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________________ महापुराणम् तदन्तर्गतं श्रीमद्-गुणभद्रविरचितम् उत्तरपुराणम् अष्टचत्वारिंशत्तम पर्व श्रीमान् जिनोऽजितो जीयाद् यद्वचास्यमलान्यलम् । क्षालयन्ति जलानीव विनेयानां मनोमलम् ॥१॥ पुराणं तस्य वक्ष्येऽहं मोक्षलक्ष्मीसमागमः । श्रुतेन येन भव्यानामव्याहतमहोदयः ॥ २॥ इह जम्बूमति द्वीपे विदेहे प्राचि विश्रते । सीतासरिदपागभागे वत्साख्यो विषयो महान् ॥ ३॥ सुसीमानगर तस्मिन् विभूत्या विस्मयावहम् । नाम्नास्यनृपतिः प्राभूत् प्रभुर्विमलवाहनः ॥ ४॥ गुणा गुर्णाथिभिः प्रार्थ्या न्यायोऽयं चित्रमन्न तत् । गुणाः प्रणयिनःसर्वे स्वयं तं 'वृण्वते स्म यत् ॥ ५॥ शक्तिसिद्धियोपेतो यथान्यायमतन्द्रितः । प्रजाः स पालयामास विधाय स्वप्रजासमाः ॥ ६ ॥ धर्मादयस्ततोऽर्थोऽर्थात् कामोऽयेऽनिष्टिते, न तौ । इति स्मरन् बभूवासी जैनधर्मेण धार्मिकः ॥७॥ स कदाचित् समुत्पन्नबोधिः सज्वलनोदयी। स्वगतं जातसंवेदो रहस्येवमचिन्तयत् ॥ ८॥ अनन्तचतुष्टय रूप अन्तरङ्ग लक्ष्मी और अष्टप्रातिहार्य रूप बहिरङ्ग लक्ष्मीसे युक्त वे अजितनाथ स्वामी सदा जयवन्त रहें जिनके कि निर्दोष-पूर्वापरविरोध श्रादि दोषोंसे रहित वचन, जलकी तरह भव्य जीवोंके मनमें स्थित रागद्वेषादिरूप मलको धो डालते हैं ॥ १॥ मैं उन अजितनाथ स्वामीके उस पुराणको कहूँगा जिसके कि सुननेसे भव्य जीवोंको बाधाहीन महाभ्युदयसे युक्त मोक्षरूपी लक्ष्मीका समागम प्राप्त हो जाता है ॥२॥ इस जम्बूद्वीपके अतिशय प्रसिद्ध पूर्वविदेह क्षेत्रमें सीता नदीके दक्षिण तटपर वत्स नामका विशाल देश है ॥ ३॥ उसमें अपने वैभवसे आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला सुसीमा नामका नगर है। किसी समय इस सुसीमा नगरका राजा विमल वाहन था जो बड़ा ही प्रभावशाली था ॥४॥ संसारमें यह न्याय प्रसिद्ध है कि गुणोंकी चाह रखनेवाले मनुष्य गुणोंकी खोज करते हैं परन्तु इस राजामें यह आश्चर्यकी बात थी कि स्नेहसे भरे हुये सभी गुण अपने आप ही आकर रहने लगे थे॥५॥ वह राजा उत्साह शक्ति, मन्त्रशक्ति और फलशक्ति इन तीन शक्तियोंसे तथा उत्साहसिद्धि, मन्त्रसिद्धि और फलसिद्धि इन तीन सिद्धियोंसे सहित था, आलस्यरहित था और अपनी सन्तानके समान न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करता था ॥६॥ "धर्मसे पुण्य होता है, पुण्यसे अर्थकी प्राप्ति होती है और अर्थसे काम-अभिलषित भोगोंकी प्राप्ति होती है, पुण्यके बिना अर्थ और काम नहीं मिलते हैं। यही सोचकर वह राजा जैनधर्मके द्वारा सञ्चा धर्मात्मा हो गया था॥७॥ किसी समय उस राजाके अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषायका उदय दूर होकर सिर्फ संज्वलन कषायका उदय रह गया उसी समय उसे आत्मज्ञान अथवा रत्नत्रयकी प्राप्ति हुई और वह संसारसे विरक्त हो मन ही मन एकान्तमें इस प्रकार विचार करने लगा ।।। १ वणते क०, ख०, ग०, घ०। २ पुण्यम् । ३ पुण्ये । ४ अपूर्णे। ६ स्वागतं ग०। ५ अर्थकामौ न भवतः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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