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________________ द्विषष्टितमं पर्व १५५ इति त्वत्कान्तया राजन् प्रेषितोऽहमिहागतः । इयं त्वद्वैरिनिर्दिष्टदेवतेत्यादराद्धितः ॥ २५० ॥ श्रुत्वा तत्पोदनाधीशो सत्कृतं कथ्यतामिदम् । वृत्तान्तं सत्वरं गत्वा सन्मित्रेण त्वयाऽथुना ॥ २५ ॥ मजनन्यनुजादीनामित्युक्तोऽसौ नभश्चरः। सुतं द्वीपशिखं सद्यः प्राहिणोत्पोदनं प्रति ॥ २५२ ॥ अभवत्पोदनाख्येऽपि बहूत्पातविज़म्भणम् । तद्दष्ट्राऽमोघजिह्वाख्यो जयगुप्तश्च सम्भ्रमात् ॥ २५३ ॥ उत्पन्न स्वामिनः किश्चिद् भयं तदपि निर्गतम् । आगमिष्यति चायैव कश्चित्कुशलवार्तया ॥ २५४ ॥ स्वस्थास्तिष्ठन्तु तत्तत्रभवन्तो मा गमन् भयम् । इति स्वयम्प्रभादीस्तानाश्वासं नयतः स्म तान् ॥२५५॥ तथैव गगनादीपशिखोऽप्यागम्य भूतलम् । स्वयम्प्रभां सुतं चास्याः प्रणम्य विविधवत्सुधीः ॥२५६॥ क्षेमं श्रीविजयाधीशो भवद्भिस्त्यज्यतां भयम् । इति तद्वृत्तक' सर्व यथावस्थं न्यवेदयत् ॥ २५७ ॥ तद्वार्ताकर्णनादावपरिम्लानलतोपमा। निर्वाणाभ्यर्णदीपस्य शिखेव विगतप्रभा ॥ २५८ ॥ श्रुतप्रावृधनध्वानकलहंसीव शोकिनी । स्याद्वाद्वादिविध्वस्तदुःश्रुतिर्वाकुलाकुला ॥ २५९ ॥ तदानीमेष निर्गत्य चतुरङ्गम्बलान्विता । स्वयम्प्रभाऽगात् सखगा ससुता तद्वनान्तरम् ॥ २६० ॥ आयान्ती दूरतो दृष्टा मातरं स्वानुजानुगाम् । प्रतिगत्यानमत्तस्याः पादयोः पोदनाधिपः ॥ २६ ॥ स्वयम्प्रभा च तं दृष्ट्वा वाष्पाविलविलोचना। उत्तिष्ठ पुत्र दृष्टोऽसि मरपुण्याचिरजीवितः ॥ २६२॥ इति श्रीविजयं दोामुत्थाप्यास्पृश्य तोषिणी । सुखासीनमथापृच्छत्सुताराहरणादिकम् ॥ २६३ खगः सम्भिानामाऽयं सेवकोऽमिततेजसः। अनेनोपकृतिर्याऽय कृता साऽम्ब त्वयापि न ॥२६॥ मेरे वियोगके कारण शोकाग्निसे पीड़ित हो रहे हैं तुम वहाँ जाकर उनसे मेरी दशा कह दी । इस प्रकार हे राजन्, मैं तुम्हारी स्त्रीके द्वारा भेजा हुआ यहाँ आया हूँ। यह तुम्हारे वैरीकी आज्ञा-कारिणी वैताली देवी है। ऐसा उस हितकारी विद्याधरने बड़े आदरसे कहा। इस प्रकार संभिन्न विद्याधरके द्वारा कही हुई बातको पोदनपुरके राजाने बड़े आदरसे सुना और कहा कि आपने यह बहुत अच्छा किया। आप मेरे सन्मित्र हैं अतः इस समय आप शीघ्र ही जाकर यह समाचार मेरी माता तथा छोटे भाई आदिसे कह दीजिये। ऐसा कहनेपर उस विद्याधरने अपने दीपशिख नामक पुत्रको शीघ्र ही पोदनपुरकी ओर भेज दिया ॥२४७-२५२ ॥ उधर पोदनपुरमें भी बहुत उत्पातोंका विस्तार हो रहा था, उसे देखकर अमोघजिह्व और जयगुप्त नामके निमित्तज्ञानी बड़े संयमसे कह रहे थे कि स्वामीको कुछ भय उत्पन्न हुआ था परन्तु अब वह दूर हो गया है, उनका कुशल समाचार लेकर आज ही कोई मनुष्य आवेगा। इसलिए आप लोग स्वस्थ रहें, भयको प्राप्त न हों। इस प्रकार वे दोनों ही विद्याधर, स्वयंप्रभा आदिको धीरज बँधा रहे थे ।।२५३-२५५ ।। उसी समय दीपशिख नामका बुद्धिमान् विद्याधर आकाशसे पृथिवी-तलपर आया और विधि-पूर्वक स्वयंप्रभा तथा उसके पुत्रको प्रणाम कर कहने लगा कि महाराज श्रीविजयकी सब प्रकारकी कुशलता है, आप लोग भय छोड़िये, इस प्रकार सब समाचार ज्योंके त्यों कह दिये ॥ २५६-२५७ ।। उस बातको सुननेसे, जिस प्रकार दावानलसे लता म्लान हो जाती है, अथवा बुझनेवाले दीपककी शिखा जिस प्रकार प्रभाहीन हो जाती है, अथवा वर्षा ऋतुके मेघका शब्द सुननेवाली कलहंसी जिस प्रकार शोकयुक्त हो जाती है अथवा जिस प्रकार किसी स्याद्वादी विद्वानके द्वारा विध्वस्त हुई दुःश्रति (मिथ्याशाख) व्याकुल हो जाती है उसी प्रकार स्वयंप्रभा भी म्लान शरीर, प्रभारहित, शोकयुक्त तथा अत्यन्त आकुल हो गई थी॥२५८-२५६ ॥ वह उस विद्याधरको तथा पुत्रको साथ लेकर उस वनके बीच पहुँच गई ॥२६० ।। पोदनाधिपतिने छोटे भाईके साथ आती हुई माताको दूरसे ही देखा और सामने जाकर उसके चरणों में नमस्कार किया ॥२६१ ॥ पुत्रको देखकर स्वयंप्रभाके नेत्र हर्षाश्रोंसे व्याप्त हो गये। वह कहने लगी कि 'हे पुत्र ! उठ, मैंने अपने पुण्योदयसे तेरे दर्शन पा लिये,तू चिरंजीव रह' इस प्रकार कहकर उसने श्रीविजयको अपनी दोनों भुजाओंसे उठा लिया, उसका स्पर्श किया और बहुत भारी संतोषका अनुभव किया । अथानन्तर-जब श्रीविजय सुखसे बैठ गये तष उसने सुताराके हरण आदिका समाचार पूछा ।। २६२-२६३ ॥ श्री विजयने कहा कि यह संभिम १-नवृत्तकं. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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