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________________ सप्तचत्वारिंशत्तमं पर्व एष पात्रविशेषस्ते संवोढ़ शासनं महत् । इति विश्वमहीशन' देवदेवस्य सोऽपितः ॥२८४॥ कृतग्रन्थपरित्यागः प्राप्तग्रन्थार्थसङग्रहः । प्रकृष्टं संयमं प्राप्य सिद्धसद्धिद्धितः ॥२८॥ चतुर्ज्ञानीमलज्योतिर्हताततमनस्तमाः। अभूद गणधरो भर्तुः एकसप्ततिपूरकः ॥२८६॥ सलोचनाप्यसंहार्यशोका पतिवियोगतः । गलिताकल्पवल्लीव "प्रम्लानामरभूरुहात् ॥२८७॥ शमिता चक्रवर्तीष्टकान्तयाऽशु सुभद्रया । ब्राह्मीसमीपे प्रव्रज्य भाविसिद्धिश्चिरं तपः ॥२८॥ कृत्वा विमाने साऽनुत्तरेऽभूत कल्पेऽच्युतेऽमरः। आदितीर्थाधिनाथोऽपि मोक्षमार्ग प्रवर्तयन् ॥२८६॥ चतुरुत्तरयाऽशीत्या विविद्धिविभूषितः। चिरं वृषभसेनादिगणेशैः परिवेष्टितः ॥२६॥ खपञ्चसप्तवा शिमितपूर्वधरान्वितः । खपञ्चैकचतुर्मे शिक्षकर्म निभिर्युतः ॥२६॥ तुतीयज्ञानसत्रैः सहस्रनवभिवतः । केवलावगमविंशतिसहस्रः समन्वितः ॥२२॥ खद्वय खपक्षोरुविक्रिद्धि विद्धितः । खपञ्चसप्तपक्षकमिततुर्यविदन्वितः ॥२६॥ तावद्भिर्वादिभिर्वन्धो निरस्तपरवादिभिः । चतुरष्टखवार्द्धचष्टमितः सर्वश्च पिण्डितः ॥२६४॥ संयमस्थानसम्प्राप्तसम्पद्भिस्सद्भिरचितः। खचतुष्केन्द्रियाग्न्युक्तपूज्यब्राह्मचायिकादिभिः ॥२६॥ प्रायिकाभिरभिष्ट्रयमाननानागुणोदयः। दृढवतादिभिर्लक्षत्रयोक्तः श्रावकः श्रितः ॥२६६॥ श्राविकाभिः स्तुतः पञ्चलक्षाभिः सुव्रतादिभिः। भावनादिचतुर्भेददेवदेवीडितक्रमः ॥२६७॥ उस समय भगवान् ऋषभदेवके समीप जयकुमार ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो आपके बड़े भारी शासनको धारण करनेके लिये यह एक विशेष पात्र है यही समझकर महाराज भरतने उसे भगवान्के लिये सौंपा हो ॥२८४। इस प्रकार जिसने सब परिग्रहका त्याग कर दिया पूर्ण श्रतका अर्थसंग्रह प्राप्त किया है, जो उत्कृष्ट संयम धारणकर सात ऋद्धियोंसे निरन्तर बढ़ रहा है, और चार ज्ञानरूपी निर्मल ज्योतिसे जिसने मनका विस्तीर्ण अंधकार नष्ट कर दिया है ऐसा वह जयकुमार भगवान्का इकहत्तरवां गणधर हुआ ॥२८५-२८६॥ इधर पतिके वियोगसे जिसे बड़ा भारी शोक रहा है और जो पड़े हुए कल्पवृक्षसे नीचे गिरी हुई कल्पलताके समान निष्प्रभ हो गई है ऐसी सुलोचनाने भी चक्रवर्तीकी पट्टरानी सुभद्राके समझाने पर ब्राह्मी आर्यिकाके पास शीघ्र ही दीक्षा धारण कर ली और जिसे आगामी पर्यायमें मोक्ष होनेवाला है ऐसी वह सुलोचना चिरकाल तक तप कर अच्युतस्वर्गके अनुत्तरविमानमें देव पैदा हुई । इधर जो मोक्षमार्गकी प्रवृत्ति चला रहे हैं, अनेक ऋद्धियोंसे सुशोभित वृषभसेन आदि चौरासी गणधरोंसे घिरे हुए हैं, चार हजार सात सौ पचास पूर्वज्ञानियोंसे सहित हैं, चार हजार एक सौ पचास शिक्षक मुनियोंसे युक्त हैं, नौहजार अवधिज्ञानरूपी नेत्रको धारण करनेवाले मुनियोंसे सहित हैं, बीस हजार केवलज्ञानियोंसे युक्त हैं, बीस हजार छह सौ विक्रिया ऋद्धिके धारक मुनियोंसे वृद्धिको प्राप्त हो रहे हैं, बारह हजार सात सौ पचास मनःपर्ययज्ञानियोंसे अन्वित हैं, परवादियोंको हटानेवाले बारह हजार सात सौ पचास वादियोंसे बन्दनीय हैं, और इस प्रकार सब मिलाकर तपश्चरणरूपी सम्पदाओंको प्राप्त करनेवाले चौरासी हजार चौरासी मुनिराज जिनकी निरन्तर पूजा करते हैं, ब्राह्मी आदि तीन लाख पचास हजार आर्यिकाएं जिनके गुणोंका स्तवन कर रही हैं, दृढव्रत आदि तीन लाख श्रावक जिनकी सेवा कर रहे हैं, सुव्रता आदि पांच लाख श्राविकाएं जिनकी स्तुति कर रही हैं, भवनवासी आदि चार प्रकारके देव देवियां जिनके चरणकमलोंका स्तवन कर रही हैं, चौपाये आदि तिर्यञ्चगतिके जीव जिनकी १ भरतेश्वरेण । २ वृषभेश्वरस्य। ३ जयः । ४ भ्रष्टादमर-ल०, ५०, अ०, स०, इ० । ५ उपशान्ति नीता। ६ मातु योग्य । ७-भिर्वृतः ल० । ८ अवधिज्ञान । -भिर्युतः ल० । १०-राजितः । ११ मन:पर्ययज्ञानिसहितः ।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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