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________________ — अष्टषष्टं पर्व ३२६ शार्दूलविक्रीडितम् भाननामरभूनभश्चरशिरःपीठोद्धताधिद्वयौ, निष्कण्टीकृतदक्षिणार्धभरताखण्डत्रिखण्डाधिपौ। साकेतं समधिष्ठितौ हतशुचिप्रोद्भासिभास्वत्प्रभौ दिप्रान्सद्विप दर्पसर्पशमनव्यप्रोग्रवीरश्रियौ ॥ ७२५ ॥ सीरादिप्रभृतिप्रसिद्धविलसद्रत्नावलीरम्जित __ श्रीसम्पादितभोगयोगसुखिनौ सर्वाथिसन्तर्पको । चन्द्रार्काविव तेजसा स्वयशसा विश्वं प्रकाश्य स्फुर्ट श्रीमन्तौ बलकेशवौ क्षितिमिमां सम्पाल्य साई चिरम् ॥२६॥ वसन्ततिलका एकबिलोकशिखरं सुखमध्यतिष्ठ __दन्यश्चतुर्थनरकावनिनायकोऽभूत् । भोग्य समेऽपि परिणामकृताद्विशेषा मा तव्यधादबुधवसुबुधो' निदानम् ॥७२७॥ देशे सारसमुपये नरपतिर्देवो नरादिस्ततः सौधर्मेनिमिषोऽभवत्सुखनिधिस्तस्माच्युतोऽस्मिनभूत् । आक्रान्ताखिलखेचरोज्ज्वलशिरोमालो विनम्यन्वये खीलोलो निजवंश केतुरहिताचाराप्रणी रावणः ॥७२८॥ आसीदिहैव मलये विषये महीश स्तुक् चन्द्रचूल इति दुचरितः समाप्य । पश्चात्तपोऽजनि सुरः स सनत्कुमारे तस्मादिहत्य समभूद्विभुईचक्री ॥ ७२९॥ खेतके समान शीघ्र ही निर्मूल कर दिया, जिन्होंने लक्ष्मीके साथ-साथ शत्रुसे सीताको छीन लिया, जिनके दोनों चरण, नम्रीभूत देव, भूमिगोचरी राजा तथा विद्याधरोंके मस्तकरूपी सिंहासन पर सदा विद्यमान रहते थे, जिन्होंने दक्षिण दिशाके अर्धभरत क्षेत्रको निष्कण्टक बना दिया था, जो समस्त तीन खण्डोंके स्वामी थे, अयोध्या नगरीमें रहते थे, जिनकी प्रभा ज्येष्ठ मासके सूर्यकी प्रभाको भी तिरस्कृत करती थी। जिनकी वीरलक्ष्मी दिशाओंके अन्तमें रहनेवाले दिग्गजोंके गर्व-रूपी सर्पको शान्त करनेमें सदा व्यग्र रहती थी, हल आदि प्रसिद्ध तथा सुशोभित रत्नोंकी पंक्तिसे अनुरञ्जित लक्ष्मीके द्वारा प्राप्त कराये हुए भोगोंके संयोगसे जो सदा सुखी रहते थे, जो समस्त याचकोंको संतुष्ट रखते थे, जो तेजप्ते चन्द्र और सूर्यके समान थे, और जिन्होंने अपने यशसे समस्त संसारको अत्यन्त प्रकाशित कर दिया था ऐसे श्रीमान् बलभद्र और नारायण पदवीके धारक रामचन्द्र और लक्ष्मण चिरकाल तक साथ ही साथ इस पृथिवीका पालन करते रहे । उन दोनोंमेंसे एक तो भोगोंकी समानता होनेपर भी परिणामोंके द्वारा की हुई विशेषतासे तीन लोकके शिखर पर सुखसे विराजमान हुआ और दूसरा चतुर्थ नरककी भूमिका नायक हुआ । इसलिए प्राचार्य कहते हैं कि विद्वानोंको मूर्खके समान कभी भी निदान नहीं करना चाहिये ।। ७२४-७२७ ।। रावणका जीव पहले सारसमुच्चय नामके देशमें नरदेव नामका राजा था। फिर सौधर्म स्वर्ग में सुखका भाण्डार-स्वरूप देव हुआ और तदनन्तर वहाँ से च्युत होकर इसी भरतक्षेत्रके राजा विनमि विद्याधरके वंशमें समस्त विद्याधरोंके देदीप्यमान मस्तकोंकी मालापर आक्रमण करनेवाला, स्त्रीलम्पट, अपने वंशको नष्ट करनेके लिए केतु (पुच्छलतारा) के समान तथा दुराचारियोंमें अग्रेसर रावण हुभा ॥७२८ ॥ लक्ष्मणका जीव पहले १ द्विपसर्पदर्पशमन-ल० । २ प्रबुधो क०, प० । ३ देवः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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