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________________ ३५४ महापुराणे उत्तरपुराणम् कुमार इति सञ्चिन्त्य तमाहूय मिथोऽब्रवीत् । "कुमार तव कामस्य छायाथेयमिवान्यथा ॥ २२५ ॥ वृथाटनं परित्याज्यं शीतवातादिषु त्वया । विहर्तुं परिवाञ्च्छा चेत्परितो राजमन्दिरम् ॥ २२६ ॥ धारागृहे वने रम्ये हर्म्ये विहितपर्वते । मन्त्रिसामन्तयोधाग्रमहामात्रात्मजैः समम् ॥ २२७ ॥ यथेष्टे विचरेत्येतत् श्रुत्वा सोऽपि तथाचरत् । आददत्यमृतं वाप्तवचनं शुद्धबुद्धयः ॥ २२८ ॥ एवं विहरमाणं तं वाचाटश्चेटकोsपरम् । नान्ना निपुणमत्याख्यो यथेष्टाचरणोत्सुकः ॥ २२९ ॥ राज्ञा त्वं प्रतिषिद्धोऽसि सोपायं निर्गमं प्रति । इत्यवादीदसौ चाह किमर्थमिति चेटकम् ॥ २३० ॥ सोsaatra निर्याणकाले रूपविलोकनात् । परे शिथिलचारित्रा मन्मथेनाकुलीकृताः ॥ २३१ ॥ वीजा विमर्यादा विपरीतविचेष्टिताः । पीतासवसमाः कन्याः सधवा विधवाश्च ताः ॥ २३२ ॥ काश्चित्प्रस्विन्नसर्वाङ्गाः काश्चिदर्द्धात्तलोचनाः । काश्चित्सन्त्यक्तसंयाताः काश्चित्यक्तार्द्ध भोजनाः ॥ २३३ ॥ अवमत्य गुरून् काश्चित्काश्चिन्निर्भर्त्स्य रक्षकान् । भर्तृनि विगणय्यान्याः पुत्रांश्चान्याश्च पुत्रकान् ॥ २३४ ॥ मत्वा मर्कटकान् काश्चित्समुत्क्षिप्य समाकुलाः । कम्बलं परिधायान्या विचिन्त्योत्कृष्टवाससी ॥ २३५॥ अङ्गरागं समालोच्य काश्विदालिप्य कर्दमम् । लोचने स्वे समालोच्य ललाटेभ्यस्तकज्जलाः ॥ २३६ ॥ स्वाः स्वास्तथाविधाः सर्वाः सवैरुद्विग्नमानसैः । निरीक्ष्य पौरैर्वाक्येन ज्ञापितोऽयं नरेश्वरः ॥ २३७ ॥ तवेदृशीमुपायेन व्यवस्थां पर्यकल्पयत् । इति संश्रुत्य तेनोक्त कुमारस्तत्परीक्षितुम् ॥ २३८ ॥ राजगेहाद्विनिर्गन्तुकामो दौवारिकैस्तदा " । तवामजस्य 'भो देव निर्देशोऽस्माकमीदृशः ॥ २३९ ॥ समुद्रविजयने विचार किया कि यदि इसे स्पष्ट ही मना किया जाता है तो संभव है यह विमुख हो जावेगा । इसलिए उन्होंने कुमार वसुदेवको एकान्तमें बुलाकर कहा कि 'हे कुमार! तुम्हारे शरीरकी कान्ति आज बदली-सी मालूम होती है इसलिए तुम्हें ठण्डी हवा आदिमें यह व्यर्थका भ्रमण छोड़ देना चाहिए । यदि भ्रमणकी इच्छा ही है तो राजभवनके चारों ओर धारागृह, मनोहर-वन, राजमन्दिर, तथा कृत्रिम पर्वत आदि पर जहाँ इच्छा हो मन्त्रियों, सामन्तों, प्रधान योद्धाओं अथवा महामन्त्रियोंके पुत्रों आदिके साथ भ्रमण करो ।' महाराज वसुदेवकी बात सुनकर कुमार वसुदेव ऐसा ही करने लगे सो ठीक ही है क्योंकि शुद्ध बुद्धिवाले पुरुष प्राप्तजनोंके वचनोंको अमृत जैसा ग्रहण करते हैं ।। २२४-२२८ ॥ कुमार इस प्रकार राजमन्दिरके आसपास ही भ्रमण करने लगे । एक दिन जिसे बहुत बोलने की आदत थी और जो स्वेच्छानुसार आचरण करनेमें उत्सुक रहता था ऐसा निपुणमति नामका सेवक कुमार वसुदेवसे कहने लगा कि इस उपाय से महाराजने आपको बाहर निकलनेसे रोका है । कुमारने भी उस सेवकसे पूछा कि महाराजने ऐसा क्यों किया है ? उत्तरमें वह कहने लगा कि जब आप बाहर निकलते हैं तब आपका सुन्दर रूप देखनेसे नगरकी स्त्रियोंका चारित्र शिथिल हो जाता है, वे कामसे आकुल हो जाती हैं, लज्जा छोड़ देती हैं, विपरीत चेष्टाएँ करने लगती हैं, कन्याएँ सधवाएँ और विधवाएँ सभी मदिरा पी हुईके समान हो जाती हैं, कितनी ही स्त्रियोंका सब शरीर पसीनासे तरबतर हो जाता है; कितनी ही स्त्रियोंके नेत्र आधे खुले रह जाते हैं, कितनी ही स्त्रियाँ पहननेके वस्त्र छोड़ देती हैं, कितनी ही भोजन छोड़ देती हैं, कितनी ही गुरुजनों का तिरस्कार कर बैठती हैं, कितनी ही रक्षकोंको ललकार देती हैं, कितनी ही अपने पतियोंकी उपेक्षा कर देती हैं, कितनी ही पुत्रोंकी परवाह नहीं करती हैं, कितनी ही पुत्रोंको बन्दर समझ कर दूर फेंक देती हैं, कितनी ही कम्बलको ही उत्तम वस्त्र समझकर पहिन लेती हैं, कितनी कीचड़को अङ्गराग समझकर शरीर पर लपेट लेती हैं और कितनी ही ललाटको नेत्र समझ कर उसी पर कज्जल लगा लेती हैं। अपनी-अपनी समस्त स्त्रियोंकी ऐसी विपरीत चेष्टा देख समस्त नगरनिवासी बड़े दुःखी हुए और उन्होंने शब्दों द्वारा महाराजसे इस बातका निवेदन किया । महाराजने भी इस उपाय से आपकी ऐसी व्यवस्था की है । निपुणमति सेवककी बात सुनकर उसकी परीक्षा १ ख०, ग०, ६०, म० सम्मतः पाठः । ल० पुस्तके तु 'कुमार वपुरेतत्ते पश्यामि किमिवान्यथा' इति पाठः । २ विचेष्टितम् ग० । ३ समाकुलान् ल० । ४_ स्वास्तास्तथा-ल० । ५ तथा म०, ल० | ६ ख०, ग०, प०, म०, संमतः पाठः, ल० पुस्तके तु 'तवाग्रजस्य देवस्य नादेशोऽस्माकमीदृशः' इति पाठः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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