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________________ एकचत्वारिंशत्तम पर्व ३२६ स निमित्तं निमित्तानां तन्त्र मन्त्रे सशाकुने । दैवज्ञाने परं देवमित्यभूसंपतोऽधिकम् ॥१४८॥ तत्सम्भूतौ समुद्भूतम् अभूत् पुरुषलक्षणम् । उदाहरणमन्यत्र लक्षितं येन तत्तनोः ॥१४६॥ अन्येष्वपि कलाशास्त्र साहेषु कृतागमाः । तमेवादर्श मालोक्य संशयांशाद् व्यरंसिषुः ॥१५०॥ 'नास्य सहजा प्रज्ञा पूर्वजन्मानुषडगिणी। तेनषा विश्वविद्यासु जाता परिणतिः परा ॥१५॥ इत्थं सर्वेषु शास्त्रष कलासु सकलास च । लोके स सम्मति प्राप्य तद्विद्यानां मतोऽभवत् ॥१५२॥ किमत्र बहनोक्तेन प्रज्ञापारमितो मनः। कृत्स्नस्य लोकवृत्तस्य स भेजे सूत्रधारताम् ॥१५३॥ राजसिद्धान्ततत्वज्ञो" धर्मशास्त्रार्थतत्त्ववित् । परिख्यातः कलाज्ञाने सोऽभून्मूनि सुमेधसाम् ॥१५४॥ इत्यादिराजं तत्सम्राड् अहो राजर्षिनायकम् । तत्सार्वभौममित्यस्य दिशासूच्छलितं यशः ॥१५॥ मालिनी इति सकलकलानामे कमोकः५ स चक्री कृतमतिभिरजर्य६ सङगतं संविधित्सन् । बुधसदसि सदस्यान बोधयन् विश्वविद्या व्यवणुता बुधचक्रीत्युच्छलत्कीतिकेतुः ॥१५६॥ की सृष्टि है इसलिये उक्त तीनों शास्त्र उन्हींके मत हैं ऐसा समझना चाहिये ।।१४७।। वे निमित शास्त्रों के निमित्त हैं, और तन्त्र, मन्त्र, शकुन तथा ज्योतिष शास्त्रमें उत्तम अधिष्ठाता देव हैं इस प्रकार सब लोगोंमें अधिक मान्यताको प्राप्त हुए थे ॥१४८।। महाराज भरतके उत्पन्न होनेपर पुरुषके सब लक्षण उत्पन्न हुए थे इसलिये दूसरी जगह उनके शरीरके उदाहरण ही देखे जाते थे ॥१४९॥ शास्त्रोंके जाननेवाले पुरुष ऊपर कहे हुए शास्त्रोंके सिवाय अन्य कलाशास्त्रोंके संग्रहमें भी भरतको ही दर्पणके समान देखकर संशयके अंशोंसे विरत होते थे अर्थात अपने अपने संशय दूर करते थे ॥१५०॥ चूंकि उनकी स्वाभाविक बुद्धि पूर्वजन्मसे संपर्क रखमेवाली थी इसलिये ही उनकी समस्त विद्याओंमें उत्तम प्रगति हुई थी ॥१५१॥ इस प्रकार समस्त शास्त्र और समस्त कलाओंमें प्रतिष्ठा पाकर वे भरत उन विद्याओंके जाननेवालोंमें मान्य हुए थे ॥१५२॥ इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ है ? इतना कहना ही पर्याप्त है कि बद्धि के पारगामी कुलकर भरत समस्त लोकाचारके सूत्रधार हो रहे थे ॥१५३।। वे राजशास्त्रके तत्त्वोंको जानते थे, धर्मशास्त्रके तत्त्वोंके जानकार थे, और कलाओंके ज्ञानमें प्रसिद्ध थे। इस प्रकार उत्तम विद्वानोंके मस्तकपर सुशोभित हो रहे थे अर्थात् सबमें श्रेष्ठ थे ॥१५४।। अहो, इनका प्रथम राज्य कैसा आश्चर्य करने वाला है, यह सम्राट् हैं, राजर्षियों इनका सार्वभौम पद भी आश्चर्यजनक है इस प्रकार उनका यश समस्त दिशाओंमें उछल रहा था ।।१५५।।इस प्रकार जो समस्त कलाओंका एकमात्र स्थान है, जो बुद्धिमान् पुरुषोंके साथ अविनाशी मित्रता करना चाहता है और 'यह विद्वानोंमें चक्रवर्ती है अथवा विद्वान् चक्रवर्ती है' इस प्रकार जिसकी कीर्तिरूपी पताका फहरा रही है ऐसा वह चक्रवर्ती भरत विद्वानोंकी सभामें समस्त विद्याओंका उपदेश देता हुआ समस्त विद्याओंका व्याख्यान १ कारणम्। २ निमित्तशास्त्राणाम् । ३ ज्योतिःशास्त्रे। ४ स मतोऽधिकम् इ० । स गतोऽधिकम् ल०, म०। ५ . सम्पूर्णशास्त्रम् । ६ मुकुरम् । ७ विरमन्ति स्म । ८ कारणेन । ६ अनुसम्बन्धिनी। १० नृपविद्यास्वरूपज्ञः । ११ आदिराजस्य प्रथा। १२ राजर्षिनायकस्य प्रथा । १३ सर्वभूमीशस्य प्रकाश । १४ मुख्यः । १५ गृहः । १६ अविनाशी। १७ सदसि योग्यान् । १८ विवरणमकरोत् । १६ विद्वज्जन । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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