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________________ सप्तचत्वारिंशत्तमं पर्व श्रथ कदाचिदसौ वदनाम्बुजं Jain Education International समभिवीक्ष्य समुज्ज्वलदर्पणे । पलितमैक्षत दूतमिवागतं परमसौख्यपदात् पुरुसन्निधेः ॥३६२॥ श्रालोक्य तं गलितमोहरसः स्वराज्यं मत्वा जरत्तृणमिवोद्गत बोधिरुद्यन्' । श्रादातुमात्महितमात्मजमर्ककीर्ति लक्ष्म्या स्वया स्वयमयोजयजितेच्छः ॥ ३६३॥ विदितसकलतत्त्वः सोऽपवर्गस्य मार्ग जिगमिषुरपस' गमं निष्प्रयासम् । "यमसमितिसमग्रं संयमं शम्बलं वा sदित विदितस' मर्याः किं परं प्रार्थयन्ते ॥ ३६४ ॥ मन:पर्ययज्ञानमप्यस्य सद्यः समुत्पन्नवत् केवलं चानु' तस्मात्" । तदेवाभवद् भव्यता तादृशी सा विचित्राङगिनां निर्वृतेः प्राप्तिरत्र ॥ ३६५॥ स्वदेशोद्भवंरेव" सम्पूजितोऽसौ सुरेन्द्रादिभिः साम्प्रतं वन्द्यमानः । त्रिलोकाधिनाथोऽभवत्किं न साध्यं तपो दुष्करं चेत् समादातुमीशः १२ ॥ ३६६॥ अथानन्तर भरत महाराजने किसी समय उज्ज्वल दर्पणमें अपना मुखकमल देखकर परम सुखके स्थान स्वरूप भगवान् वृषभदेवके पाससे आये हुए दूतके समान सफेद बाल देखा ।। ३९२ ।। उसे देखकर जिनका सब मोहरस गल गया है, जिन्हें आत्मज्ञान उत्पन्न हुआ है जो आत्महितको ग्रहण करनेके लिये उद्युक्त हैं और जिनकी वैराग्यविषयक इच्छा अत्यन्त सुदृढ़ तथा वृद्धिशील है ऐसे भरतने अपने राज्यको जीर्णतृणके समान मानकर अपने पुत्र अर्ककीर्तिको अपनी लक्ष्मी से युक्त किया अर्थात् अपनी समस्त सम्पत्ति अर्ककीर्तिको प्रदान कर दी ॥ ३९३॥ जिसने समस्त तत्त्वोंको जान लिया है और जो हीन जीवोंके द्वारा अगम्य मोक्षमार्ग में गमन करना चाहते हैं ऐसे चक्रवर्ती भरतने मार्ग हितकारी भोजनके समान प्रयासहीन यम तथा समितियोंसे पूर्ण संयमको धारण किया था सो ठीक ही है क्योंकि पदार्थके यथार्थ स्वरूपको समझने वाले पुरुष संयम के सिवाय अन्य किस पदार्थकी प्रार्थना करते हैं। ? ॥३९४॥ उन्हें उसी समय मन:पर्ययज्ञान उत्पन्न हो गया और उसके बाद ही केवलज्ञान प्रकट हो गया । उनकी वैसी भव्यता उसी समय प्रकट हो गई सो ठीक ही है क्योंकि प्राणियोंको मोक्षकी प्राप्ति बड़ी विचित्र होती है ।। ३९५ ।। जो भरत पहले अपने देशमें उत्पन्न हुए राजाओंसे ही पूजित थे वे अब इन्द्रोंके द्वारा भी वन्दनीय हो गये । इतना ही नहीं, तीन लोकके स्वामी भी हो गये सो ठीक ही है जो कठिन तपश्चरण ग्रहण करनेके लिये समर्थ रहता है उसे क्या क्या वस्तु साध्य ५१३ १ उत्समानः । २ गन्तुमिच्छुः । ३ अपगतबलैः । ४ मूलगुणसमूह । ५ पादेयमिव । ६ स्वीकृतवान् । ७ ज्ञातसमीचीनार्थाः । ज्ञातार्थक्रियासमर्था वा । ८ समुद्भूतम् । ६ पश्चात् । १० संयमात् । ११ षट्खण्डनैः । १२ समर्थः । ६५ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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