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________________ चतुश्चत्वारिंशत्तम पर्व ४२१ इति सौलोचने य द्धे समिद्धे शमिते तदा । पपात पञ्चभूजेभ्यो वृष्टिः सुमनसा दिवः ॥३४६॥ जयश्रीवुर्जयस्वामितनूजविजयाजिता । नोत्सेकायति' नास्यैनं त्रयैव "प्रत्युताश्रयत् ॥३४७॥ 'जयेनास्थान सङग्रामजयायातेति लज्जया। दूरीकृतेव तत्कीतिदिगन्तमगमत्तवा ॥३४८॥ अकम्पनमहीशस्य यूथेशं' वा वनद्विपः । भूपः संयमितः सार्धम् अर्ककीर्ति समर्प्य सः ॥३४६॥ विजयार्द्धमहागन्धसिन्धुरस्कन्धसन्धृतः । निर्भत्सितोदयक्ष्माभन्म स्थवन मण्डलः ॥३५०॥ रणभूमि समालोक्य समन्ताद्बहुविस्मयः। मृतानां "प्रेतसंस्कारं "जीवतां जीविकाक्रियाम् ॥३५१॥ कारयित्वा पुरीं सर्वसम्मदाविष्कृतोदयाम् । प्राविशत् प्रकटैश्वर्यः सह मेघप्रभादिभिः॥३५२॥ अकम्पनोऽप्यनुप्राप्य वृतैरन्तः समाकुलः। राजकण्ठीरवैर्वामा राजपुत्रशतैः२० पुरम् ॥३५३॥ सरक्षान् धृतभूपालान् कुमारं च नियोगिभिः। प्राश्वास्याश्वासकुशलर्यथा स्थानमवापयत् ॥३५४॥ विचिन्त्य विश्वविघ्नानां विनाशोहत्प्रसादतः । इति वन्दितुमाजग्मुः सर्वे नित्य मनोहरम् ॥३५॥ दूरादेवावरुह्यात्मवाहेभ्यः२२ शान्तचेतसः। परीत्यार्थाभिरागत्य "तुष्टुवः स्तुतिभिर्भाजनान् ॥३५६॥ वरुणके समान नागपाशसे इस प्रकार बांधा जिससे वे हिल-डुल न सकें ॥३४४-३४५॥ इस प्रकार जब सुलोचना सम्बन्धी प्रचण्ड युद्ध शान्त हो गया तब स्वर्गके पांच प्रकारके कल्पवृक्षों से फूलोंकी वर्षा हुई ॥३४६।। अपने दुर्जेय स्वामी (भरत) के पुत्र अर्ककीतिके जीतनेसे उत्पन्न हुई विजयलक्ष्मी जयकुमारके अहंकारके लिये नहीं हुई थी बल्कि इसके विपरीत लज्जाने ही उसे आ घेरा था ॥३४७॥ 'यह अयोग्य समयमें किये हुए संग्रामके जीतनेसे आई है' इस लज्जा के कारण जयकुमारके द्वारा दूर की हुईके समान उसकी वह कीति उसी समय दिशाओंके अन्त तक चली गई थी ॥३४८। जिस प्रकार समर्थ पुरुष जंगली हाथियोंके समान झुण्डके मालिक बड़े हाधीको पकड़कर राजाके लिये सौंपते हैं उसी प्रकार जयकुमारने बंधे हुए अनेक राजाओं के साथ अर्ककीतिको महाराज अकंपनके लिये सौंप दिया, तदनन्तर उदयाचलके शिखरपर स्थित सूर्यमण्डलको तिरस्कृत करता हुआ विजयाई नामके बड़े भारी मदोन्मत्त हाथी के स्कंधपर सवार होकर युद्धका मैदान देखने के लिये निकला, चारो ओरसे युद्धका मैदान देखकर उसे बहुत आश्चर्य हुआ, उसने मरे हुए लोगोंका दाह संस्कार कराया और जीवित पुरुषोंके अच्छे होनेका उपाय कराया, इस प्रकार जिसका ऐश्वर्य प्रकट हो रहा है ऐसे जयकुमारने मेघप्रभ आदिके साथ साथ सबको आनन्द मिलनेसे जिसकी शोभा खूब प्रकट की गई है ऐसी काशीनगरी में प्रवेश किया ॥३४९-३५२॥ महाराज अकंपनने भी सैकड़ों राजपुत्रों तथा सिंहके समान तेजस्वी राजाओं के साथ साथ नगरमें पहुंचकर रक्षा करनेवाले जिनके साथ हैं ऐसे बंधे हुए अनेक राजाओं तथा अर्ककीतिको समझाने में कुशल नियुक्त किये हुए पुरुषों द्वारा समझा-बुझाकर उन्हें उनके योग्य स्थानपर पहुंचाया ॥३५३-३५४॥ अरहन्तदेवके प्रसादसे ही सब विघ्नोंका नाश होता है ऐसा विचारकर सब लोग वन्दना करने के लिये नित्यमनोहर नामक वैत्यालयमें आये ॥३५५॥ उन सभीने दूरसे ही अपनी अपनी सवारियोंसे उतरकर शान्तचित्त हो मन्दिर में प्रवेश किया और प्रदक्षिणाएँ देकर अर्थसे भरी हुई स्तुतियोंसे जिनेन्द्रदेवकी स्तुति की ॥३५६॥ १ सुलोचनासम्बन्धिनि । २ उपशान्ते । ३ 'मन्दारः पारिजातकः सन्तानः कल्पवृक्षश्च पुंसि वा हरिचन्दनम्' इति पञ्चसुरभूजेभ्यः । ४ स्वर्गात् । ५ गर्वाय । ६ तस्यैनम् ल०। एनम् जयकुमारम् । ७ पुनः किमिति चेत् । ८ जयकुमारेण । ६ अनुचितस्थानकृतयुद्धविजयात् समुपागता। १० गजयथाधिपम् । ११ बर्द्धः । १२ बदर । १३ रवि । १४ शव । १५ जीवन्तीति जीवन्तस्तेषाम् । १६ जीवनोपायमित्यर्थः । १७ अभिलक्षितैः । १८ इव । १६ सह । २० सहस्रः। २१ नित्यमनोहराख्यं चैत्यालयम् । २२ निजवाहनेभ्यः । २७ स्तुति चक्रुः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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