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________________ चतुश्चत्वारिंशत्तम पर्व ३६६ धारा वीररसस्येव रेजे रक्तस्य कस्यचित् । पतन्ती सततं धर्याद् प्राश्वनूत्पाटिताशुगम् ॥१३१॥ 'सायकोद्भिन्नमालोक्य कान्तस्य हृदयं प्रिया । परासुरासीन्चित्तेऽस्य वदन्तीवात्मनःस्थितिम् ॥१३२॥ छिन्नवण्डः फलैः कश्चित् 'सर्वाडागीणर्भटाग्रणीः। कीलिताशुरिचाकम्प्रतस्थैव घुयुधे चिरम् ॥१३३॥ विलोक्य विलयज्वालिज्वालालोलशिखोपमैः । शिलीमुखर्बलं "छिन्नं स्वं विपक्षधनुर्धरैः॥१३४॥ गृहीत्वा वज़काण्डाख्यं सज्जीकृत्य शरासनम् । स्वयं योद्ध समारब्धं सक्रोधः सानुजो जयः ॥१३॥ 'कर्णाभ्यर्णीकृतास्तस्य गुणयुक्ताः सुयोजिताः। पत्रलघुसमुत्थानाः कालक्षेपाविधायिनः ॥१३६॥ भार्गप्रगुणसञ्चाराः प्रविश्य हृदयं द्विषाम् । कृच्छार्थ साधयन्ति स्म निस्सृष्टार्थसमाः शराः॥१३७॥ पत्रवन्तःप्रतापोग्राः समप्रा विग्रहे दूताः। अज्ञातपोतिनश्चक्रुः कूटयुद्धं शिलीमुखाः ॥१३८॥ सामर्थ्यसे रहित शत्रुको वश कर लेते हैं उसी प्रकार वे बाण भी शत्रुको वश कर लेते थे॥१२९१३०॥ निकाले हुए बाणके पीछे बहुत शीघ्र धीरतासे निरन्तर पड़ती हुई किसी पुरुषके रुधिरकी धारा वीररसकी धाराके समान सुशोभित हो रही थी ॥१३१।। कोई स्त्री अपने पतिका हृदय बाणसे विदीर्ण हुआ देखकर प्राणरहित हो गई थी मानो वह कह रही थी कि मेरा निवास इसीके हृदय में है ॥१३२।। जिनके दण्ड टूट गये हैं और जो सब शरीरमें घुस गये हैं ऐसे बाणोंकी नोकोंसे जिसके प्राण मानो कीलित कर दिये गये हैं ऐसा कोई योद्धा पहलेकी तरह ही निश्चल हो बहुत देरतक लड़ता रहा था ॥१३३।। शत्रुओंके धनुषधारी योद्धाओंने प्रलयकालकी जलती हुई अग्निकी चंचल शिखाओंके समान तेजस्वी बाणोंके द्वारा मेरी सेनाको छिन्नभिन्न कर दिया है यह देख जयकुमारने अपने छोटे भाइयों सहित क्रोधित हो वज्रकाण्ड नामका धनुष लिया और उसे सजाकर स्वयं युद्ध करना प्रारम्भ किया ॥१३४-१३५॥ उस समय जयकुमारके वाण + निःसृष्टार्थ (उत्तम) दूतके समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार उत्तम दूत स्वामीके कानके पास रहते हैं अर्थात् कानसे लगकर बातचीत करते हैं उसी प्रकार बाण भी जयकुमारके कान पास रहते थे अर्थात् कानतक खींचकर छोड़े जाते थे, जिस प्रकार उत्तम दूत गुण अर्थात् रहस्य रक्षा आदिसे युक्त होते हैं उसी प्रकार बाण भी गुण अर्थात् डोरीसे युवत थे, जिस प्रकार उत्तम दूतकी योजना अच्छी तरह की जाती है उसी प्रकार बाणोंकी योजना भी अच्छी तरह की गई थी जिस प्रकार उत्तम दूत पत्र लेकर जल्दी उठ खड़े होते हैं उसी प्रकार बाण भी अपने पंखोंसे जल्दी जल्दी उठ रहे थे-जा रहे थे, जिस प्रकार उत्तम दूत व्यर्थ समय नहीं खोते हैं उसी प्रकार बाण भी व्यर्थ समय नहीं खोते थे, जिस प्रकार उत्तम दूत मार्ग में सीधे जाते हैं उसी प्रकार बाण भी मार्गमें सीधे जा रहे थे और जिस प्रकार उत्तम दूत शत्रुओं के हृदयमें प्रवेशकर कठिनसे कठिन कार्यको सिद्ध कर लेते हैं उसी प्रकार बाण भी शत्रुओंके हृदयमं घुसकर कठिनसं कठिन कार्य सिद्ध कर लंत थे ॥१३६-१३७॥ अथवा एसा जान १सायिकोद्भिन्न-ल०। २ सर्वाङगब्यापिभिः । ३ प्रलयाग्नि । ४ छन्नमित्यपि पाठः। छादितं खण्डितं वा। ५ आत्मीयम् । ६ आकर्णमाकृष्टाः । ७ कर्णसमीपे कृताश्च । ७ पक्षैः सन्देशपत्रैः । ८ आशुविधायिन इत्यर्थः । ६ हृदयम् अभिप्रायं च । १० असाध्यार्थम् । ११ असकृत् सम्पादितप्रयोजनदूतसमाः । १२ प्रकृष्टसन्तापभीकराः । भयङकराः । * राजाओंके छह गुण ये है--"सन्धिविग्रहयानानि संस्थाप्यासनमेव च । द्वैधीभावश्च विज्ञेयः षड्गुणा नीतिवे दिनम् ।" + जो दोनोंका अभिप्राय लेकर स्वयं उत्तरप्रत्युत्तर करता हुआ कार्य सिद्ध करता है उसे निःसष्टार्थ दूत कहते हैं। यह दूत उत्तम दूत कहलाता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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