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________________ २७२ महापुराणे उत्तरपुराणम् सश्रुतो मद्गुरोधर्मभाता जगति विश्रुतः । स्थविरस्तेन च श्रौत रहस्य॑ प्रतिपादितम् ॥३९८॥ यागमृत्युफलं साक्षान्मयापि प्रकटीकृतम् । न चेत्ते प्रत्ययो विश्ववेदाम्भोनिधिपारगम् ॥३९९॥ वसुं प्रसिद्धं सत्येन पृच्छेरित्यन्वभाषत । तच्छ्रुत्वा नारदोऽवादीको दोषः पृच्छयतामसौ॥४०॥ इदं तावद्विचाराहं वधश्चेद्धर्मसाधनम् । अहिंसादानशीलादि भवेत्पापप्रसाधनम् ॥४.१॥ अस्तु चेन्मत्स्यबन्धादिपापिनां परमा गतिः । सत्यधर्मतपोब्रह्मचारिणो यान्त्वधोगतिम् ॥ ४.२ ॥ यज्ञे पशुवधाडौं नेतरत्रेति चेन तत् । वधस्य दुःखहेतुत्वे सारश्यादुभयन्त्र वा ॥४०३॥ फलेनापि समानेन भाव्यं कस्तनिषेधकः । अथ त्वमेवं मन्येथाः १पशुसृष्टेः स्वयम्भुवः ॥४०॥ यज्ञार्थत्वाब तस्यातिविनियोक्तुरधागमः । ४इत्येवं चातिमुग्धाभिलाषः साधुविगहिंतः॥४०५॥ तत्सर्गस्यैव साधुत्वादस्त्यन्यच्चान "दुर्घटम् । यदर्थ यद्धि तस्यान्यथोपयोगेऽर्थकृत तत् ॥१०॥ यथान्यथोपयुक्तं स श्लेष्मादिशमनौषधम् । यज्ञार्थपशुसर्गेण क्रयविक्रयणादिकम् ॥४०७॥ तथान्यथा प्रयुक्तं तन्महादोषाय कल्पते । दुर्बलं वादिनं दृष्ट्वा ग्रूमः त्वामभ्युपेत्य च ॥४०८॥ यथा शस्त्रादिभिः प्राणिव्यापादी वध्यतेऽहसा । मन्त्रैरपि पशून् हन्ता वध्यते निविशेषतः ॥४०९॥ पश्वादिलक्षणः सर्गो व्यज्यते क्रियतेऽथवा । क्रियते चेत्खपुष्पादि चासन्न क्रियते कुतः ॥४०॥ यह शास्त्र क्या नारदने भी पहले कभी नहीं सुना । इसके और मेरे गुरु पृथक् नहीं थे, मेरे पिता ही तो दोनोंके गुरु थे फिर भी यह अधिक गर्व करता है। मुझ पर ईर्ष्या रखता है अतः आज चाहे जो कह बैठता है। विद्वान स्थविर मेरे गुरुके धर्म भाई तथा जगत्में प्रसिद्ध थे, उन्हींने मुझे यह : श्रतियोंका रहस्य बतलाया है। यज्ञमें मरनेसे जो फल होता है उसे मैंने भी आज प्रत्यक्ष दिखला दिया है फिर भी यदि तुझे विश्वास नहीं होता है तो समस्त वेदरूपी समुद्रके पारगामी राजा वसुसे जो कि सत्यके कारण प्रसिद्ध है, पूछ सकते हो। यह सुनकर नारदने कहा कि क्या दोष है वसुसे पूछ लिया जावे ॥३६५-४०० ॥ परन्तु यह बात विचार करनेके योग्य है कि यदि हिंसा, धर्मका साधन मानी जायगी तो अहिंसा दान शील आदि पापके कारण हो जावंगे।। ४०१ ।। हो जावें यदि य आपका कहना है तो मछलियाँ पकड़नेवाले आदि पापी जीवोंकी शुभ गति होनी चाहिये और सत्य, धर्म, तपश्चरण तथा ब्रह्मचर्यका पालन करनेवालेको अधोगतिमें जाना चाहिए॥४०२॥ कदाचित् आप यह कहें कि यज्ञमें पशु वध करनेसे धर्म होता है अन्यत्र नहीं होता ? तो यह कहना भी ठीक नहीं हैं क्योंकि वध दोनों ही स्थानोंमें एक समान दुःखका कारण है अतः उसका फल समान ही होना चाहिए इसे कौन रोक सकता है ? कदाचित् आप यह मानते हों कि पशुओंकी रचना विधाताने यज्ञके लिए ही की है, अतः यज्ञमें पशु हिंसा करनेवालेके लिए पाप-बन्ध नहीं होता तो यह मानना ठीक नहीं है क्योंकि यह मूर्ख जनकी अभिलाषा है तथा साधुजनोंके द्वारा निन्दित है ॥४०३-४०५॥ यज्ञके लिए ही ब्रह्माने पशुओंकी स्मृष्टि की है यदि यह आप ठीक मानते है तो फिर उनका अन्यत्र उपयोग करना उचित नहीं है क्योंकि जो वस्तु जिस कार्यके लिए बनाई जाती है उसका अन्यथा उपयोग करना कार्यकारी नहीं होता। जैसे कि श्लेष्म आदिको शमन करनेवाली औषधिका यदि अन्यथा उपयोग किया जाता है तो वह विपरीतफलदायी होता है। ऐसे ही यज्ञके लिए बनाये गये पशुओंसे यदि क्रय-विक्रय आदि कार्य किया जाता है तो वह महान् दोष उत्पन्न करनेवाला होना चाहिए। तू बाद करना चाहता है परन्तु दुर्बल है-युक्ति बलसे रहित है अतः तेरे पास आकर हम कहते हैं कि जिस प्रकार शस्त्र आदिके द्वारा प्राणियोंका विघात करनेवाला मनुष्य पापसे बद्ध होता है उसी प्रकार मन्त्रोंके द्वारा प्राणियोंका विघात करनेवाला भी बिना किसी विशेषताके पापसे बद्ध होता है॥४०६-४०६ ।। दूसरी बात यह है कि ब्रह्मा जो पशु आदिको बनाता है वह प्रकट करता है अथवा नवीन बनाता है ? यदि नवीन बनाता है तो आकाशके फूल आदि असत् पदार्थ १ पशुसृष्टिः म०, ल.। २ यज्ञार्थत्वं न तस्यास्ति क०, घ०। ३ तस्याति ल.। ४ इत्ययं ल०। ५ दुर्घय ल०।६ प्रयुक्तं तु म०, ल०। ७ चासन्नः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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