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________________ ४६ महापुराणम् गत्वा कतिवयान्यब्धौ योजनानि रथः प्रभोः । स्थितोऽन्तर्जलमाक्रम्य प्रस्ताश्व इव वाधिना ॥ ११४ ॥ द्विषयोजनमागाय स्थिते मध्येऽर्णव' रथे । रथाङ्गपाणिरारुष्टो' जग्राह किल कार्मुकम् ॥ ११५ ॥ स्फुरज्ज्यं वज्रकाण्डं तद्धनुरारोपितं यदा । तदा जीवित सन्देहवोलारूढमभूज्जगत् ॥ ११६॥ स्फुरन्मौर्वीरवस्तस्य मुहुः प्रध्वानयन् विशः । प्रक्षोभमनयद्वाधिं चलत्तिमिकुलाकुलम् ॥११७॥ संहार्यः किममुष्याब्धिः उत विश्वमिदं जगत् । इत्याशङक्य क्षणं तस्थे तदा नभसि खेचरैः ॥ ११८ ॥ ast गुणवत्यस्मिन् ऋजुकर्मणि कार्मुके । श्रमोघं सन्दधे बाणं श्लाध्यं 'स्थानकमास्थितः ॥ ११६ ॥ 'श्रहं हि भरतो नाम चक्री वृषभनन्दन: । मत्साद्भवन्तु मद्भुक्तिवासिनो' व्यन्तरामराः ॥१२०॥ इति व्यक्तलिपिन्यासो दूतमुख्य इव द्रुतम् । स पत्रीं चक्रिणा मुक्तः प्राङ्मुखीमास्थितो गतिम् ॥ १२१ ॥ जितनिर्घातनिर्घोषं ध्वनिं कुर्वशभस्तलात् । न्यपप्तन्मागधावासे तत्सैन्यं क्षोभमानयन् ॥ १२२ ॥ किमेष क्षुभितोऽम्भोधिः कल्पान्तपवनाहतः । निर्घातः किस्विवुद्ध्वान्तो भूमिकम्पो नु जृम्भते ॥ १२३॥ इत्याकुलाकुलधियः तन्निकायोपगाः सुराः । परिवव्रुरुपेत्यैनं सप्तद्धा मागधं प्रभुम् ॥ १२४ ॥ देव दीप्रः शरः कोऽपि पतितोऽस्मत्सभागणे । तेनायं प्रकृतः क्षोभो न किञ्चित्कारणान्तरम् ॥१२५॥ गया और पुण्यरूपी सारथिके द्वारा प्रेरित हुआ उनका मनोरथ भी सफलताको प्राप्त हो गया ॥ ११३ ॥ महाराज भरतका रथ समुद्रमें कुछ योजन जाकर जलके भीतर ही खड़ा हो गया मानो समुद्रने ऊपरकी ओर बढ़कर उसके घोड़े ही थाम लिये हों ॥ ११४॥ जब वह रथ समुद्र के भीतर बारह योजन चलकर खड़ा हो गया तब चक्रवर्तीने कुछ कुपित होकर धनुष उठाया ॥ ११५ ॥ जिसकी प्रत्यंचा ( डोरी) स्फुरायमान है और काण्ड वजूके समान है ऐसा वह धनुष जिस समय चक्रवर्तीने प्रत्यंचासे युक्त किया था उसी समय यह जगत् अपने जीवित रहनेके संदेह रूपी झूलापर आरूढ़ हो गया था अर्थात् समस्त संसारको अपने जीवित रहनेका संदेह हो गया था ।। ११६ ।। समस्त दिशाओंको बार-बार शब्दायमान करते हुए चक्रवर्तीके धनुषकी स्फुरायमान प्रत्यंचा शब्दने इधर-उधर भागते हुए मच्छोंके समूहसे भरे हुए समुद्रको भी क्षोभित कर दिया था ।। ११७ ।। क्या यह चक्रवर्ती इस समुद्रका संहार करना चाहता है अथवा समस्त संसारका ? इस प्रकार आशंका कर विद्याधर लोग उस समय क्षण भरके लिये आकाशमें खड़े हो गये थे ।।११८।। जो टेढ़ा होकर भी गुणवान् ( पक्ष में डोरीसे सहित) और सरल कार्य करनेवाला था ( पक्षमें सीधा बाण छोड़नेवाला था ) ऐसे उस धनुषपर चक्रवर्तीने प्रशंसनीययोग्य आसनसे खड़े होकर कभी व्यर्थ न जानेवाला अमोघ नामका बाण रखा ।। ११९ ॥ 'मैं वृषभदेवका पुत्र भरत नामका चक्रवर्ती हूँ इसलिये मेरे उपभोगके योग्य क्षेत्रमें रहनेवाले सब व्यन्तर देव मेरे अधीन हों इस प्रकार जिसपर स्पष्ट अक्षर लिखे हुए हैं ऐसा हुआ वह चक्रवर्ती के द्वारा चलाया हुआ वाण मुख्य दूतकी तरह पूर्व दिशाकी ओर मुख कर चला ॥। १२०-१२१ ॥ और जिसने वज्रपातके शब्दको जीत लिया है ऐसा भारी शब्द करता हुआ तथा मागध देवकी सेनामें क्षोभ उत्पन्न करता हुआ वह बाण आकाश-तलसे मागध देवके निवासस्थानमें जा पड़ा ।। १२२ ।। क्या यह कल्पान्त कालके वायुसे ताड़ित हुआ समुद्र ही क्षोभको प्राप्त हुआ है ? अथवा जोरसे शब्द करता हुआ वजू पड़ा है ? अथवा भूमिकंप ही हो रहा है ? इस प्रकार front बुद्धि अत्यन्त व्याकुल हो रही है ऐसे उसके समीप रहनेवाले व्यन्तरदेव तैयार होकर HTTE देवके पास आये और उसे घेरकर खड़े हो गये ।। १२३ - १२४ ।। हे देव, हमारे सभा १ जलमध्ये । २ अर्णवमध्ये | ३ क्रुद्धः । ४ स्फुरन्ती ज्या मौर्वी यस्य स तम् । ६ स्थानकम् प्रत्यालीढादिस्थानम् । ७ मदधीना भवन्तु । ८ मम क्षेत्रवासिन इत्यर्थः । १० पूर्वाभिमुखीम् । ११ अशनि । १२ अत्याकुलबुद्धयः । १३ विहितः । Jain Education International For Private & Personal Use Only ५ चक्रिणः । ६ बाणः । www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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