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________________ सप्तचत्वारिंशत्तमं पर्व खगाद्रेः पूर्वदिग्भागे नीलादेरपि पश्चिमे । सुसीमाख्योऽस्ति देशोऽत्र महानपरमप्यदः ॥ ६५॥ तद्भूतवनमेतत्त्वं सम्यक् चित्तेऽवधारय । श्रस्मिन्नेताः शिलाः सप्त परस्परधृताः कृताः ॥६६॥ येनाsaौ चक्रतत्वं प्राप्तेत्यादेश" ईदृशः । इति तद्वचनादेष 'तास्तथा कृतवांस्तदा ॥६७॥ दृष्ट्वा तत्साहसं वक्तुं सोऽगम नगरेशिनः । कुमारोऽपि विनिर्गत्य ततो निर्विण्णचेतसा ॥ ६८ ॥ काञ्चिज्जरावतीं 'कुत्स्यशरीरां कस्यचित्तरोः । श्रवस्थितामधोभागे विषयं पुष्कलावतीम् ॥६६॥ वद प्रयाति कः पन्था इत्यप्राक्षीत् प्रियं वहन् " । विना गगनमार्गेण प्रयातुं नैव शक्यते ॥७०॥ स गव्पू" तिदशतोत्सेध विजयार्द्ध गिरेरपि । परस्मिनित्यसावाह" तदाकर्ण्य नृपात्मजः ॥७१॥ ब्रूहि तत्प्रापणोपायमिति तां प्रत्यभाषत । इह जम्बूमति द्वीपे विषयो वत्सकावती ॥७२॥ तत्खेचरगिरौ राजपुर खेचरचक्रिणः । देवी धरणिकम्पस्य सुप्रभा" वा प्रभाकरी ॥७३॥ तयोरहं तनूजास्मि विख्याताख्या सुखावती । "त्रिप्रकारोरविद्यानां पारगाऽन्येद्युरागता ॥७४॥ विषये वत्सकावत्यां विजयार्धमहीधर । श्रकम्पनसुतां पिप्पलाख्यां प्राणसमां सुखीम् ॥७५॥ गाभिवीक्षित् तत्र" चित्रमालोक्य कम्बलम् । कथयायं कुतस्त्यस्ते तन्वीति प्रश्नतो मम ॥७६॥ । नीचे बैठे हुए किसी विद्याधरको देखकर उससे पूछा कि यह कौन सा देश है ? तब वह विद्याधर कहने लगा कि ॥४६ - ६४ ॥ विजयार्ध पर्वतकी पूर्व दिशा और नीलगिरिकी पश्चिमकी ओर यह सुसीमा नामका देश है, इसमें यह महानगर नामका नगर है और यह भूतारण्य वन है, यह तू अपने मनमें अच्छी तरह निश्चय कर ले, इधर इस वनमें ये सात शिलाएं पड़ी हैं जो कोई इन्हें परस्पर मिलाकर एकपर एक रख देगा वह चक्रवर्ती पदको प्राप्त होगा ऐसी सर्वज्ञ देवकी आज्ञा है' विद्याधरके यह वचन सुनकर श्रीपालकुमारने उन शिलाओंको उसी समय एकके ऊपर एक करके रख दिया ।।६५ - ६७ ॥ कुमारका यह साहस देखकर वह विद्याधर नगरके राजाको खबर देनेके लिये चला गया और इधर कुमार भी कुछ उदासचित्त हो वहाँ से निकलकर आगे चला। आगे किसी वृक्षके नीचे निन्द्य शरीरको धारण करनेवाली एक बुढ़ियाको देखकर मधुर वचन बोलनेवाले कुमारने, उससे पूछा कि पुष्कलावती देशको कौन सा मार्ग जाता है, बताओ, तब बुढ़ियाने कहा कि वहां आकाश मार्गके बिना नहीं जाया जा सकता क्योंकि वह देश पच्चीस योजन ऊंचे विजयार्धं पर्वतसे भी उस ओर है, यह सुनकर राजपुत्र श्रीपालने उससे फिर कहा कि वहां जानेका कुछ भी तो मार्ग बतलाओ । तब वह कहने लगी इस जम्बू द्वीपमें एक वत्सकावती नामका देश है, उसके विजयार्ध पर्वतपर एक राजपुर नामका नगर है उसमें विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा धरणीकंप रहता है, उसकी कान्तिको फैलानेवाली सुप्रभा नामकी रानी है, मैं उन्हीं दोनोंकी प्रसिद्ध पुत्री हूं, सुखावती मेरा नाम है और मैं जाति विद्या, कुल विद्या तथा सिद्ध की हुई विद्या इन तीनों प्रकारकी बड़ी बड़ी विद्याओंकी पारगामिनी हूं । किसी एक दिन मैं वत्सकावती देशके विजयार्ध पर्वतपर अपने प्राणोंके समान प्यारी सखी, राजा अकंप की पुत्री पिप्पलाको देखनेके लिए गई थी। वहां मैंने एक विचित्र कम्बल देखकर उससे पूछा कि हे सखि, कह, यह कम्बल तुझे कहांसे प्राप्त हुआ है ? उसने कहा कि 'यह कम्बल मेरी ही आज्ञासे प्राप्त हुआ है' । कम्बल प्राप्तिके समयसे ही कम्बलवालेका ध्यान करती हुई वह अत्यन्त विह्वल हो रही है ऐसा सुनकर उसकी सखी मदनवती उसे देखनेके लिये उसी १ वने । २ एकैकस्याः उपर्युपरिस्थिताः । ३ विहिता । ४ प्राप्स्यति । ५ शीतलाः । ६ नगरेशितुः ६ अधः- ल० । १० प्रियं वदः ल० । अपरभागे । १४ जरती । १५ चन्द्रिकेव । १८ पिप्पलायाम् । ७ वनात् । निन्द्य । १२ पञ्चविंशतियोजन | १३ १७ महीतले ल०, प० । ल०, प०, अ०, स०, इ० ११ पुष्कलावतीविषयः । १६ नातिकुलसाधितविद्यानाम् । ४८५ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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