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________________ २५६ महापुराणे उत्तरपुराणम् कारणं प्रकृतं भावि रामलक्ष्मणयोरिदम् । मिथिलानगराधीशो जनकस्तस्य वल्लभा ॥१६६ ॥ सुरूपा वसुधादेवी विनयादिविभूषिता । सुता सीतेत्यभूतस्याः सम्प्राप्तनवयौवना ॥१६॥ तां वरीतुं समायातनृपदूतान् महीपतिः । ददामि तस्मै दैवानुकूल्यं यस्येति सोऽमुचत् ॥ १६८॥ नृपः.कदाचिदास्थानी विद्वजनविराजिनीम् । आस्थाय कार्यकुशलं कुशलादिमतिं हितम् ॥ १६९ ॥ सेनापति समप्राक्षीत् प्राक्प्रवृत्तं कथान्तरम् । पुरा किलात्र सगरः सुलसा चाहुतीकृता॥ १७॥ परे चाश्चादयः प्रापन् सशरीराः सुरालयम् । इतीदं श्रयतेऽद्यापि यागेन यदि गम्यते ॥ ११ ॥ स्वर्लोकः क्रियतेऽस्माभिरपि याज्ञो यथोचितम् । इति तद्वचनं श्रुत्वा स सेनापतिरब्रवीत् ॥ १७२॥ नागासुरैः सदा क्रर्मात्सर्येण परस्परम् । अन्योन्यारब्धकार्याणां प्रतिघातो विधीयते ॥१३॥ अयं चाय महाकालेनासुरेण नवो विधिः । याज्ञो विनिर्मितस्तस्य विधातः शङ्कयतेऽरिभिः ॥ १७ ॥ नागराडपक ऽभूनमेश्च विनमेरपि । ततो यागस्य हन्तारः खगास्तत्पक्षपातिनः ॥ १७५ ॥ यागः सिद्धयति शक्तानां तद्विकारख्यपोहने । यद्यप्येतन बुध्येरन् रूप्यशैलनिवासिनः ॥ १७६ ॥ निश्चितो' रावणः शौर्यशाली मानग्रहाहितः। तस्मात्रागपि शकास्ति स कदाचित् विघातकृत् ॥१७७॥ स्यात्तद्रामाय शक्ताय दास्यामः कन्यकामिमाम् । इति तद्वचनं सर्वे तुष्टुवुस्तत्सभासिनः ॥ १७८ ॥ निरचिन्वंश्च भूपेन साकं तत्कार्यमेव ते । तदैव जनको दूतं प्राहिणोद्रामलक्ष्मणौ ॥ १७९॥ मदीययागरक्षार्थ प्रहेतब्यौ कृतत्वरम् । रामाय दास्यते सीता चेति शासनहारिणम् ॥ १८॥ तथा शत्रुघ्न नामके दो पुत्र और हुए थे। रावणको मारनेसे राम और लक्ष्मणका जो यश होने वाला था उसका एक कारण था-वह यह कि उसी समय मिथिलानगरीमें राजा जनक राज्य करते थे। उनकी अत्यन्त रूपवती तथा विनय आदि गुणोंसे विभूषित वसुधा नामकी रानी थी। राजा जनक की वसुधा नामकी रानीसे सीता नामकी पुत्री उत्पन्न हुई थी। जब वह नवयौवनको प्राप्त हुई तब उसे बरनेके लिए अनेक राजाओंने अपने-अपने दूत भेजे । परन्तु राजाने यह कह कर कि मैं यह पुत्री उसीके लिए दूंगा जिसका कि दैव अनुकूल होगा, उन आये हुए दूतोंको विदा कर दिया ॥१६५-१६८।। अथानन्तर-किसी एक समय राजा जनक विद्वज्जनोंसे सुशोभित सभामें बैठे हए थे। वहीं पर कार्य करनेमें कुशल तथा हित करनेवाला कुशलमति नामका सेनापति बैठा था। राजा जनकने उससे एक प्राचीन कथा पूछी। वह कहने लगा कि 'पहले राजा सगर रानी सुलसा तथा घोड़ा आदि अन्य कितने ही जीव यज्ञमें होमे गये थे। वे सब शरीर सहित स्वर्ग गये थे। यह बात सुनी जाती है। यदि आज कल भी यज्ञ करनेसे स्वर्ग प्राप्त होता हो तो हमलोग भी यथा योग्य रीतिसे यज्ञ करें।। राजाके इस प्रकार बचन सुनकर सेनापति कहने लगा कि सदा क्रोधित हुए नागकुमार और असुरकुमार परस्परकी मत्सरतासे एक दूसरेके प्रारम्भ किये हुए कार्यों में विघ्न करते हैं ॥१६६-१७३।। चूंकि यज्ञ की यह नई रीति महाकाल नामक असुरने चलाई है अतः प्रतिपक्षियोंके द्वारा इसमें विघ्न किये जानेकी आशंका है। १७४ ।। इसके सिवाय एक बात यह भी है कि नागकुमारोंके राजा धरणेन्द्रने नमि तथा विनमिका उपकार किया था इसलिए उसका पक्षपात करने वाले विद्याधर अवश्य ही यज्ञका विघात करेंगे ॥ १७५ ॥ यज्ञ उन्हींका सिद्ध हो पाता है जो कि उसके विघ्न दूर करने में समर्थ होते हैं। यद्यपि विजया पर्वतपर रहने वाले विद्याधरोंको इसका पता नहीं चलेगा यह ठीक है तथापि यह निश्चित है कि उनमें रावण बड़ा पराक्रमी और मानरूपी ग्रहसे अधिष्ठित है उससे इस बातका भय पहलेसे ही है कि कदाचित् वह यज्ञमें विघ्न उपस्थित करे ॥ १७६-१७७ ॥ हाँ, एक उपाय हो सकता है कि इस समय रामचन्द्रजी सब प्रकारसे समर्थ हैं उनके लिए यदि हम यह कन्या प्रदान कर देंगे तो वे सब विघ्न दूर कर देंगे। इसप्रकार सेनापतिके वचनोंकी सभामें बैठे हुए सब लोगोंने प्रशंसा की ।। १७८ ॥ राजा जनकके साथ ही साथ सब लोगोंने इस कार्यका निश्चय कर लिया और राजा जनकने उसी समय सत्पुरुष राजा दशरथके पास पत्र तथा भेंटके साथ १ निश्चिन्तो क.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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