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________________ त्रिषष्टितमं पर्व १८३ प्रोतिरापि निर्वेगात्संथिता सुब्रतान्तिकम् । गृहसनपरित्यागात्कृत्वा चान्द्रायणं परम् ॥१०९॥ प्रान्ते संन्यस्य सा प्रायाकल्पमीशाननामकम् । तत्र स्वायुःस्थितिं नीत्वा दिव्योगैस्ततश्च्युता ॥११॥ 'तवाजनि तनूजेयमयं विद्याविघातकृत् । तत्सम्बन्धादिति प्रोक्तं सर्वमाकर्ण्य भूभुजा ॥१११॥ निविंद्य संसृतेः शान्तिमती क्षेमकराह्वयात् । तीर्थेशाद्धर्ममासाद्य सद्यः प्राप्य सुलक्षणाम् ॥११॥ गणिनी संयम श्रित्वा संन्यस्येशानसंज्ञके। नाके निलिम्पो भूत्वा स्वकायपूजार्थमागमत् ॥११३॥ सदामीमेव कैवल्यं प्रापत् पवनवेगवाक । सहैवाजितसेनेन कृत्वा पूजां तयोरयात् ॥ ११४॥ तथा चक्रधरे राज्यलक्ष्यालिङ्गितविग्रहे । दशाङ्गभोगसाद्भूते पाति पट्खण्डमण्डलम् ॥११५॥ विद्याधराव्य पाग्भागे शिवमन्दिरभूपतिः । मेघवाहननामास्य विमलाख्या प्रिया तयोः ॥१६॥ सुता कनकमालेति कल्याणविधिपूर्वकम् । जाता कनकशान्तेः सा झषकेतु सुखावहा ॥ ११ ॥ तथा वस्त्वोकसारख्यपुराधीशखगेशिनः । सुता समुद्रसेनस्य जयसेनोदरोदिता ॥११८॥ प्रिया वसन्तसेनाऽपि बभूवास्य कनीयसी । ताभ्यां निर्वृतिमापासौ दृष्टिचर्याद्वयेन वा ॥११९॥ ४कोकिलाप्रथमालापैराहूत इव कौतुकात् । अयाद्वनविहाराय कदाचित्स सहप्रियः ॥ १२०॥ कन्दमूलफलान्वेषी निधि वा सुकृतोदयात् । कुमारो मुनिमद्राक्षीद्विपिने विमलप्रभम् ॥१२॥ तं त्रिः परीत्य वन्दित्वा ततस्तत्त्वं प्रबुद्धवान् । मनोरजः समुद्धृय शुद्धिं बुद्धरुपासदत् ॥१२२॥ तदानीमेव तं दीक्षालक्ष्मीश्च स्ववशं व्यधात् । शम्फलीव वसन्तश्रीरजायत तपःश्रियः५ ॥१२॥ प्रीर्तिकरा भी विरक्त हो कर सुव्रता आर्थिकाके पास गई और घर तथा परिग्रहका त्याग कर चान्द्रायण नामक श्रेष्ठ तप करने लगी। अन्तमें संन्यासमरण कर ऐशान स्वर्गमें देवी हुई। वहाँ दिव्य भोगोंके द्वारा अपनी आयु पूरी कर वहाँ से च्युत हुई और अब तुम्हारी पुत्री हुई है। पूर्व पर्यायके सम्बन्धसे ही इस विद्याधरने इसकी विद्यामें विन्न किया था। इस प्रकार राजा वज्रायुधके द्वारा कही हुई सब बात सुनकर शान्तिमती संसारसे विरक्त हो गई। उसने क्षेमंकर नामक तीर्थंकरसे धर्म श्रवण किया और शीघ्र ही सुलक्षणा नामकी आर्यिकाके पास जा कर संयम धारण कर लिया। अन्तमें संन्यास मरण कर वह ऐशान स्वर्गमें देव हुई। वह अपने शरीरकी पूजाके लिए आई थी उसी समय पवनवेग और अजितसेन मुनिको केवलज्ञान प्राप्त हुआ सो उनकी पूजा कर वह अपने स्थान पर चली गई। १०४-११४। इस प्रकार जिनका शरीर राज्यलक्ष्मीसे आलिङ्गिन्त हो रहा है ऐसे चक्रवर्ती वनायुध दश प्रकारके भोगोंके आधीन होकर जब छहो खण्ड पृथिवी का पालन करते थे ॥ ११५ ।। तब विजयाध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीके शिवमन्दिर नगरमें राजा मेघवाहन राज्य करते थे उनकी स्त्रीका नाम विमला था। उन दोनोंके कनकमाला नामकी पुत्री हुई थी। उसके जन्मकालमें अनेक उत्सव मनाये गये थे। तरुणी होनेपर वह राजा कनकशान्तिको कामसुख प्रदान करने वाली हुई थी अर्थात् उसके साथ विवाही गई थी॥११६-११७ ।। इसके सिवाय वस्त्वोकसार नगरके स्वामी समुद्रसेन विद्याधरकी जयसेना रानीके उदरसे उत्पन्न हुई वसन्तसेना भी कनकशान्तिकी छोटी स्त्री थी। जिसप्रकार दृष्टि और चर्या-सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्रसे निर्वृति-निर्वाण-मोक्ष प्राप्त होता है उसी प्रकार उन दोनों स्त्रियोंसे राजा कनकशान्ति निर्वृति-सुख प्राप्त कर रहा था ॥ ११८-११६ ॥ किसी समय राजा कनकशान्ति कोयलोंके प्रथम आलापसे बुलाये हुएके समान कौतक वश अपनी स्त्रियोंके साथ वनविहारके लिए गया था ॥ १२०॥ जिस प्रकार कन्दमूल फल ढूंढने वालेको पुण्योदयसे खजाना मिल जाय उसी प्रकार उस कुमारको वनमें विमलप्रभ नामके मुनिराज दीख पड़े ॥ १२१ ।। उसने उनकी तीन प्रदक्षिणाएं दीं, वन्दना की, उनसे तत्त्वज्ञान प्राप्त किया और अपने मनकी धूलि उड़ाकर बुद्धिको शुद्ध किया ।। १२२ ।। उसी समय दीक्षा-लक्ष्मीने उसे अपने वश कर लिया अर्थात उसने दीक्षा धारण कर ली इसलिए कहना पड़ता है कि वसन्तलक्ष्मी मानो तपोलक्ष्मीकी दूती ही थी। भावार्थ-जिसप्रकार दूती, पुरुषका स्त्रीके साथ समागम १ प्रीतिंकरातिनिवेगात् ख०। प्रीतिंकरापि संवेगात् म०, ल०। २तदाजनि म०। ३ वास्त्वोकसाराख्य-क०, ग०,१०, वस्त्वौक-म०।४ कोकिलप्रथमा-क०,ख०, घ०। ५तपःश्रियम् क०, १०॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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