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________________ १०२ महापुराणे उत्तरपुराणम् तीर्थे विमलनाथस्य सब्जातौ रामकेशवौ। धर्मस्वयम्भूनामानौ तयोश्चरितमुच्यते ॥ १३॥ विदेहेऽस्मिन् प्रतीच्यासीन्मित्रनन्दीति भूभुजः। स्ववशीकृतनिःशेषनिजभोग्यमहीतलः॥१४॥ प्रजानामेष रक्तत्वात् प्रजाश्चास्य प्रपालनात् । सर्वदा वृद्धयेऽभूवन् भवेत्स्वार्था परार्थता ॥ ६५॥ स्वचक्रमिव तस्यासीत्परचक्रं च धीमतः । चक्रबुद्धः स्वचक्रं च परचक्रमपक्रमात् ॥ ६६॥ अतृप्यदेष भूपालस्तर्पयित्वाऽखिलाः प्रजाः । परोपकारवृत्तीनां परतृप्तिः स्वतृप्तये ॥ ६ ॥ स कदाचित्समासाय सुब्रतं जिनपुङ्गवम् । श्रुत्वा धर्म सुधीर्मत्वा स्वागभोगादि भंगुरम् ॥ ६८॥ अङ्गिनो वत सीदन्ति सङ्गमादाहितांहसः । निःसङ्गतां न गच्छन्ति किं गतं न विदन्त्यमी ॥ ६१ ॥ इति निविंद्य संसाराद् गृहीत्वा संयम परम् । संन्यस्यागात् प्रयस्त्रिंशद्वाद्धिस्थितिरनुत्तरम् ॥ ७० ॥ ततो 'द्वारवतीपुर्या सुतो भद्रमहीपतेः । सुभद्रायाश्च धर्माख्यः सोऽभूत्सुस्वमपूर्वकम् ॥ ७१ ॥ अमुस्मिन् भारते वर्षे कुणालविषये पुरम् । श्रावस्ती तत्र राजाऽभूत्सुकेतुर्भोगतत्परः ॥ ७२ ॥ कामजे व्यसने ते संसक्तः कर्मचोदितः । निषिद्धो मन्त्रिभिर्बन्धुवरैश्च बहुशो हितैः ॥ ७३ ॥ चोदितो वा स तैर्भूयो दीव्यन् दैवविलोमतः। राष्ट्र वित्तं बलं देवी सर्वमस्यापहारितम् ॥ ७ ॥ क्रोधजेषु विषूक्तेषु कामजेषु चतुर्षु च । नापरं व्यसनं धुतानिकृष्टं प्राहुरागमाः ॥ ७५ ॥ ज्ञान क्रम, इन्द्रिय तथा मनसे रहित है, जिनका शरीर अत्यन्त निर्मल है और देव भी जिनकी कीर्तिका गान करते हैं ऐसे विमलवाहन भगवानको निर्मलता प्राप्त करनेके लिए तुम सब बड़ी भक्तिसे नमस्कार करो ॥ २ ॥ ___ अथानन्तर श्री विमलनाथ भगवान्के तीर्थमें धर्म और स्वयंभू नामके बलभद्र तथा नारायण हुए इसलिए अब उनका चरित कहा जाता है । ६३ ॥ इसी भरतक्षेत्रके पश्चिम विदेह क्षेत्रमें एक मित्रनन्दी नामका राजा था, उसने अपने उपभोग करने योग्य समस्त पृथिवी अपने आधीन कर ली थी॥ ६४॥ प्रजा इसके साथ प्रेम रखती थी इसलिए यह प्रजाकी वृद्धिके लिए था और यह प्रजाकी रक्षा करता था अतः प्रजा इसकी वृद्धिके लिए थी-राजा और प्रजा दोनों ही सदा एक दसरेकी वृद्धि करते थे सो ठीक ही है क्योंकि परोपकारके भीतर स्वोपकार भी निहित रहता है ॥६५ ।। उस बुद्धिमानके लिए शत्रुकी सेना भी स्वसेनाके समान थी और जिसकी बुद्धि चक्रके समान फिरा करती थी-चंचल रहती थी उसके लिए क्रमका उल्लंघन होनेसे स्वसेना भी शत्रुसेनाके समान हो जाती थी ॥६६।। यह राजा समस्त प्रजाको संतुष्ट करके ही स्वयं संतुष्ट होता था सो ठीक ही है क्योंकि परोपकार करनेवाले मनुष्योंके दूसरोंको संतुष्ट करनेसे ही अपना संतोष होता है ॥ ६७ ॥ किसी एक दिन वह बुद्धिमान् सुव्रत नामक जिनेन्द्र के पास पहुंचा और वहाँ धर्मका स्वरूप सुनकर अपने शरीर तथा भोगादिको नश्वर मानने लगा ।। ६० ।। वह सोचने लगा-बड़े दुःखकी बात है कि ये संसारके प्राणी परिग्रहके समागमसे ही पापोंका संचय करते हुए दुःखी हो रहे है फिर भी निष्परिग्रह अवस्थाको प्राप्त नहीं होते-सब परिग्रह छोड़ कर दिगम्बर नहीं होते। बड़ा आश्चर्य है कि ये सामनेकी बातको भी नहीं जानते ॥६६॥ इस प्रकार संसारसे विरक्त होकर उसने उत्कृष्ट संयम धारण कर लिया और अन्त समयमें संन्यास धारण कर अनुत्तर विमानमें तैंतीस सागरकी आयुवाला अहमिन्द्र हुआ ॥७॥ वहाँसे चयकर द्वारावती नगरीके राजा भद्रकी रानी सुभद्राके शुभ स्वप्न देखनेके बाद धर्म नामका पुत्र हुआ ॥७१ ॥ इसी भारतवर्षके कुणाल देशमें एक श्रावस्ती नामका नगर था वहाँ पर भोगोंमें तल्लीन हुआ सुकेतु नामका राजा रहता था ।। ७२ ॥ अशुभ कर्मके उदयसे वह बहुत कामी था, तथा चूत व्यसनमें आसक्त था। यद्यपि हित चाहनेवाले मन्त्रियों और कुटुम्बियोंने उसे बहुत बारका पर उसके बदले उनसे प्रेरित हएके समान वह बार-बार जत्रा मेनन रित हुएके समान वह बार-बार जुआ खेलता रहा और कर्मोदयके विपरीत होनेसे वह अपना देश-धन-बल और रानी सब कुछ हार गया ॥७३-७४॥ क्रोधसे उत्पन्न १ द्वारावती क०, घ०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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