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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् आयुषो वसतिः काये कायस्थस्य ममाप्यलम् । आयुर्जलं गलत्याशु मितकालघटीतम् ॥ ९॥ ततो गलति निःशेष न यावत्तावदेव हि। वाम्युत्सद्य सन्मार्गे जैने स्वर्गापवर्गयोः॥१०॥ इत्याशापाशमाच्छिद्य बहुभिः सह निस्पृहः । राजलक्ष्म्या स्वतन्त्रोऽपि दीक्षालक्ष्म्या वशीकृतः॥७॥ तपस्यन् सुचिर ती विस्पष्टैकादशाङ्गकः । नाम्नोऽन्त्यमेष पुण्यात्मा स्वकार्षीझावनापरः ॥ १२॥ आयुषोऽन्ते समाधान विधाय परमेष्ठिषु । त्रयविंशत्समुद्रायुरयात् स ४विजयं जयी॥१३॥ तत्रादायाद्यसंस्थानं "शुक्ललेश्याद्वयान्वितः । हस्तोच्छ्रार्य शुभं देहं सुवर्णादिचतुष्टयम् ॥ १४ ॥ मासैः षोडशभिः पञ्चदशभिश्वोच्छवसन् दिनैः । त्रयस्त्रिंशत्सहसाब्दै निसाहारमाहरन् ॥ १५ ॥ निजतेजोऽवधिव्यातलोकनालिनिजावधिः । क्षेत्रोत्थापिबलस्तत्पूरककायजविक्रियः ॥ १६ ॥ सातपञ्चशुभैः सौख्यमप्रवीचारमन्वभूत् । सप्रवीचारसत्सौख्यात्तदनन्तगुणाधिकम् ॥ १७ ॥ तस्मान्महीं 'महाभागे स्वर्गाद्वोरागमिष्यति । प्रागेव भावनोपात्ततीर्थकृन्नामपुण्यतः ॥ १८ ॥ द्वीपेऽस्मिन् भारते वर्षे साकेतनगराधिपः । इक्ष्वाकुर्जितशवाख्यः ख्यातो गोत्रेण काश्यपः ॥ १९॥ तस्य शक्राज्ञया गेहे षण्मासान् प्रत्यहं मुहुः । रवान्यैलविल स्तिस्रः कोटीः सार्ध न्यपीपतत् ॥२०॥ ज्येष्ठे मासि कलाशेषशशिरोहिण्युपागमे । मुहूर्ताद् ब्रह्मणः पूर्व °दरनिद्राविलेक्षणाम् ॥ २१ ॥ 'इस जीवका शरीरमें जो निवास हो रहा है वह आयुकर्मसे ही होता है, मैं यद्यपि शरीरमें स्थित हूँ तो भी कालकी परिमित घाड़यों में धारण किया हुआ मेरा आयुरूपी जल शीघ्र ही गलता जाता है-उत्तरोत्तर कम होता जाता है इसलिए मेरा वह आयुरूपी जल जब तक समाप्त नहीं होता नब तक मैं स्वर्ग और मोक्षके मार्गभूत जैनधर्ममें उत्साहके साथ प्रवृत्ति करूँगा'॥६-१०॥ इस प्रकार आशारूपी पाशको छेदकर वह राजा राज्यलक्ष्मीसे निस्पृह हो गया तथा स्वाधीन होनेपर भी अनेक राजाओंके साथ दीक्षारूपी लक्ष्मीके द्वारा अपने आधीन कर लिया गया अर्थात् अनेक राजाओंके साथ उसने जिन-दीक्षा धारण कर ली ॥ ११ ॥ जिसने बहुत समय तक तीन तपस्या की है, जिसे ग्यारह अङ्गोंका स्पष्ट ज्ञान हो गया है, जिसकी आत्मा पुण्यके प्रकाशसे जगमगा रही है और जो दर्शनविशुद्धि आदि सोलह भावनाओंके चिन्तनमें निरन्तर तत्पर रहता है ऐसे इस विमलवाहनने तीर्थंकर नामकमका बन्ध किया ॥१२॥ इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनेवाला वह विमलवाहन आयुके अन्त समय पञ्चपरमेष्ठियोंमें चित्त स्थिरकर-समाधिमरण कर तैंतीस सागरकी आयुका धारक हो विजय नामक अनुत्तरविमानमें पहुँचा ॥१३॥ वहाँ वह द्रव्य और भाव दोनों ही शुक्ललेश्याओंसे सहित था तथा समचतुरस्त्रसंस्थानसे युक्त एक हाथ ऊँचे एवं प्रशस्त रूप, रस, गन्ध, स्पर्शसे सम्पन्न शुभ शरीरको लेकर उत्पन्न हुआ था, सोलह महीने और पन्द्रह दिन बाद उच्छ्वास लेता था, तैंतीस हजारवर्ष बाद मानसिक आहार ग्रहण करता था, उसने अपने अवधिज्ञानके द्वारा लोकनाड़ीको व्याप्त कर रखा था अर्थात् लोकनाड़ी पर्यन्तके रूपी पदार्थोंको वह अपने अवधिज्ञानसे देखता था, उसमें लोकनाड़ीको उखाड़कर दूसरी जगह रख देनेकी शक्ति थी, वह उतने ही क्षेत्र में अपने शरीरकी विक्रिया भी कर सकता था और सुखस्वरूप पंचेन्द्रियों के द्वारा प्रवीचारजन्य सुखसे अनन्तगुणा अधिक अप्रवीचार सुखका उपभोग करता था ॥ १४-१७ ॥ उस महाभागके स्वर्गसे पृथिवीपर अवतार लेनेके छह माह पूर्वसे ही प्रतिदिन तीर्थकर नामक पुण्यप्रकृतिके प्रभावले जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रके अधिपति इक्ष्वाकुवंशीय काश्यपगोत्री राजा जितशत्रुके घरमें इन्द्रकी आज्ञासे कुबेरने साढ़े तीन करोड़ रनोंकी वृष्टि की।। १८-२० ।। तदनन्तर जेठ महीनेकी अमावसके दिन जबकि रोहिणी नक्षत्रका कला मात्रसे अवशिष्ट चन्द्रमाके साथ १ ममाप्यरं ख०। ममापरम् ग०,क०,५०) २ गलत्यश्रु क०,ख०,ग०,५०। ३ नाम्नोऽन्त्यं शेष क०,ख०, ग०, घ०। ४ विजयनामानुत्तरविमानम् । ५ द्रव्यतो भावतश्च शुक्ललेश्यासहितः । ६-मनसाहार-क० ख०, ग०, घ०। ७ निजावधि-क्षेत्रो क०, ग०, घ०। ८ महाभागस्याग्राद्गोरागमिष्यतः क०, ख०, ग०। ६ कुबेरः । १० ईषन्निद्राकलुषितलोचनाम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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