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________________ सप्ततितमं पर्व ३५७ एवं तत्र स्थिते तस्मिन् धरागगनगोचराः। प्रापुर्गन्धर्वदत्तायाः स्वयंवरसमुत्सुकाः ॥ २६७ ॥ 'तान्स्वयंवरशालायां बहून् जितवती स्वयम् । तदानी गीतवादाभ्यां तत्कलारूपधारिणी ॥ २६८॥ चारुदत्तादिभिः श्रोतृपदमध्यासितैः स्तुता । कलाकौशलमेतस्या विलक्षणमिति स्फुटम् ॥ २६९ ॥ स्वोपाध्यायं तदापृच्छय कन्याभ्यर्णमुपागतः । वसुदेवोऽभणीद्वीणां विदोषामानयन्विति ॥ २७॥ तेऽपि तिनश्वतन्त्रश्च हस्ते वीणा: समर्पयन् । तासां तन्त्रीषु 'लोमांसं शल्यञ्चालोक्य सस्मितम्॥२७॥ सुम्बीफलेषु दण्डेषु शल्कपाषाणमप्यसौ । स्फुटीचकार तदृष्ट्वा स्वदिष्टा कीदृशी भवेत् ॥ २७२ ॥ वीणेति कन्यया प्रोक्को मदिष्टायाः समागमः। ईग्विध इति प्राह तत्राख्यानमीदृशम् ॥ २७३ ॥ हास्तिनास्यपुराधीशो राज्ञो मेघरथश्रुतेः। पद्मावत्याश्च सजातौ विष्णुपारथौ सुतौ ॥ २७४ ॥ सह विष्णुकुमारेण भूपतौ तपसि स्थिते । पश्चात्पभरथे राज्यमलङ्कर्वत्यथान्यदा ॥ २७५ ॥ प्रत्यन्तवासिसंक्षोभे समाते सचिवाग्रणी । सामादिभिरुपायैस्तं प्रशान्ति समजीगमत् ॥ २७६॥ राज्ञा तुष्टवतावादि त्वयेष्ट वाच्यतामिति । राज्यं सप्तदिनं कर्तुमिच्छामीत्यब्रवीद् बली ॥ २७७ ॥ दत्तं जरतणं मत्वा तेन तस्मै तर्जितम् । कृतोपकारिणे देयं किं न तस्कृतवेदिभिः ॥ २७८ ॥ तत्राकम्पनगुर्वाधमागत्य मुनिमण्डलम् । अग्रहीदातपे योग सर्व सौम्यमहीभृति ॥ २७९ ॥ निर्जिता प्राग्विदुविण्यामकम्पनमुनीशिना । वादे सभायां तत्कोपा जिघांसुरघात्मकः ।। २८०॥ ..." इस प्रकार कुमार वसुदेव वहाँ कुछ समय तक स्थित रहे। तदनन्तर गन्धर्वदत्ताके स्वयंवरमें उत्सुक हुए भूमिगोचरी और विद्याधर लोग एकत्रित होने लगे ।। २६७ ।। गाने बजानेकी कलाका रूप धारण करनेवाली गन्धर्वदत्ताने स्वयंवर शालामें आये हुए बहुतसे लोगोंको अपने गाने-बजानेके द्वारा तत्काल जीत लिया ॥२६८॥ वहाँ जो चारुदत्त आदि मुख्य मुख्य श्रोता बैठे थे वेस गन्धर्वदत्ताकी प्रशंसा कर रहे थे और कह रहे थे कि उसका कला-कौशल बड़ा ही विलक्षण हैसबसे अद्भुत है ।। २६६ ॥ तदनन्तर वसुदेव भी अपने गुरुसे पूछकर कन्याके पास गये और कहने लगे कि ऐसी वीणा लाओ जिसमें एक भी दोष नहीं हो ।। २७० ॥ लोगोंने तीन चार वीणाएँ वसुदेवके हाथमें सौंप दी । वसुदेवने उन्हें देखकर हँसते हुए कहा कि इन वीणाओंकी ताँतमें लोमांस नामका दोष है और तुम्बीफल तथा दण्डोंमें शल्क एवं पाषाण नामका दोष है। उन्होंने यह कहा ही नहीं किन्तु प्रकट करके दिखला भी दिया। यह देख कन्याने कहा कि तो फिर आप कैसी वीणा चाहते हैं? इसके उत्तर में कुमारने कहा कि मुझे जो वीणा इष्ट है उसका समागम इस प्रकार हा था। ऐसा कहकर उन्होंने निम्नांकित कथा सुनाई॥२७१-२७३ ॥ हस्तिनापुरके राजा मेघरथके पद्मावती रानीसे विष्णु और पद्मरथ नामके दो पुत्र हुए थे ।। २७४ ॥ कुछ समय बाद राजा मेघरथ तो विष्णुकुमार पुत्रके साथ तप करने लगे और पद्मरथ राज्य करने लगा। किसी अन्य समय समीपवर्ती किसी राजाने राज्यमें क्षोभ उत्पन्न किया जिसे प्रधान मन्त्री वलिने साम आदि उपायोंसे शान्त कर दिया। राजा पद्मरथने वलिके कार्यसे सन्तुष्ट होकर कहा कि 'तुझे क्या इष्ट है ? तू क्या चाहता है ?? सो कह ! उत्तरमें वलिने कहा कि मैं सात दिन तक राज्य करना चाहता हूँ । राजाने भी वलिकी इस माँगको जीर्णतृणके समान तुच्छ समझ उसे सात दिनका राज्य देना स्वीकृत कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि जो किये हुए उपकारको जानते हैं अर्थात् कृतज्ञ हैं वे उपकार करनेवालेके लिए क्या नहीं देते हैं ? ॥ २७५-२७८ ।। उसी समय अकम्पन गुरु आदि मुनियोंके समूहने हस्तिनापुर आकर वहाँ के सौम्य पर्वत पर आतापन योग धारण कर लिया। पहले जब वलि मन्त्री उज्जयिनी नगरीमें रहता था तब उसे अकम्पन गुरुने मय विद्वानोंकी सभामें जीत लिया था इसलिए वह पापी क्रोधसे उनका घात करना १ पठत्यत्र स्थिते ल० । २ सा ल० ।। समार्पयत् ल । ४ लौमश्यं ल० । ५-भणदस्मैतदूर्जितम् सर्वेल.. प्रागविदुषिण्या ल०। ख.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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