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________________ अष्टाविंशतितम पर्व प्रहर्षिणी लावण्यावयमभिसारयन्' सरित्स्त्रीः प्रास्त्रस्तप्रतनुजलांशकास्तरडगः।। पाश्लिष्यन्मुहुरपि नोपयाति तृप्ति सम्भोगरतिरसिको न तृप्यतीह ॥१६॥ वसन्ततिलका रोधोभुवोऽस्य तनुशीकरवारिसिक्ताः सम्माजिता विरलमुच्चलितैस्तरङगैः । भान्तीह सन्ततलताविगलत्प्रसून-नित्योपहारसुभगा धुसदां' निषेव्याः॥१६॥ मन्दाक्रान्ता स्वर्गाद्यानश्रियमिव हसत्युत्प्रसूने बनेऽस्मिन् मन्दाराणां सरति पवने मन्दमन्दं बनान्तात् । मन्दाक्रान्ताः सललितपदं किञ्चिदारब्धगानाः चङकम्यन्ते खगयुवतयस्तीरदेशेष्वमुष्य ॥१६२॥ प्रहर्षिणी अप्सव्य स्तिमिरयमाजिघांसुराराद् अभ्येति द्रुतमभिभावुकोप्सुयोनिम्। शैलोच्चानपि निगिलंस्तिमीनितोऽन्यो व्यत्यास्ते२ समममुना युयुत्समानः ॥१६॥ पृथ्बी जलादजगरस्तिमि शयुमपि३ स्थलादप्सुजो विकर्षति५ युयुत्सया कृतदृढनहो' दुर्ग्रहः । तथापि न जयो मिथोऽस्ति समकक्ष्ययोरेनयोः ध्रुवं न समकक्ष्य योरिह जयेतरप्रक्रमः ॥१९४॥ से प्रकाशमान सुवर्णमय स्थानोंको देखकर जिसे दावानलकी शंका हो रही है ऐसा यह हरिणों का समूह बहुत शीघ्र किनारे की पृथिवीकी ओर लौटता हुआ दौड़ा जा रहा है ।।१८९।। यह समुद्र, जिनके जल रूपी सूक्ष्म वस्त्र कुछ कुछ नीचेकी ओर खिसक गये हैं ऐसी नदीरूपी स्त्रियों को लावण्य अर्थात् सुन्दरताके कारण (पक्षमें खारापनके कारण) अपनी ओर बुलाता हुआ तथा तरंगोंके द्वारा बार-बार उनका आलिंगन करता हुआ भी कभी तृप्तिको प्राप्त नहीं होता सो ही है क्योंकि जो अत्यन्त रसिक अर्थात् कामी (पक्षमें जल सहित) होता है वह इस संसार में अनेक बार संभोग करनेपर भी तृप्त नहीं होता है ।।१९०। जो छोटी छोटी बूंदोंके पानी के सींचनेसे स्वच्छ हो गई है, निरन्तर लताओंसे गिरते हुए फूलोंके उपहारसे जो सदा सुन्दर ड़ती हैं, और जो देवोंके द्वारा सेवन करने योग्य हैं ऐसी ये यहांकी किनारेकी भमियां विरल विरल रूपसे उछलती हुई लहरोंसे अत्यन्त सुशोभित हो रही हैं ।। १९१।। स्वर्गके उपवनकी शोभाकी ओर हंसनेवाले तथा फूलोंसे भरे हुए इस वनमें मन्दार वृक्षोंके वनके मध्य भागसे यह वायु धीरे धीरे चल रहा है और इसी समय जिन्होंने कुछ कुछ गाना प्रारम्भ किया है ऐसी ये धीरे धीरे चलनेवाली विद्याधरियां इस समुद्र के किनारेके प्रदेशोंपर लीलापूर्वक पैर रखती उठाती हुई टहल रही है ॥१९२।। इधर, इस जलमें उत्पन्न हुए अन्य अनेक मच्छोंको तिरस्कार कर उनके मारनेकी इच्छा करता हुआ यह इसी जलमें उत्पन्न हुआ बड़ा मच्छ बहुत शीघ दूरसे उनके सन्मुख आ रहा है और पर्वतके समान बड़े बड़े मच्छोंको निगलता हुआ बड़ा मच्छ उस पहले बड़ मच्छके साथ युद्ध करनेकी इच्छा करता हुआ खड़ा है ॥१९॥ इधर, यह अजगर जलमेंसे किसी बड़े मच्छको अपनी ओर खींच रहा है और मजबूतीसे पकड़ने १ अभिसारिकायाः कुर्वन् । २ श्लक्ष्ण । ३ तटभूमयः । ४ देवानाम् । ५ हसतीति हसत् तस्मिन् । ६ सरतीति सरत् तस्मिन् । ७ मन्दगमनाः । ८ अप्सु भवः । ६ आहन्तुमिच्छः । १० अभिभवशीलः । ११ शङखं जलचरं वा। १२ वैपरीत्येन स्थितः । १३ अजगरम्। १४ मत्स्यः । १५ आकर्षति । १६ योद्धमिच्छया । १७ परस्परविहितदृढग्रहणम् । ग्रहः स्वीकारः । १८ गृहीतुमशक्यः । १६ समबलयोः । २० अपजयः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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