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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् तदाकर्ण्य भवत्प्रीत्या खगौ तावागताविमौ । इति मेघरथात्सर्वमाकर्ण्यात्मीयविग्रहम् ॥ १८३ ॥ प्रकटीकृत्य तौ भूपं कुमारं चाभिपूज्य तम् । गत्वा गोवर्द्धनोपान्ते दीक्षासिद्धिमवापताम् ॥ १८४ ॥ स्वपूर्वभवसम्बन्धं विदित्वा कुक्कुटौ च तौ । मुक्त्वा परस्पराबद्धवैरं संन्यस्य साहसात् ॥ १८५ ॥ अभूतां भूतदेवादिरमणान्तवनद्वये । ताम्रादिचूलचूलान्तकनकौ भूतजातिजौ ॥ १८६ ॥ 1 I तदैवागत्य तौ देवौ प्रीत्या मेघरथाह्वयम् । सम्पूज्याख्याय सम्बन्धं स्वजन्मान्तरजं स्फुटम् ॥ १८७ ॥ मानुषोत्तरमूधान्तर्वति विश्वं विलोकय । एष एव तवावाभ्यामुपकारो विधीयताम् ॥ १८८ ॥ इत्युदीर्यं कुमारं तं स्यात्तथेति प्रतिश्रतम् । सार्द्धं स्वातैः समारोप्य विमानं विविधर्द्धिकम् ॥ १८९ ॥ सम्प्राप्य गगनाभोगं मेघमालाविभूषितम् । दर्शयामास तुर्यान्तौ कान्तान् देशान्यथाक्रमम् ॥ १९० ॥ भरतः प्रथमो देशस्ततो हैमवतः परः । हरिवर्षो विदेहश्च रम्यकः पञ्चमो मतः ॥ १९१ ॥ हैरण्यवतसंज्ञश्च परश्चैरावताह्वयः । पश्यैते सप्त भूमि विभक्ताः सप्तभिविंभो ॥ १९२॥ हिमवान् महाहिमवान् निषधो मन्दरो महान् । नीलो रुक्मी शिखर्याख्यो विख्याताः कुलपर्वताः ॥ १९३॥ इमा रम्या महानयश्चतुर्दशसमुद्रगाः । पद्मादिहवसम्भूता नानास्त्रोतस्विनीयुताः ॥ १९४ ॥ गङ्गा सिन्धुश्च रोहिच्च रोहितास्या हरित्परा । हरिकान्ता परा सीता सीतोदा चाष्टमी नदी ॥ १९५ ॥ नारी च नरकान्ता व कूलान्ता 'स्वर्णसंशिका । ततोऽन्या रूप्यकूलाख्या रक्का रक्तोदया सह ॥ १९६ ॥ ह्रदाः षोडशसङ्ख्याः स्युः कुशेशयविभूषिताः । पश्य पद्मो महापद्मस्तिगन्छः केसरी महा-॥ १९७ ॥ पुण्डरीकस्तथा पुण्डरीको निषधनामकः । परो देवकुरुः सूर्यः "सुलसो दशमः स्मृतः ॥ १९८ ॥ विद्युत्प्रभायः ख्यातो नीलवान् कुरुरुतरः । चन्द्रश्चैरावतो माल्यवांश्च विख्यातसंज्ञकः ॥ १९९ ॥ तेषामाद्येषु षट्सु स्युस्ताः श्रीह्रीष्टतिकीर्तयः । बुद्धिर्लक्ष्मीश्च शक्रस्य व्यन्तर्यो वल्लभाङ्गनाः ॥ २०० ॥ देखता हुआ बैठा है ।। १६१ - १८२ ।। उन मुनिराजसे ये सब बातें सुनकर ये दोनों ही विद्याधर आपके प्रेमसे यहाँ आये हैं । इस तरह मेघरथसे सब समाचार सुनकर उन विद्याधरोंने अपना स्वरूप प्रकट किया, राजा घनरथ और कुमार मेघरथकी पूजा की तथा गोवर्धन मुनिराजके समीप जाकर दीक्षा प्राप्त कर ली ।। १८३-१८४ ॥ उन दोनों मुर्गोंने भी अपना पूर्वभवका सम्बन्ध जानकर परस्पर का बँधा हुआ बैर छोड़ दिया और अन्तमें साहसके साथ संन्यास धारण कर लिया । और भूतरमण तथा देवरमण नामक वनमें ताम्रचूल और कनकचूल नामके भूतजातीय व्यन्तर हुए ।। १८५ -१८६ ॥ उसी समय वे दोनों देव पुण्डरीकिणी नगरीमें आये और बड़े प्रेमसे मेघरथकी पूजा कर अपने पूर्वे जन्मका सम्बन्ध स्पष्ट रूपसे कहने लगे ॥ १८७ ॥ अन्तमें उन्होंने कहा कि आप मानुषोत्तर पर्वतके भीतर विद्यमान समस्त संसारको देख लीजिये । हमलोगोंके द्वारा आपका कमसे कम यही उपकार हो जावे ॥ १८८ ॥ देवोंके ऐसा कहनेपर कुमारने जब तथास्तु कहकर उनकी बात स्वीकृत कर ली तब देवोंने कुमारको उसके आप्तजनोंके साथ अनेक ऋद्धियोंसे युक्त विमानपर बैठाया और मेघमालासे विभूषित आकाशमें ले जाकर यथाक्रम से चलते चलते, सुन्दर देश दिखलाये ।। १८६१६० ॥ वे बतलाते जाते थे कि यह पहला भरत क्षेत्र है, यह उसके आगे हैमवत क्षेत्र है, यह हरिवर्ष क्षेत्र है, यह विदेह क्षेत्र है, यह पाँचवाँ रम्यक क्षेत्र है, यह हैरण्यवत क्षेत्र है और यह ऐरावत क्षेत्र है । इस प्रकार हे स्वामिन्! सात कुलाचलोंसे विभाजित ये सात क्षेत्र हैं ।। १६१ - १६२ ॥ हिमवान्, महाहिमवान्, निषध, महामेरु, नील, रुक्मी और शिखरी ये सात प्रसिद्ध कुलाचल हैं १६३ ॥ ये पद्म आदि सरोवरोंसे निकलने वाली, समुद्रकी ओर जानेवाली, अनेक नदियोंसे युक्त, मनोहर चौदह महानदियाँ हैं, ॥ १६४ ॥ गङ्गा, सिन्धु, रोहित, रोहितास्या, हरित्, हरिकान्ता, सीता, सीतोदा, नारी, नरकान्ता, सुवणैकूला, रूप्यकूला, रक्ता और रक्तोदा ये उनके नाम हैं ।। १६५१६६ ॥ देखो, कमलोंसे सुशोभित ये सोलह हद-सरोवर हैं। पद्म, महापद्म, तिगव्छ, केसरी, महापुण्डरीक, पुण्डरीक, निषेध, देवकुरु, सूर्य, दशवाँ सुलस, विद्युत्प्रभ, नीलवान्, उत्तरकुरु, चन्द्र, ऐरावत और माल्यवान् ये उन सोलह हदोंके नाम हैं ।। १६७ - १६६|| इनमें से आदिके छह हृदोंमें क्रमसे श्री, १ विधीयते ल० । २ विभुक्ताः ल० । ३ रोहिताख्या ल० । ४ सुवर्ण ल० । ५ सुलभोः स० । १८५ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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