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________________ २८४ महापुराणे उत्तरपुराणम् इतो लङ्कामधिष्टाय त्रिखण्डभरतावनेः । अधीश्वरोऽहमेवेति गर्वपर्वतभास्करम् ॥ ८४ ॥ सम्भावयन्तमात्मानं रावणं शत्रुरावणम् । निजतेजःप्रतापापहसितोष्णांशुमण्डलम् ॥ ८५ ॥ दण्डोपनतसामन्तविनम्रमुकुटाग्रम-| स्फुरन्मणिमयूखाम्बुविकसच्चरणाम्बुजम् ॥ ८६ ॥ निजासने समासीन कीर्यमाणप्रकीर्णकम् । अवतीर्ण धराभागमिव नीलनवाम्बुदम् । ८७ ॥ आभाषमाणमाक्षिप्य' सभ्रभङ्ग भयङ्करम् । अनुजैरात्मजै लैर्भटैश्च परिवारितम् ॥ ८८॥ पिङ्गोत्तुङ्गजटाजूटप्रभापिारिताम्बरः । इन्द्रनीलाक्षसूत्रोरुवलयालङ्कृताङ्गुलिः ॥ ८९ ॥ तीर्थाम्बुसम्भृतोद्भासिपद्मरागकमण्डलुः। सुवर्णसूत्रयज्ञोपवीतपूतनिजाकृतिः ॥ १० ॥ खादेत्य नारदोऽन्येद्यः सोपद्वारं समैक्षत । तदालोक्य चिराद्भद्र दृष्टोऽसीति त्वयास्यताम् ॥ ९१ ॥ कौतस्कुतः किमर्थं वा तवागमनमित्यसौ । रावणेनानुयुक्तः सन् कुधीरिदमभाषत ॥ १२ ॥ हप्तदुर्जयभूपोग्रकरिकण्ठीरवायित । एतन्मनः समाधाय दशास्य श्रोतुमर्हसि ॥ ९३ ॥ वाराणसीपुरादद्य ममात्रागमनं विभो । तत्पुरीपतिरिक्ष्वाकुवंशाम्बरदिवाकरः ॥ १४ ॥ सुतो दशरथाख्यस्य रामनामातिविश्रतः । कुलरूपवयोज्ञानशौर्यसत्यादिभिर्गुणैः ॥ ९५ ॥ "अनणीयान् स्वपुण्येन स सम्प्रत्युदयोन्मुखः। तस्यै यज्ञापदेशेन स्वयमाहूय कन्यकाम् ॥ ९६ ॥ स्वनामश्रवणादेयगर्विकामुकचेतसम् । पर्याप्तस्त्रीगुणैकध्यवृत्तिसम्पत्कृताकृतिम् ॥ १७ ॥ वाले श्रेष्ठ कल्याणोंसे उनका समय व्यतीत हो रहा था ॥८१-८३ ।। इधर रावण, त्रिखण्ड भरतक्षेत्रका मैं ही स्वामी हूँ इस प्रकार अपने आपको गर्वरूपी पर्वत पर विद्यमान सूर्यके समान समभ लगा। वह शत्रुओंको रुलाता था इसलिए उसका रावण नाम पड़ा था। अपने तेज और प्रतापके द्वारा उसने सूर्य मण्डलको तिरस्कृत कर दिया था। दण्ड लेनेके लिए पास आये हुए सामन्तोंके नम्रीभूत मुकुटोंके अग्रभागमें जो देदीप्यमान मणि लगे हुए थे उनके किरणरूपी जलके भीतर उस रावणके चरणकमल विकसित हो रहे थे। वह अपने सिंहासन पर बैठा हआ था. उस पर चमर दुराये जा रहे थे जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो पृथिवी पर अवतीर्ण हुआ नीलमेघ ही हो। वह भौंह टेढ़ी कर लोगोंसे वार्तालाप कर रहा था जिससे बहुत ही भयङ्कर जान पड़ता था। छोटे भाई, पुत्र, मूलवगे तथा बहुतसे योद्धा उसे घेरे हुए थे॥८४-८|| ऐसे रावणके पास किसी एक दिन नारदजी आ पहुँचे। वे नारदजी अपनी पीली तथा ऊँची उठी हुई जटाओंके समूहकी प्रभासे आकाशको पीतवर्ण कर रहे थे, इन्द्रनीलमणिके बने हुए अक्षसूत्र-जयमालाको उन्होंने अपने हाथमें किसी बड़ी चूड़ीके आकार लपेट रक्खा था जिससे उनकी अङ्गुलियाँ बहुत ही सुशोभित हो रही थीं, तीर्थोदकसे भरा हुआ उनका पद्मराग निर्मित्त कमण्डलु बड़ा भला मालूम होता था और सुवर्णसूत्र निर्मित यज्ञोपवीतसे उनका शरीर पवित्र था। आकाशसे उतरते ही नारदजीने द्वारके समीप रावणको देखा। यह देख रावणने नारदसे कहा कि हे भद्र, बहुत दिन बाद दिखे हो, बैठिये, कहाँसे आ रहे हैं ? और आपका आगमन किसलिए हुआ है ? रावणके द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर दुर्बुद्धि नारद यह कहने लगा ।। ८६-६२॥ अहङ्कारी तथा दुर्जय राजारूपी क्रुद्ध हस्तियोंको नष्ट करनेमें सिंहके समान हे दशानन ! जो मैं कह रहा हूं उसे तू चित्त स्थिर कर सुन ॥६३ ॥ हे राजन् ! आज मेरा बनारससे यहाँ आना हुआ है। उस नगरीका स्वामी इक्ष्वाकुवंशरूपी आकाशका सूर्य राजा दशरथका अतिशय प्रसिद्ध पुत्र राम है। वह कुल, रूप, वय, ज्ञान, शूरवीरता तथा सत्य आदि गुणोंसे महान है और अपने पुण्योदयसे इस समय अभ्युदय-ऐश्वर्यके सन्मुख है। मिथिलाके राजा जनकने यज्ञके बहाने उसे स्वयं बुलाकर साक्षात् लक्ष्मीके समान अपनी सीता नामकी पुत्री प्रदान की है । वह इतनी सुन्दरी है कि अपना नाम सुनने मात्रसे ही बड़े-बड़े अहङ्कारी कामियोंके चित्तको ग्रहण कर लेती है--वश कर लेती है, संसारकी सब स्त्रियोंके गुणोंको इकट्ठा करके उनकी १-माभाष्य ल०, म०,। २-वीतपूजानिजाकृतिः ल०।३ सोपचारं ख०। ४ अनणीयः ल०। ५चेतसा क०, घ० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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