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________________ अशविंशतितम पर्व ४९ तदेन शरमभ्यर्च्य गन्धमाल्याक्षतादिभिः। पूज्याचैव विभोराज्ञा गत्वास्माभिः शरार्पणा ॥१४७॥ मा गा मागष वैचित्यं' कार्यमेतद् विनश्चिनु । न युक्तं तत्प्रतीपत्वं तव तद्देशवासिनः ॥१४॥ तबलं देव संरभ्य' तत्प्रातीयं न शान्तये। महतः सरिदोषस्य कः प्रतीपं तरन् सुखी ॥१४॥ बलवाननुवयश्चेद् अनुनयोऽद्य चक्रभत । महत्स वैती वृत्तिम् प्रामनन्त्यविपत्करीम् ॥१५०॥ इहामुत्र च जन्तूनाम् उन्नत्यं पूज्यपूजनम् । तापं तत्रानुबध्नाति पूज्यपूजाव्यतिक्रमः ॥१५॥ इति तद्वचनात्किञ्चित् प्रबुद्ध इव तत्क्षणम् । अज्ञातमेवमेतत्स्याद् इत्यसौ प्रत्यपद्यतर ॥१५२॥ ससम्मममिवास्याभूत् चितं किञ्चित्ससाध्वसम् । साशङकमिवर सोद्वेगं प्रबुद्धमिव च क्षणम् ॥१५३॥ ततः प्रसेदुषी५ तस्य नचिरादेव" शेमषी । पर्वापर व्यलोकिष्ट कोपापायात् प्रशेमुषी५ ॥१५४॥ सोऽयं चक्रभृतामाद्यो भरतोऽलङययशासनः । प्रतीक्ष्यः सर्वथास्माभिः अनुनेयश्च सादरम् ॥१५॥ चक्रित्वं चरमाडागत्वं पुत्रत्वं च जगद्गुरोः। इत्यस्य पूज्यमेकैकं किं पुनस्तत्समुच्चितम् ॥१५६॥ इति निश्चित्य "सम्भान्तः अनुयातः सुरोत्तमैः । सहसा चक्रिणं द्रष्टुमुच्चचाल स मागधः ॥१५७॥ चक्रवर्तीको प्रकट कर रही है ॥१४६।। इसलिये गन्ध माला अक्षत आदिसे इस बाणकी पूजा कर हम लोगोंको आज ही वहां जाकर उनका यह बाण उन्हें अर्पण कर देना चाहिये और आज ही उनकी आज्ञा मान्य करनी चाहिये ॥१४७।। हे मागध, आप किसी प्रकारके विकारको प्राप्त मत ह जिये, और हम लोगोंके द्वारा कहे हुए इस कार्यका. अवश्य ही निश्चय कीजिये, क्योंकि उनके देशमें रहनेवाले आपको उनके साथ विरोध करना उचित नहीं है ॥१४८॥ इसलिये हे देव, क्रोध करना व्यर्थ है, चक्रवर्तीके साथ वैर करनेसे कुछ शान्ति नहीं होगी क्योंकि नदीके बड़े भारी प्रवाहके प्रतिकूल तैरनेवाला कौन सुखी हो सकता है ? अर्थात् कोई नहीं ॥१४९।। यदि बलवान् मनुष्यको अनुकल बनाये रखना चाहिये यह नीति है तो चक्रवर्तीको आज ही प्रसन्न करना चाहिये, क्योंकि बड़े पुरुषोंके विषयमें बेंतके समान नम् वृत्ति ही दुःख दूर करनेवाली है ऐसा विद्वान् लोग मानते हैं ॥१५०। पूज्य मनुष्योंकी पूजा करनेसे इस लोक तथा परलोक-दोनों ही लोकोंमें जीवोंकी उन्नति होती है और पूज्य पुरुषोंकी पूजा का उल्लंघन अर्थात् अनादर करनेसे दोनों ही लोकोंमें पाप बन्ध होता है ॥१५१।। इस प्रकार उन देवोंके वचनोंसे जिसे उसी समय कुछ कुछ बोध उत्पन्न हुआ है ऐसे उस मागध देवने मुझे यह हाल मालूम नहीं था यह कहते हुए उनके वचन स्वीकार कर लिये ॥१५२॥ उस समय उसके चित्तमें कुछ घबड़ाहट, कुछ भय, कुछ आशंका, कुछ उद्वेग और कुछ प्रब हो रहा था ।।१५३॥ तदनन्तर थोड़ी ही देरमें निर्मल हुई और क्रोधके नष्ट हो जानेसे शान्त हुई उसकी बुद्धिने आगे पीछेका सब हाल देख लिया ॥१५४॥ यह वही चक्रवर्तियोंमें पहला चक्रवर्ती भरत है जिसकी कि आज्ञाका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता, हम लोगोंको हरएक प्रकारसे इसकी पूजा करनी चाहिये और आदर सहित इसकी आज्ञा माननी चाहिये ॥१५५॥ यह चक्रवर्ती है, चरमशरीरी है और जगद्गुरु भगवान् वृषभदेवका पुत्र है, इन तीनोंमेंसे एक एक गुण ही पूज्य होता है फिर जिसमें तीनोंका समुदाय है उसकी तो बात ही क्या कहनी है? ||१५६।। इस प्रकार निश्चय कर वह मागध देव शीघ ही चक्रवर्तीको देखनेके लिये आकाश-मार्गसे चला, उस समय संभूमको प्राप्त हुए अनेक अच्छे अच्छे देव उसके पीछे पीछे १चित्तविकारम् । २ चक्रिप्रतिकूलत्वम्। ३-वर्तिनः ल० । ४ संरम्भ मा कार्षीः । ५ प्रातिकूल्यम् । ६ प्रवाहस्य। ७ वेतससम्बन्धिनीम् । अनुकूलतामित्यर्थः। १८ पापं ल०। ६ जन्तौ। १० एव । ११ अनुमने । १२ इव अवधारणे । १३ प्रसन्नवती। १४ अल्पकालेनैव । १५ उपशमवती। १६ पूज्यः । सांशयिकः, संशयापनमानसः । १७ सम्भ्रमवद्भिः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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