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________________ २८६ महापुराणे उत्तरपुराणम् महीयसो ऽप्युपायेन श्रीरप्याहियते बुधैः । इत्यतोऽमात्यमाय दृप्तौ दशरथात्मजौ ॥१२॥ जिगीषू मत्पदं दुष्टानुच्छेदाही कृतत्वरम् । पत्नी सीताभिधानाऽस्ति रामाख्यस्य दुरात्मनः ॥ ११३ ॥ तामाहरिष्ये तो हन्तु सदुपायं विचिन्तय । इत्यवोचस्स मारीचो विनयाकुञ्चिताअलिः ॥ ११४ ॥ शृणु भट्टारक स्वामिन् हितकार्यानुवर्तनम् । अहितप्रतिषेधश्च मन्त्रिकृत्यमिदं द्वयम् ॥११५॥ भवनिरूपितं कार्यमपथ्यमयशस्करम् । पापानुबन्धि दुःसाध्यमयोग्यं सद्विगहिंतम् ॥ ११६ ॥ अन्यदाराहतिर्नाम पातकेष्वतिपातकम् । को हि नाम कुले जातो जातुचिचिन्तयेदिति ॥ ११ ॥ अस्त्यन्योऽपि तदुच्छित्यामुपायः किमनेन ते । भवद्वंशविनाशैकहेतुना धूमकेतुना ॥ ११८ ॥ इत्याख्यत्सार्थकोपाख्यं तन्मारीचं वचो विधीः । नादादासन्नमृत्युत्वाद् दृष्टरिष्ट इवौषधम् ॥ ११९॥ गृहीतमेव नेत्येतनावादीच्चेति मन्त्रिणम् । किमनेन वृथा मन्त्रिन् वचनेनेष्टघातिना ॥ १२०॥ वेसि चेद् ब्रूहि सीतापहरणोपायमार्य मे । एवं तेनोच्यमानोऽसौ तव चेदेष निश्चयः ॥ १२१ ॥ परीक्ष्य 'सत्या सम्फल्या तस्यास्त्वय्यनुरक्तताम् । आनेया सा सुखेनैव स्निग्धोपायेन केनचित् ॥१२२॥ विरक्ता चेत्त्वया देव हठादाक्षिप्यतामिति । प्रत्याह तत्समाकर्ण्य प्रशंसन्साधु साध्विति ॥ १२३ ॥ तदैव कातरः सूर्पणखामाहृय केनचित् । प्रकारेण त्वया सीता मयि रक्ता विधीयताम् ॥ १२४ ॥ इत्याह सादरं सापि तत्सङ्गीयं विहायसि । तदेव रंहसा गत्वा प्रापद्वाराणसी पुरीम् ॥ १२५ ॥ चित्रकूटाभिधोयाने नन्दनाच्चातिसुन्दरे । रामो रन्तु तदा गत्वा वसन्ते सीतया सह ॥ १२६ ॥ और लक्ष्मण बड़े अहङ्कारी हो गये हैं। वे हमारा पद जीतना चाहते हैं इसलिए शीघ्र ही उनका उच्छेद करना चाहिए। दुष्ट रामचन्द्रकी सीता नामकी स्त्री है। मैं उन दोनों भाइयोंको मारनेके लिए उस सीताका हरण करूँगा। तुम इसका उपाय सोचो । जब रावण यह कह चुका तब मारीच नामका मन्त्री विनयसे हाथ जोड़ता हुआ बोला ॥ ११०-११४ ॥ कि हे पूज्य स्वामिन् ! हितकारी कार्यमें प्रवृत्ति कराना और अहितकारी कार्यका निषेध करना मन्त्रीके यही दो कार्य हैं ।। ११५ ॥ आपने जिस कार्यका निरूपण किया है वह अपथ्य है-अहितकारी है, अकीर्ति करनेवाला है, पापानुबन्धी है, दुःसाध्य है, अयोग्य है, सज्जनोंके द्वारा निन्दनीय है, परस्त्रीका अपहरण करना सब पापोंमें बड़ा पाप है, उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ ऐसा कौन पुरुष होगा जो कभी इस अकार्यका विचार करेगा ॥११६-११७ ॥ फिर उनका उच्छेद करनेके लिए दूसरे उपाय भी विद्यमान हैं अतः आपका वंश नष्ट करनेके लिए धूमकेतुके समान इस कुकृत्यके करनेसे क्या लाभ है ? ॥ ११८ ॥ इस प्रकार मारीचने सार्थक वचन कहे परन्तु जिस प्रकार निकटकालमें मरनेवाला मनुष्य औषध ग्रहण नहीं करता उसी प्रकार निबृद्धि रावणने उसके वचन ग्रहण नहीं किये ।। ११६॥ वह मारीचसे कहने लगा कि 'हम तुम्हारी बात नहीं मानते' यही तुमने क्यों नहीं कहा ? हे मन्त्रिन् ! इष्ट वस्तुका घात करने वाले इस विपरीत वचनसे क्या लाभ है ? ॥ १२० ।। हे आर्य ? यदि आप सीता-हरणका कोई उपाय जानते हैं तो मेरे लिए कहिये। इस प्रकार रावणके वचन सुन मारीच कहने लगा कि यदि आपका यही निश्चय है तो पहले दूतीके द्वारा इस बातका पता चला लीजिये कि उस सतीका आपमें अनुराग है या नहीं ? यदि उसका आपमें अनुराग है तो वह स्नेहपूर्ण किसी सुखकर उपायसे ही लाई जा सकती है और यदि आपमें विरक्त है तो फिर हे देव, हठ पूर्वक उसे ले आना चाहिए । मारीचके वचन सुनकर रावण उसकी प्रशंसा करता हुआ 'ठीक-ठीक ऐसा कहने लगा ॥१२१-१२३ ॥ उसी समय उस कायरने शूर्पणखाको बुलाकर कहा कि तू किसी उपायसे सीताको मुझमें अनुरक्त कर ॥ १२४ ॥ इस प्रकार उसने बड़े आदरसे कहा। शूर्पणखा भी इस कार्यकी प्रतिज्ञा कर उसी समय वेगसे आकाशमें चल पड़ी और बनारस जा पहुँची ॥ १२५॥ उस समय वसन्त ऋतु थी अतः रामचन्द्रजी नन्दन वनसे भी अधिक सुन्दर चित्रकूट नामक वनमें रमण करनेके लिए सीताके १ महीयसाप्युपायेन ख० । २ दुष्टारिष्ट-ख० । दृष्टारिठ-म० । ३ गृहीत एव ग० । ४ स्वस्या ल०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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