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502 Mahapuraanam Ravi Prabha, pleased with their greatness, approached them in amazement. || 271 || Having narrated his own story, he asked the young men for forgiveness. He worshipped them with great jewels and went to the heavenly world. || 272 || Thus, after spending a long time in joy with his beloved, he returned to the city and experienced the essence of happiness. || 273 || Then, one day, Jayakumar, who had attained enlightenment, went to the Tirtha-Adinatha, the Lord of the Clouds, and worshipped him, the object of joy. || 274 || Having asked questions about Dharma, and having heard the appropriate answers from him, he discussed the Aakshepini and other stories, the bondage and the rise of karma, etc. || 275 || Having attained liberation from karma, and having obtained the essence of peace, Jayakumar, the beloved of the world, the son of Shivaṅkara Mahadevi, || 276 || Anantavirya, known for his infinite valor, a master of weapons and scriptures, whose fame spread from his childhood, whose bravery extended to the conquest of his enemies, whose charity satisfied all beggars, and whose truth never wavered even in dreams, || 277 || performed the coronation of Anantavirya and gave him all his wealth. || 278 || Jayakumar, who was eager to attain the supreme state, who had renounced his entire family, who had subdued his senses, who had overcome the great delusion, and who had accumulated good deeds, || 279 || along with his younger brothers, who were determined to renounce possessions, who were free from attachment and aversion, and who were named Ravi-kirti, Ravi-jaya, Ari-ndama, Ari-njaya, Su-jaya, Su-kanta, the seventh Ajita-njaya, Maha-jaya, Ati-virya, Vara-njaya, Ravi-virya, and other sons of the Chakravartis who had attained renunciation, || 280 || received initiation. || 283 ||
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________________ . ५०२ महापुराणम् प्राशंसत्' सा' तयोस्ताङमाहात्म्यं सोऽपि विस्मयात् । रविप्रभः समागत्य तावुभौ तद्गुणप्रियः ॥ २७१ ॥ स्ववृत्तान्तं समाख्याय युवाभ्यां क्षम्यतामिति । पूजयित्वा महारत्नैर्नाकलोकं समीयिवान् ॥२७२॥ तथा चिरं विहृत्यात्तसम्प्रीतिः कान्तया समम् । निवृत्य पुरमागत्य सुखसारं समन्वभूत् ॥ २७३॥ अथान्यदा समुत्पन्नबोधिर्मेघस्वराधिपः । तीर्थाधिनाथ' मासाद्य वन्दित्वाऽऽनन्दभाजनम् ॥ २७४ ॥ कृत्वा धर्मपरिप्रश्नं श्रुत्वा तस्माद्यथोचितम् । प्राक्षेपिण्यादिकाः सम्यक्' कथाबन्धोदयादिकम् ॥ २७५॥ कर्मनिर्मुक्तम्प्राप्यं शर्मसारं प्रबुद्धधीः । शिवङकरमहादेव्यास्तनूजो 'जगतां प्रियः ॥२७६॥ प्रवार्योऽनन्तवीर्याख्यः शत्रुभिः शस्त्रशास्त्रवित् । श्राकुमारं यशस्तस्य" शौयं शत्रुजयावधि ॥ २७७॥ त्यागः सर्वार्थसन्तर्पी सत्यं स्वप्नेऽप्यविप्लुतम् । विधायाभिषवं तस्मै प्रदायात्मीयसम्पदम् ॥२७८॥ पदं परं परिप्राप्तुमव्यग्रमभिलाषुकः । विसर्जितसगोत्रा दिविनिर्जितनिजेन्द्रियः ॥२७६॥ विजतमहामोहः समजित शुभाशयः १३ । विजयेन जयन्तेन सञ्जयन्तेन सानुजैः ॥ २८०॥ श्रश्च निश्चितत्यागं रागद्वेषाविदूषितैः । रविकीर्ती" रिपु" जयोऽरिन्दमोऽरिञ्जया ह्वयः ॥२८१ ॥ सुजयश्च सुकान्तश्च सप्तमश्चाजितञ्जयः । महाजयोऽतिवीर्यश्च "वीरञ्जयसमा ह्वयः ॥ २८२ ॥ रविवीर्यस्तथाऽन्ये च ततूजाश्चक्रवर्तिनः । तैश्च सार्द्धं सुनिर्विण्णैश्चरमाङगो विशुद्धिभाक् ॥ २८३ ॥ वृत्तान्त कहकर उन दोनोंसे क्षमा मांगी और फिर बड़े बड़े रत्नोंसे पूजा कर वह स्वर्गको चला गया । इधर जयकुमार भी प्रिया - सुलोचनाके साथ चिरकाल तक बड़े प्रेमसे विहारकर वापिस लौटे और नगरमें आकर श्रेष्ठ सुखोंका अनुभव करने लगा ।। २५९-२७३॥ अथानन्तर - जिसे आत्मज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे जयकुमारने किसी एक दिन आनन्दके पात्र श्री आदिनाथ तीर्थ करके पास जाकर उनकी वन्दना की, धर्मविषयक प्रश्न कर उनका यथा योग्य उत्तर सुना, आक्षेपिणी आदि कथाएं कहीं और कर्मोंके बन्ध उदय आदिकी चर्चा की ।।२७४ - २७५ ।। इस प्रकार प्रबुद्ध बुद्धिको धारण करनेवाले जयकुमारने कर्मों के नाशसे प्राप्त होने योग्य श्रेष्ठ सुखको प्राप्त किया । तदनन्तर उसने जो लोगोंको बहुत ही, प्रिय है, जिसे शत्रु नहीं रोक सकते हैं, जो शस्त्र और शास्त्र दोनोंका जाननेवाला है, जिसका यश कुमार अवस्थासे ही फैल रहा है, जिसकी शूरवीरता शत्रुओंके जीतने तक है, जिसका दान सब याचकोंको संतुष्ट करनेवाला है, और जिसका सत्य कभी स्वप्न में भी खण्डित नहीं हुआ है ऐसे शिवंकर महादेवीके पुत्र अनन्तवीर्यका राज्याभिषेक कर उसे अपनी सब राज्य संपदा दे दी ।। २७६ - २७८ ।। तदनन्तर जो आकुलता रहित परम पद प्राप्त करनेकी इच्छा कर रहा है, जिसने अपने सब कुटुम्बका परित्याग कर दिया है, अपनी इन्द्रियोंको वश कर लिया है, महामोहको डांट दिखा दी है और शुभास्रवका संचय किया है ऐसे चरमशरीरी तथा विशुद्धि को धारण करनेवाले जयकुमारने विजय, जयंत, संजयन्त तथा परिग्रहके त्यागका निश्चय करनेवाले और राग द्वेषसे अदूषित अन्य छोटे भाइयों एवं रविकीर्ति, रविजय, अरिंदम, अरिंजय, सुजय, सुकान्त, सातवां अजितंजय, महाजय, अतिवीर्य, वरंजय, रविवीर्य तथा इनके सिवाय और भी वैराग्यको प्राप्त हुए चक्रवर्तीके पुत्रोंके साथ साथ दीक्षा धारण की ।। २७९ - २८३॥ १ प्रशंसां चकार । २ जयसुलोचनयोः । ३ तया ल० । ४ मण्डभाजनं कल्याणभाजनं वा । तीर्थादि-ल० । ५ आक्षेपणी विक्षेपणी संवेजनी निर्वेजनीति चेति चतस्रः । “आक्षेपणीं स्वमतसंग्रहणीं समेक्षी विक्षेपणीं कुमतनिग्रह्णीं यथार्हम् । संवेजनीं प्रथयितुं सुकृतानुभावं निर्वेजनीं वदतु धर्मकथाविरक्त्यै ।” ६ कृत्वा कथा बन्धोदयादिकाः ल०, प०, इ०, स० । ७ कर्मबन्धविमुक्तैः प्राप्तुं योग्यम् । ८ जनताप्रियः ल०, प०, अ०, स०, इ० । ६ कुमारकालादारभ्य । १० अनन्तवीर्यस्य । ११ अविच्युतम् । निर्बाधं वा । १२ बान्धवादि । सगोत्रबान्धवज्ञातिबन्धुस्वस्वजनाः समाः ' इत्यभिधानात् । १३ शुभास्रवः ल० । १४ रविकीर्तिनामा । १५ रविजयो ल०, प०, स०, इ० 1 १६ वरञ्जय ल०, अ०, प०, स० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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