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________________ द्विषष्टितम पर्व १५७ तदा साधितविद्यः सन् रथनूपुरनायकः । ए-(इ)-त्यादिशन्महाज्वालविद्यां तां सोदुमक्षमः ॥२८॥ मासार्द्धकृतसंग्रामो विजयाख्यजिनेशिनः । नाभेयसीमनामाद्रिगजध्वजसमीपगाम् ॥ २८१ ॥ समां भीत्वा खगेशोऽगात्कोपाप्यनुयायिनः। मानस्तम्भ निरीक्ष्यासन् प्रसीदचित्तवृरायः ॥२८२॥ जिनं प्रदक्षिणीकृस्य त्रिः प्रणम्य जगत्पतिम् । वान्तवैरविषाः सर्वे तत्रासिषत ते समम् ॥ २८३ ॥ सदागत्यासुरी देवी सती शीलवती स्वयम् । सुतारां द्रतमानीय परिम्लानलतोपमाम् ॥ २८॥ मत्पुत्रस्य युवां क्षन्तुमपराधनमर्हतः । इत्युदीर्यार्पयत्सा श्रीविजयामिततेजसोः ॥ २८५ ॥ तिरश्चामपि चेद्वैरमहार्य जातिहेतुकम् । विनश्यति जिनाभ्याशे मनुष्याणां किमुच्यते ॥ २८६ ॥ कर्माण्यनादिबद्धानि मुच्यन्ते यदि संस्मृतेः । जिनानां सविधौ तेषां नाश्चर्य वैरमोचनम् ॥ २८७ ॥ अन्तको दुनिवारोऽत्र वार्यते सोऽपि हेलया। जिनस्मरणमात्रेण न वार्योऽन्यः स को रिपुः ॥ २८८॥ तदन्तकप्रतीकारे स्मरणीयो मनीषिभिः। 'जगत्त्रयैकनाथोऽईन् पुरेह च हितावहः ॥ २८९ ॥ अथ विद्याधराधीशः प्रणम्य प्राम्जलिजिनम् । भक्त्या सद्धर्ममप्राक्षीस तत्त्वार्थबुभुत्सया ॥ २९० ॥ महादुःखोमिसङ्कीर्णदुःसंसारपयोनिधेः । स्फुरत्कषायनक्रस्य पारः केनाप्यते जिनः ॥ २९१ ॥ प्रष्टव्यो नापरः कोऽपि तीर्णसंसारसागरः । त्वमेवैको जगबन्धो विनेयाननुशाधि नः ॥ २९२ ॥ भवद्भाषाबृहनावा रत्नत्रयमहाधनाः । स्वस्थानं जन्मवाराशे रवापन्सुखसाधनम् ॥२९३॥ सेना अशनिघोषकी मायासे भर गई॥२७८-२७६ ।। इतनेमें ही रथनूपरका राजा अमिततेज विद्या सिद्ध कर आ गया और आते ही उसने महाज्वाला नामकी विद्याको आदेश दिया। अशनिघोष उस विद्याको सह नहीं सका ।। २८०। इसलिए पन्द्रह दिन तक युद्ध कर भागा और भयसे नाभेयसीम नामके पर्वत पर गजध्वजके समीपवर्ती विजय तीर्थकरके समवसरणमें जा घुसा। अमिततेज तथा श्रीविजय आदि भी क्रोधित हो उसका पीछा करते-करते उसी समवसरणमें जा पहुँचे। वहाँ मानस्तम्भ देखकर उन सबकी चित्त-वृत्तियाँ शान्त हो गई। सबने जगत्पति जिनेन्द्र भगवान्की तीन प्रदक्षिणाएँ दी, उन्हें प्रणाम किया और बैररूपी विषको उगलकर वे सब वहाँ साथसाथ बैठ गये॥२८१-२८३ ।। उसी समय शीलवतीयासुरीदेवी मुरझाई हुई लताके समान सुताराको शीघ्र हीलाई और श्रीविजय तथा अमिततेजको समर्पित कर बोली कि आप दोनों हमारे पुत्रका अपराध क्षमा कर देनेके योग्य हैं ।। २८४-२८५ ।। तिर्यश्चोंका जो जन्मजात बैर छूट नहीं सकता वह भी जब जिनेन्द्र भगवान्के समीप आकर छूट जाता है तब मनुष्योंकी तो बात ही क्या कहना है? ॥२८६॥ जब जिनेन्द्र भगवान्के स्मरणसे अनादि कालके बँधे हुए कर्म छूट जाते हैं तब उनके समीप बैर छूट जावे इसमें आश्चर्य ही क्या है ? ॥ २८७ ।। जो बड़े दुःखसे निवारण किया जाता है ऐसा यमराज भी जब जिनेन्द्र भगवान्के स्मरण मात्रसे अनायास ही रोक दिया जाता है तब दूसरा ऐसा कौन शत्रु है जो रोका न जा सके ? ॥ २८८ ॥ इसलिए बुद्धिमानोंको यमराजका प्रतिकार करनेके लिए तीनों लोकोंके नाथ अर्हन्त भगवान्का ही स्मरण करना चाहिये । वही इस लोक तथा परलोकमें हितके करनेवाले हैं ।। २८६ ॥ अथानन्तर विद्याधरोंके स्वामी अमिततेजने हाथ जोड़कर बड़ी भक्तिसे भगवानको नमस्कार किया और तत्त्वार्थको जाननेकी इच्छासे सद्धर्मका स्वरूप पूछा ॥ २६०॥ जिसमें कषायरूपी मगरमच्छ तैर रहे हैं और जो अनेक दुःखरूपी लहरोंसे भरा हुआ है ऐसे संसाररूपी विकराल सागरका पार कौन पा सकता है ? यह बात जिनेन्द्र भगवान्से ही पूछी जा सकती है किसी दूसरे से नहीं क्योंकि उन्होंने ही संसाररूपी सागरको पार कर पाया है। हे भगवन् ! एक आप ही जगत्के बन्धु हैं अतः हम सब शिष्योंको आप सद्धर्मका स्वरूप बतलाइये ॥ २६१-२६२॥ रत्नत्रय रूपी महाधनको धारण करनेवाले पुरुष आपकी दिव्यध्वनि रूपी बड़ी भारी नावके द्वारा ही इस संसार १ जगत्त्रैलोक्यनाथाऽईन् ग०। २-ननु शास्मि नः ग० ।-ननुसाधि नः ल०। ३ सस्थानं ल० । ४-रावापत् ल०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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