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________________ त्रिचत्वारिंशत्तमं पर्व ३७६ स्वसौभाग्यवशात सर्वान् साऽप्यालोक्यातुषत्तराम् । श्लाघ्यं तद्योषितां पुंसां शौयं वा निजितद्विषाम् ॥ ततः कञ्चुकिनिर्वेशाद् बाला लीलाविलोकितः । आकृष्य हृदयं तेषां तत्सौधात् समवातरत् ॥२८॥ यस्य यत्र गता स्यादृक् सा तत्रैवेव कीलिता । 'तत्तेऽस्यामवरूढायां खिन्ना वा तदनीक्षकाः ॥२८६॥ किडकिणीकृतझकारारावरम्य रथं ततः। व्यूढं रूढ हयैः स्वर्णकर्णचामरशोभिभिः ॥२७॥ उत्पतग्निपतत्केतुबाहुं नीरूपरूपिणाम् । साक्षादपह्नवाह्वाने० कुर्वन्तमिव सन्ततम् ॥२८॥ पुनरध्यास्य हुज्जन्मविद्येव हृदयप्रिया । मुक्ताभूषाप्रभामध्ये शारदीव तडिल्लता ॥२८॥ वीज्यमाना विधुस्पद्धिहंसासामलचामरैः । जनानां दृष्टिदोषान् वा धुन्वद्भिर्दूरतो मुहुः ॥२६॥ अवधूतः पुरग्नङ्गः सम्प्रति स्वीकृतोऽनया । प्रयोजनवशात् प्राज्ञैः प्रास्तोऽपि५ परिगृह्यते ॥२६॥ अस्याग्रह इवानङ्गः सद्यः सर्वाङ्गसङ्गतः । विकारमकरोत् स्वैरं भूयो भ्रूनेत्रवक्त्रजम् ॥२६२॥ साङगो यद्येतयाऽद्य वम एकीभावं वजामि किम् । इत्यनङगोऽप्यनङगत्वं स्वं मन्ये "साध्वबुध्यत ॥२६॥ लक्ष्मीः सा सर्वभोग्याऽभूद रतिव्यंगेन' भुज्यते । जितानङगानिभानेषा न्यक्कृत्य २०जयमाप्स्यति ॥२६४॥ होनेपर किसे आनन्द नहीं होता है ? ॥२८३॥ वह सुलोचना भी अपने सौभाग्यके वशसे आये हुए समस्त राजाओंको देखकर अत्यन्त संतुष्ट हुई थी सो ठीक ही है क्योंकि जिस प्रकार शत्रुओंको जीतनेवाले पुरुषोंका शूरवीरपना प्रशंसनीय होता है उसी प्रकार स्त्रियोंका सौभाग्य भी प्रशंसनीय होता है ॥२८४॥ तदनन्तर वह सुलोचना लीलापूर्वक अवलोकनके द्वारा उन राजाओंका हृदय अपनी ओर आकर्षितकर कंचुकीके कहनेसे उस महलसे नीचे उतरी ॥२८५।। जिसकी दष्टि उसके शरीरपर जहां पड़ गई थी वह मानो वहीं कीलित सी हो गई थी तथा उसके नीचे उतर आनेपर वे राजा लोग उसे न देखकर बहत ही खेदखिन्न हए थे ॥२८६॥ तदनन्तर, जो कामदेवकी विद्याके समान सबके हृदयको प्रिय है, जो मोतियोंके आभूषणोंकी कान्तिके बीचमें शरदऋतुकी बिजलीकी लताके समान जान पड़ती है और जिसपर मानो मनुष्योंकी दृष्टिके दोषोंको दूरसे ही दूर करते हुए, तथा चन्द्रमाके साथ स्पर्धा करनेवाले और हंसोंके पंखोंके समान निर्मल चमर बार बार दुराये जा रहे हैं ऐसी वह सुलोचना, जो छोटी छोटी घंटियों के रुणझुण शब्दोंसे रमणीय है, कानोंके समीप लगे हुए सोनेके चमरोंसे शोभायमान बड़ेऊंचे घोड़े जिसमें जुते हुए हैं, नीचे ऊपरको उड़ती हुई ध्वजाएं ही जिसकी भुजाएं हैं और जो उन उड़ती हुई ध्वजाओंसे ऐसा जान पड़ता है मानो कुरूप मनुष्यका साक्षात् निरन्तर निराकरण ही कर रहा हो और सुरूप (सुन्दर) मनुष्योंको साक्षात् बुला रहा ही हो' ऐसे रथपर सवार हुई ॥२८७-२९०॥ सुलोचनाने कामदेवका पहले तो तिरस्कार किया था परन्तु अब उसे फिर स्वीकृत किया सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिमान् पुरुष हटाये हुएको भी अपने प्रयोजन के वश फिर स्वीकार कर लेते हैं ॥२९१॥ पिशाचके समान शीघ्र ही इसके सब अंगोंमें प्रविष्ट हुआ कामदेव अपनी इच्छानुसार बार बार भौह नेत्र और मुखमें उत्पन्न होनेवाले विकारोंको प्रकट कर रहा था ॥२९२॥ यदि मैं शरीर सहित होता तो क्या इस तरह इस सुलोचनाके साथ एकीभावको प्राप्त हो सकता ? अर्थात् इसके शरीरसें प्रवेश कर पाता? ऐसा विचार करता हुआ कामदेव मानो अपने शरीर रहितपनेको ही अच्छा समझता था ॥२९३॥ वह १ अवलोकनैः । २ अवतरन्ति स्म ३ यस्मिन्नवयवे। ४ ते तस्या-ल०। तत् कारणात् । ५ अवतरणं कुर्वन्त्यां सत्याम् । ६ तां कन्यकामीक्षमाणाः न बभूवुरित्यर्थः । ७ धृतम्। ८ प्रसिद्धैः । ६ रूपहीनानां रूपवताञ्च । १० क्रमेण निराकरण चाह्वानं च। ११ एवंविधं रथमध्यास्येति सम्बन्धः । १२ कामविद्या । १३ मरालपक्ष। १४ निराकृतः । १५ प्रतिक्षिप्तः । १६ सशरीरः। १७ शिष्टमिति । १८ अनङ्गन विकलाङ्गेनेति ध्वनिः। १६ निराकृत्य। २० विजयम् जयकुमारं च। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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