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________________ ३२४ महापुराणे उत्तरपुराणम् रस्नहारं तिरीटं च कुण्डलं शरमप्यमुम् । तीर्थाम्बुपूर्णकुम्भान्तर्गतमस्मै ददौ सुरः॥ ६५० ॥ ततोऽनुजलधिं गत्वा वैजयन्ताख्यगोपुरे । वशीकृत्य यथा प्राच्य तथा वरतनुं च तम् ॥ ६५१ ॥ कटकं साझादं चूलामणिं मौलिविभूषणम् । प्रैवेयकं ततश्चक्री कटीसूत्रं च लब्धवान् ॥ ६५२ ॥ ततः प्रतीचीमागत्य सबल: सिन्धुगोपुरे । प्रविश्याब्धि प्रभासं च विनतीकृत्य पूर्ववत् ॥ ६५३ ॥ मालां सन्तानकाख्यानां मुक्काजालप्रलम्बकम् । श्वेतच्छन्नं ततो भूषणान्यन्यान्यपि चाददौ ॥ ६५४ ॥ ततः सिन्धोस्तटे गच्छन् प्रतीचीखण्डवासिनः । स्वकीयां श्रावयित्वाज्ञां सारवस्तूनि चाददत् ॥६५५॥ ऐन्द्रस्याभिमुखो भूत्वा विजयाईनिवासिनः । विनमय्य गजाश्वासविद्याधरकुमारिकाः ॥६५६॥ . रत्नानि चात्मसात्कृत्य पूर्वखण्डनिवासिनः। विधाय करदान म्लेच्छान् विजयी निर्गतस्ततः ॥ ६५७॥ द्विगुणाष्टसहस्राणि 'पट्टबन्धान् महीभुजः । दशोत्तरशताख्यातपुराधीशान् खगेशिनः ॥ ६५८ ॥ त्रिखण्डवासिदेवांश्च विधायाशाविधायिनः। द्वाचत्वारिंशदब्दान्ते परिनिष्ठितृदिग्जयः ॥ ६५९ ॥ कृताअलिभिरासेव्यो देवखेचरभूचरैः। अग्रजाग्रेसरचक्री सचक्रः सर्वपूजितः ॥ ६६० ॥ कृतमङ्गलनेपथ्यां प्राय॑मानसमागमाम् । कान्तामिव विनीता तां शक्रवत्प्राविशत्पुरीम् ॥ ६६१ ॥ लग्नगोचरसंशुद्धशुभवेलादिससिधौ । नरविद्याधरा व्यन्तराधिपप्रमुखाः समम् ॥ ६६२ ॥ सिंहासनं समारोप्य श्रीमन्तौ रामलक्ष्मणौ । तीर्थाम्बुपूर्णसौवर्णसहस्राष्टमहाघटैः ॥ ६६३ ॥ अभिषिच्य त्रिखण्डाधिराज्ये सम्पूजितौ युवाम् । प्रवर्द्धमानलक्ष्मीकावाशारुयशोजुषौ ॥ ६६४ ॥ अल्प पुण्यवान् माना और यह महापुण्यशाली चक्रवर्ती है ऐसा समझकर लक्ष्मणकी स्तुति की। यही नहीं, उसने रत्नोंका हार, मुकुट, कुण्डल और उस वाणको तीर्थ-जलसे भरे हुए कलशके भीतर रखकर लक्ष्मणके लिए भेंट किया ॥ ६४६-६५० ॥ तदनन्तर समुद्रके किनारे-किनारे चलकर वैजयन्त नामक गोपुर पर पहुँचे और वहाँ पूर्वकी भाँति बरतनु देवको वश किया ॥ ६५१॥ उस देवसे लक्ष्मणने कटक, केयूर, मस्तकको सुशोभित करनेवाला चूडामणि, हार और कटिसूत्र प्राप्त किया ॥ ६५२ ॥ तदनन्तर रामचन्द्रजीके साथ ही साथ लक्ष्मण पश्चिम दिशाकी ओर गया और वहाँ सिन्धु नदीके गोपुर द्वारसे समुद्र में प्रवेश कर उसने पूर्वकी ही भांति प्रभास नामके देवको वश किया ॥६५३ ॥ प्रभास देवसे लक्ष्मणने सन्तानक नामकी माला, जिस पर मोतियोंका जाल लटक रहा है ऐसा सफेद छत्र, और अन्य-अन्य आभूषण प्राप्त किये ॥ ६५४ ।। तत्पश्चात् सिन्धु नदीके किनारे- . किनारे जाकर पश्चिम दिशाके म्लेच्छ खण्डमें रहनेवाले लोगोंको अपनी आज्ञा सुनाई और वहाँकी श्रेष्ठ वस्तुओंको ग्रहण किया ॥ ६५५ ॥ फिर दोनों भाई पूर्व दिशाकी ओर सन्मुख होकर चले और विजया पर्वत पर रहनेवाले लोगोंको वश कर उसने हाथी, घोड़े, अस्त्र, विद्याधर कन्याएँ एवं अनेक रत्न प्राप्त किये, पूर्व खण्डमें रहनेवाले म्लेच्छोंको कर देनेवाला बनाया और तदनन्तर विजयी होकर वहाँसे बाहर प्रस्थान किया ।। ६५६-६५७॥ इस प्रकार लक्ष्मणने सोलह हजार पट्टबन्ध राजाओंको, एक सौ दश नगरियोंके स्वामी विद्याधरोंको और तीन खण्डके निवासी देवोंको आज्ञाकारी बनाया था। उसकी यह दिग्विजय व्यालीस वर्षमें पूर्ण हुई थी। देव, विद्याधर तथा भूमिगोचरी राजा हाथ जोड़कर सेवा करते थे। इस तरह बड़े भाई रामचन्द्रजीके आगे-आगे चलने वाले चक्ररत्नके स्वामी एवं सबके द्वारा पूजित लक्ष्मणने, माङ्गलिक वेषभूषासे सुशोभित तथा समागमकी प्रार्थना करनेवाली कान्साके समान उस आयोध्या नगरीमें इन्द्रके समान प्रवेश किया।। ६५८-६६१ ।। तदनन्तर किसी शुद्ध लग्न और शुभ मुहूर्तके आनेपर मनुष्य, विद्याधर और व्यन्तर देवोंके मुखिया लोगोंने एकत्रित होकर श्रीमान् राम और लक्ष्मणको एक ही साथ सिंहासन पर विराजमान कर उनका तीर्थअलसे भरे हुए सुवर्णके एक हजार आठ बड़े-बड़े कलशोंसे अभिषेक किया। इस प्रकार उन्हें तीन खण्डके साम्राज्य पर विराजमान कर प्रार्थना की कि आपकी लक्ष्मी बढ़ती रहे और आपका यश दिशाओंके अन्त तक फैल जावे। प्रार्थना करनेके बाद उन्हें रत्नोंके बड़े-बड़े मुकुट बाँध, मणिमय १ पदबन्धान घ०। २ अयोध्याम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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