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________________ अष्टाविंशतितमं पर्व येनायं प्रहितः पत्री नाकिना दानवेन वा । तस्य कर्तुं प्रतीकारमिमे सज्जा वयं प्रभो ॥ १२६ ॥ इत्यारक्षि' भटैस्तूर्णम् एत्य विज्ञापितः प्रभुः । श्रलमाध्वं भटालापैः इत्युच्चैः प्रत्युवाच तान् ॥ १२७॥ यूयं त एव मद्ग्राह्याः सोऽहमेवास्मि मागधः । श्रुतपूर्वमिदं किं वः सोढपूर्वो मयेत्यरिः ॥ १२८ ॥ बिर्भात यः पुमान् प्राणान् परिभूतिमलीमसान् । न गुणैलिङगमात्रेण पुमानेष प्रतीयते ॥ १२६ ॥ सचित्र पुरुषो वास्तु चञ्चापुरुष' एव च । यो विनापि गुणैः पौंस्नै: ' नाम्मैव पुरुषायते ॥ १३०॥ स पुमान् यः पुनीते स्वं कुलं जन्म च पौरुषः । भटब्रुवो जनो यस्तु तस्यास्तव भवनिर्भुवि ॥ १३१ ॥ विजिगीषुतया देवा" वयं नेच्छाविहारतः " । ततोऽरिविजयादेव सम्पदस्तु सदापि नः ॥१३२॥ वस्तुवाहनराज्याङगैः श्राराधयति यः परम् । परभोगीणमैश्वर्यं तस्य मन्ये विडम्बनम् ॥१३३॥ शशाली प्रभुः कोऽपि मत्तोऽयं धनमोप्सति । धनायतोऽस्य दास्यामि निधनं प्रथनैः समम् ॥१३४॥ विचूनं शरं तावत् कोपाग्नेः प्रथमेन्धनम् । करवाणीदमेवास्तु "तनुशल्कैरुपेन्धनम् ॥१३५॥ ? भवनके आंगन में कोई देदीप्यमान बाण आकर पड़ा है उसीसे यह क्षोभ हुआ है इसका दूसरा कारण नहीं है ।। १२५ ।। हे प्रभो, जिस किसी देव अथवा दानवने यह बाण छोड़ा है हम सव लोग उसका प्रतिकार करनेके लिये तैयार हैं ।। १२६ ।। इस प्रकार रक्षा करनेवाले वीर योद्धाओं ने शीघ्र ही आकर अपने स्वामी मागध देवसे निवेदन किया और मागध देवने भी बड़े जोरसे उन्हें उत्तर दिया कि चुप रहो, इस प्रकार वीर वाक्योंसे कुछ लाभ नहीं है ॥१२७॥ तुम लोग वे ही मेरे अधीन रहनेवाले देव हो और मैं भी वही मागध देव हूं, क्या मुझे कभी पहले अपना शत्रु सहन हुआ है ? यह बात तुम लोगोंने पहले भी कभी सुनी है ।। १२८।। जो पुरुष पराभव से मलिन हुए अपने प्राणोंको धारण करता है वह गुणोंसे पुरुष नहीं कहलाता किन्तु केवल लिङ्ग से ही पुरुष कहलाता है ॥ १२९ ॥ जो पुरुष, पुरुषोंमें पाये जानेवाले गुणों के बिना केवल नाम से ही पुरुष बनना चाहता है वह या तो चित्रमें लिखा हुआ पुरुष है अथवा तृण काष्ठ वगैरह से बना हुआ पुरुष है ।। १३०|| जो अपने पराक्रमसे अपने कुल और जन्मको पवित्र करता है वास्तवमें वही पुरुष कहलाता है, इसके विपरीत जो मनुष्य झूठमूठ ही अपनेको वीर कहता है पृथिवीपर उसका जन्म न लेना ही अच्छा है || १३१|| हम लोग शत्रुओंको जीतने से ही 'देव' कहलाते हैं, इच्छानुसार जहां तहां बिहार करने मात्र से देव नहीं कहलाते इसलिये हम लोगोंकी संपत्ति सदा शत्रुओंको विजय करने मात्र से ही प्राप्त हो । १३२ ।। जो मनुष्य रत्न आदि वस्तु, हाथी घोड़े आदि वाहन और छत्र चमर आदि राज्यके चिह्न देकर किसी दूसरेकी आराधना-सेवा करता है उसका ऐश्वर्य दूसरोंके उपभोगके लिये हो और मैं ऐसे ऐश्वर्यको केवल विडम्बना समझता हूं ॥ १३३ ॥ बाण चलानेवाला यह कोई राजा मुझसे धन चाहता है सो इसके लिये मैं युद्धके साथ साथ निधन अर्थात् मृत्यु दूंगा ||१३४|| सबसे पहले मैं इस बाण को चूर कर अपने क्रोधरूपी अग्निका पहला ईधन बनाऊंगा, यही बाण अपने छोटे छोटे टुकड़ों ४७ १ प्रभो वयम् स० अ०, प०, इ० । २ अङ्गरक्षिभटैः । ३ तूष्णीं तिष्ठत । ४ ते पूर्वस्मिन् विद्यमाना एव । ५ परिभव । ६ तृणपुरुषः । चञ्चोऽनलादिनिर्माण चञ्चा तु तृणपूरुष', इत्यभिधानात् । करिकलभन्यायमाश्रित्य पुनः पुरुष शब्दप्रयोगः । ७ वा ल०, ब०, अ०, प०, स० द०, इ० ८ पुरुष सम्बन्धिभिः । अनुत्पत्तिः । 'नो निः शापे' इति अनिप्रत्ययान्तः । १० दीव्यन्ति विजिगीषन्तीति देवाः । ११ स्वैरविहारतः । कीडाविहारत इति भावः । १२ परभोगिभ्यो हितम् । १३ अस्मत् । १४ प्रधनैः द०, इ०, ल०, अ०, प०, स० । युद्धैः । 'युद्धमायोधनं जन्यं प्रधनं प्रविदारणम्' इत्यभिधानात् । १५. अल्पशकालैः ( चूर्णीकृतशरीरेन्धनः ) । १६ सन्धुक्षणम्, शत्रुशरीरशकलैः । अग्निज्वालनम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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