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________________ षष्टितम पर्व १२७ त्रिखण्डाधिपतित्वं तौ चतुर्थों रामकेशवौ। ज्योतिर्लोकाधिनाथत्वमम्वभूतामिवेन्द्विनौ ॥ ७९ ॥ केशवो जीवितान्तेऽगादवधिस्थानमायुषाम्' । सुप्रभस्तद्वियोगोत्थशोकानलसमन्वितः ॥८॥ प्रबोधितः प्रसन्नात्मा सोमप्रभजिनेशिना । दीक्षित्वा श्रेणिमारुह्य स मोक्षमगमत्सुधीः ॥ ८१ ॥ वसन्ततिलका सम्भूय पोदनपुरे वसुषेणनामा कृत्वा तपः सुरवरोऽजनि शुक्ललेश्यः । तस्माच्च्युतोऽर्द्धभरताधिपतिहतारिः प्रापान्तिमा क्षितिमधः पुरुषोत्तमाख्यः ॥ ८२॥ वियोगिनी मलयाधिपचण्डशासनो नृपतिः3 पापमतिभ्रंमंश्चिरम् । भववारिनिधावभूदधः खलु गन्ता मधुसूदनाभिधः ॥ ८३ ॥ वंशस्थवृत्तम् महाबलाख्यः पुरि नन्दने नृपः महातपा द्वादशकल्पजः सुरः। पुनर्बलः सुप्रभसंज्ञयाऽगमत् परं पदं प्रास्तसमस्तसङ्गकः ॥ ८४ ॥ आर्या साम्राज्यसारसौख्यं सुप्रभपुरुषोत्तमौ सम भुक्त्वा । प्रथमो निर्वाणमगादपरोऽधो वृत्तिवैचित्र्यम् ॥ ८५ ॥ इत्या भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे अनन्ततीर्थकर-सुप्रभपुरुषोत्तम मधुसूदनपुराणं समाप्तं षष्टितम पर्व ॥ ६॥ मार डाला ||७८ ॥ दोनों भाई चौथे बलभद्र और नारायण हुए तथा तीन खण्डके आधिपत्यका इस प्रकार अनुभव करने लगे जिस प्रकार कि सूर्य और चन्द्रमा ज्योतिर्लोकके आधिपत्यका अनु ॥ आयके अन्तमें पुरुषोत्तम नारायण छठवें नरक गया और सुप्रभ बलभद्र उसके वियोगसे उत्पन्न शोकरूपी अग्निसे बहुत ही संतप्त हुआ ॥८०॥ सोमप्रभ जिनेन्द्रने उसे समझाया जिससे प्रसन्नचित्त होकर उसने दीक्षा ले ली और अन्तमें क्षपक श्रेणीपर आरूढ़ होकर उस बुद्धिमान्ने मोक्ष प्राप्त कर लिया ।। ८१ ॥ पुरुषोत्तम पहले पोदनपुर नगरमें वसुषेण नामका राजा हुआ, फिर तप कर शुक्ललेश्याका धारक देव हुआ, फिर वहाँसे चयकर अर्धभरतक्षेत्रका स्वामी, तथा शत्रुओंका नष्ट करनेवाला पुरु षोत्तम नामका नारायण हुआ एवं उसके बाद अधोलोकमें सातवीं पृथिवीमें उत्पन्न हुआ॥२॥ मलयदेशका अधिपति पापी राजा चण्डशासन चिरकाल तक भ्रमण करता हुआ मधुसूदन हुआ और तदनन्तर संसाररूपी सागरके अधोभागमें निमग्न हुआ ॥ ८३ ॥ सुप्रभ पहले नन्दन नामक नगरमें महाबल नामका राजा था फिर महान् तप कर बारहवें स्वर्गमें देव हुआ, तदनन्तर सुप्रभ नामका बलभद्र हुआ और समस्त परिग्रह छोड़कर उसी भवसे परमपदको प्राप्त हुआ॥४॥ देखो, सप्रभ और पुरुषोत्तम एक ही साथ साम्राज्यके श्रेष्ठ सुखोंका उपभोग करते थे परन्तु उनमेंसे पहलासुप्रभ तो मोक्ष गया और दूसरा-पुरुषोत्तम नरक गया, यह सब अपनी वृत्ति-प्रवृत्तिकी विचित्रता है॥८५॥ इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें __ अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति नारायणके पुराणका वर्णन करनेवाला साठवाँ पर्व पूर्ण हुआ। १चन्द्रसूर्यो। २-मायुषा ल०। ३ नृपतिं ल०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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