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________________ महापुराणम् वल्लीनां सकुसुमपल्लवाग्रभङ्गान् गुल्मौघानपि सरसां कडडगरांश्च । सुस्वादून मृदुविटपान् वनमाणां तद्यूयं कवलयति स्म धेनुकानाम् ॥१५६॥ कुञ्जेषु प्रतनुतणाडाकुरान् प्रमदनन् वप्रान्तानपि रदनैः शनैर्विनिघ्नन । वल्ल्यग्रसनचणः फलेग्रहिः सन् वालोलः कलभगणश्चिरं विज हे ॥१५७॥ प्रत्यग्राः किसलयिनीगहाण शाखा- भरध्युच्चैर्वनगहनं निषीद कुञ्ज । सम्भोग्यानुपसरसल्लकीवनान्तान् इत्येवं० व्यहृत वने करेणुवर्गः ॥१५८॥ सम्भोगर्वनमिति निविशन ययेष्टं स्वातन्त्र्यान्महरपि धूर्गनिबद्धः । बद्धव्यः सहकलभः करेणुवर्गः सम्प्रापत् समुचितमात्मनो निवेशम् ॥१५॥ वित्रस्तरपथमुपाहृतस्तुरङगैः पर्यस्तो५ रथ इह भग्ननिरक्षः । एतास्ता द्रुतमपयान्त्यपेत्य मार्गाद् वारस्त्रीवहनपराश्च वेगसर्य: ॥१६०॥ वित्रस्तः करभनिरीक्षणाद् गजोऽयं भीरुत्वं प्रकटयति प्रधावमानः । २०उत्त्रस्तात्पतति च वेसरादमुष्माद् वित्रस्तस्तनजघनांशुका पुरन्धी ॥१६॥ इत्युच्चय॑तिवदतां पृथग्जनानां सञ्जल्पः क्षुभितखरोष्ट्रकौक्षकैश्च । सव्याक्रोशैर्जनितरवैश्च सैनिकानां सडक्षोभः क्षणमभवच्चमूषु राज्ञाम् ॥१६२॥ बच्चोंके साथ खाने के लिये शीघ ही वनके वक्षोंकी ओर चली गई ॥१५५॥ वह हथिनियोंका समह लताओंके पुष्पसहित नवीन पत्तोंके अग्रभागोंको, छोटे छोटे पौधोंको, रसीले कडंगरि वृक्षोंको और वनके वृक्षोंकी स्वादिष्ट तथा कोमल शाखाओंको खा रहा था ॥१५६।। लतागहोंमें पतली घासके अंकुरोंको खूदता हुआ खेतोंकी मेड़को अपने दाँतोंसे धीरे धीरे तोड़ता हुआ, लताओंके अग्रभागके खाने में चतुर तथा फलोंको तोड़ता हुआ वह चंचल हाथियों के बच्चों का समह चिरकाल तक क्रीड़ा करता रहा था ।।१५७।। पत्तेवाली नवीन लताओंको ग्रहण कर, ऊँची ऊँची शाखाओंसे युक्त सघन वनमें जा, लतागहमें बैठ और खानेके योग्य सल्लकी वनोंके समीप जा इस प्रकार महावतोंकी आज्ञासे वह हथिनियोंका समह वनमें इधर-उधर विहार कर रहा था ॥१५८।। इस प्रकार जो अनेक प्रकारकी क्रीड़ाओंके द्वारा वनका अ नसार उपभोग कर रहा है, स्वतन्त्रतापूर्वक आगे चलनेसे महावत लोग जिसे रोक रहे हैं और जो बाँधने के योग्य हैं ऐसा वह हथिनियोंका समूह बच्चोंके साथ अपने ठहरने योग्य स्थानपर जा पहंचा ॥१५९।। इधर हाथियोंसे डरे हुए इन घोड़ोंने यह रथ कुमार्गमें ले जाकर पटक दिया है, इसका धूरा और भौंरा टूट गया है तथा वेश्याओंको ले जानेम तत्पर ये खच्चरियाँ अपना मार्ग छोड़कर बहुत शीघू भागी जा रही हैं ॥१६०॥ इधर यह ऊंट देखनेसे डरा हुआ हाथी दौड़ा जा रहा है और उससे अपना डरपोकपना प्रकट कर रहा है तथा इधर जिसके स्तन और जधन परका वस्त्र खिसक गया है ऐसी यह स्त्री डरे हुए खच्चरसे गिर रही है ।।१६१॥ इस प्रकार जोर जोरसे बोलते हुए साधारण पुरुषोंकी बातचीतके शब्दोंसे, क्षोभको प्राप्त हुए गधे, ऊंट तथा बैलोंके शब्दोंसे और परस्पर बुलानेसे उत्पन्न हुए संनिकोंके कठोर शब्दोंसे राजाओंकी १ सानि । 'कडङगरो बुसं क्लीबे' इत्यभिधानात् । २ करिणीनाम् । 'करिणी धेनुका वशा' इत्यमरः। सुरभीणाम् । ३ कोमल । ४ मर्दयन् । ५ सान्वन्तान् । 'स्नुर्वप्रः सानुरस्त्रियाम्' इत्यमरः । ६ भक्षणसमर्थः। ७ फलानि गृह्णन् । ८ भङगं कुरु। ६ आस्स्व । १० सादिजनानुनयः । ११ विहाति स्म। १२ अनुभवन् । १३ सादिभिः । १४ निषिद्धः । १५ उत्तानं यथा पतितः । १६ भग्नयानमुखः । १७ निर्गतावयवः । १८ वेसराः। १६ भयं गतः । २० चकितात् । २१ परस्परभाषमाणानाम् । २२ वृषभैः । २३ परस्पराह्वयैः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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