नष्ट होनेवाले इस पापीको मना करता हूं ॥ २८७ ॥ इतना कहकर वे महामुनि वामन (बौने) ब्राह्मणका रूप रखकर वलिके पास पहुँचे और आशीर्वाद देते हुए बोले कि हे महाभाग ! आज तू दाताओंमें मुख्य है इसलिए मैं तेरे पास आया हूं तू मुझे भी कुछ दे। उत्तरमें वलिने इष्ट वस्तु देना स्वीकृत कर लिया। तदनन्तर ब्राह्मण वेषधारी विष्णुकुमार मुनिने कहा कि हे राजन्, मैं अपने पैरसे तीन पैर पृथिवी चाहता हूं यही तू मुझे दे दे। ब्राह्मणकी बात सुनकर वलिने कहा कि 'यह तो बहुत थोड़ा क्षेत्र है इतना ही क्यों माँगा ? ले लो, इतना कहकर उसने ब्राह्मणके हाथमें जलधारा छोड़कर तीन पैर पृथिवी दे दी। फिर क्या था ? मुनिराजने विक्रियाऋद्धिसे फैला कर एक पैर तो मानुषोत्तर पर्वतकी ऊँची शिखर पर रक्खा और देदीप्यमान कान्तिका धारक दूसरा पैर सुमेरु पर्वतकी चूलिका पर रक्खा ॥ २८८-२६२॥ उस समय विद्याधर और भूमिगोचरी सभी स्तुति कर मुनिराजसे कहने लगे कि हे प्रभो ! अपने चरणोंको संकोच लीजिए, या ही संसारका कारणभूत क्रोध नहीं कीजिए॥२६३॥ इस प्रकार सङ्गीत और वीणा आदिसे मुखर हुए भूमिगोचरियों और विद्याधरों ने शीघ्र ही उन मुनिराजको प्रसन्न कर लिया और उन्होंने भी अपने दोनों चरण संकोच लिये ।। २६४॥ उस समय उनका लक्षणसहित सङ्गीत सुनकर देव लोग बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने १ प्रार्थिता ग०। २ भाषितम् ख। ३ महीपतिः ग०, ल०। ४ महाभागाहमद्य त्वा ल०। आदितास्मै ल०। ६ व्यधादेकं म., ल० । ७ सुधासिनः ल०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy