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________________ सप्तषष्टितम पर्व २५७ सलेखोपायनं सन्तं नृपं दशरथं प्रति । तथान्यांश्च महीट्सूनून दूतानानेतुमादिशत् ॥१८॥ अयोध्येशोऽपि लेखार्थ दूतोक चावधारयन् । तत्प्रयोजननिश्चित्यै मन्त्रिणं पृच्छति स्म सः॥ १८ ॥ जनकोक्त निवेद्यात्र किं कार्य क्रियतामिति । इदमागमसाराख्यो मन्त्र्यवोचद्वचोड शुभम् ॥ १८३ ॥ निरन्तरायसंसिद्धौ यागस्योभयलोकजम् । हितं कृतं भवेत्तस्माद्गतिरस्त्वनयोरिति ॥ १८४ ॥ वचस्यवसिते तस्य तदुक्तमवधार्य सः। प्रजल्पति स्मातिशयमत्याख्यो मन्त्रिणां मतः १८५॥ धर्मो यागोऽयमित्येतत्प्रमाणपदवीं वचः। न प्रामोत्यत एवात्र न वर्तन्ते मनीषिणः॥१८६॥ प्रमाणभूर्य वाक्यस्य वक्तृप्रामाण्यतो भवेत् । सर्वप्राणिवधाशंसियज्ञागमविधायिनः ॥ १७ ॥ कथमुन्मत्तकस्येव प्रामाण्यं विप्रवादिनः । विरुद्धालपितासिद्धानेति चेद्वेदवादिनः ॥ १८८॥ सिद्ध वैकत्र घातोक्तरन्यत्रैतनिषेधनात् । स्वयंभूत्वाददोषोऽस्य विरोधे सत्यपीत्यसत् ॥ १८९ ॥ प्रष्टव्योऽसि स्वयम्भूत्वं कीदृशं तु तदुच्यताम् । बुद्धिमत्कारणस्पन्दसम्बन्धनिरपेक्षणम् ॥ १९ ॥ स्वयम्भूत्वं भवेन्मेघभेकादीनां च सा गतिः। ततः सर्वज्ञनिर्दिष्टं सर्वप्राणिहितात्मकम् ॥ १९ ॥ ज्ञेयमागमशब्दाख्यं सर्वदोषविवर्जितम् । वर्तते 'यज्ञशब्दश्च दानदेवर्षिपूजयोः ॥ १९२॥ यागो यज्ञः क्रतुः पूजा सपर्येज्याध्वरो मखः । मह इत्यपि पर्यायवचनान्यर्चनाविधेः ॥ १९३ ।। यज्ञशब्दाभिधेयोरुदानपूजास्वरूपकात् । धर्मात्पुण्यं समावय॑ तरपाकादिविजेश्वराः ॥१९४॥ जा तथा उससे निम्न सन्देश कहलाया। आप मेरी यज्ञकी रक्षाके लिए शीघ्र ही राम तथा लक्ष्मणको भेजिये। यहाँ रामके लिए सीता नामक कन्या दी जावेगी। राम-लक्ष्मणके सिवाय अन्य राज्यपुत्रोंको बुलानेके लिए भी अन्य अन्य दूत भेजे ॥ १७६-१८१ ॥ अयोध्याके स्वामी राजा दशरथने भी पत्रमें लिखा अर्थ समझा, दूतका कहा समाचार सुना और इस सबका प्रयोजन निश्चित करनेके लिए मन्त्रीसे पूछा ॥ १८२ ।। उन्होंने राजा जनकका कहा हुआ सब मन्त्रियोंको सुनाया और पूछा कि क्या कार्य करना चाहिये ? इसके उत्तरमें आगमसार मन्त्री निम्नाङ्कित अशुभ वचन कहने लगा कि यज्ञके निर्विघ्न समाप्त होनेपर दोनों लोकोंमें उत्पन्न होनेवाला हित होगा और उससे इन दोनों कुमारोंकी उत्तम गति होगी। १८३-१८४॥ आगमसारके वचन समाप्त होनेपर उसके कहे हुएका निश्चयकर अतिशयमति नामका श्रेष्ठ मन्त्री कहने लगा कि यज्ञ करना धर्म है यह वचन प्रमाणकोटिको प्राप्त नहीं है इसीलिए बुद्धिमान् पुरुष इस कार्य में प्रवृत्त नहीं होते हैं ॥१८५-१८६ ॥ वचनकी प्रमाणता वक्ताकी प्रमाणतासे होती है । जिनमें समस्त प्राणियोंकी हिंसाका निरूपण है ऐसे यज्ञप्रवर्तक आगमका उपदेश करनेवाले विरुद्धवादी मनुष्यके वचन पागल पुरुषके वचनके समान प्रामाणिक कैसे हो सकते हैं। यदि वेदका निरूपण करनेवाले परस्पर विरुद्धभाषी न हों तो उसमें एक जगह हिंसाका विधान और दूसरी जगह उसका निषेध ऐसे दोनों प्रकारके वाक्य क्यों मिलते ? कदाचित् यह कहो कि वेद स्वयंभू है, अपने आप बना हुआ है अतः परस्पर विरोध होनेपर भी दोष नहीं है। तो यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि आपसे यह पूछा जा सकता है कि स्वयंभूपना कैसा है-इसका क्या अर्थ है ? यह तो कहिये। यदि बुद्धिमान् मनुष्यरूपी कारणके हलन-चलनरूपी सम्बन्धसे निरपेक्ष रहना अर्थात् किसी भी बुद्धिमान् मनुष्यके हलन-चलनरूपी व्यापारके बिना ही वेद रचा गया है अतः स्वयंभू है। स्वयंभूपनका उक्त अर्थ यदि आप लेते हैं तो मेघोंकी गर्जना और मेंढकोंकी टर्रटर्र इनमें भी स्वयंभूपन आ जावेगा क्योंकि ये सब भी तो अपने आप ही उत्पन्न होते हैं। इसलिए आगम वही है-शास्त्र वही है जो सर्वज्ञके द्वारा कहा हुआ हो, समस्त प्राणियोंका हित करनेवाला हो और सब दोषोंसे रहित हो। यज्ञ शब्द, दान देना तथा देव और ऋषियोंकी पूजा करने अर्थमें आता है ॥ १८७-१६२॥ याग, यज्ञ, ऋतु, पूजा, सपर्या, इज्या, अध्वर, मख, और मह ये सब पूजाविधिके पर्यायवाचक शब्द हैं ॥ १६३ ।। यज्ञ शब्दका वाच्यार्थ जो बहुत भारी दान देना और पूजा करना है तत्स्वरूप धर्मसे ही लोग पुण्यका सञ्चय १ वचः शुभम् ख०। २ यत्र ल०। ३३ Jain Education Internanonal For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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