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________________ ३२८ महापुराणम् तेन षाडगण्यमभ्यस्तम अपरिज्ञानहानये । शासतोऽस्याविपक्षां मां कृतं सन्ध्यादिचर्चया॥१३॥ 'राजविद्याश्चतस्रोऽभूः कदाचिच्च कृतक्षणः । व्याचख्यौ राजपुत्रेभ्यः ख्यातये स विचक्षणः ॥१३॥ कदाचिनिधिरत्नानाम् अकरोत्स निरीक्षणम् । भाण्डागारपदे तानि तस्य तन्त्र पदेऽपि च ॥१४०॥ कदाचिद्धर्मशास्त्रेषयाः स्युनिप्रतिपत्तयः । निराकार ताः कृत्स्नाः ख्यापयन् विश्वविन्नतम्॥१४१॥ प्राप्तोपशेष तत्त्वेषु कश्चित् संजातसंशयान् । ततोऽपाकृत्य संशीतेस्तत्तत्त्वं निरणीनयत् ॥१४२॥ तथाऽसावर्थशास्त्रार्थ कामनीतौ च पुष्कलम् । प्रावीण्यं प्रथयामास ययात्र न परः कृती५ ॥१४३॥ "हस्तितन्त्रेऽश्वतन्त्रे च दृष्ट्वा स्वातन्त्र्यमीशितुः । मूलतन्त्रस्य कर्ताऽयमित्यास्था१८ तद्विदामभूत् ॥ १ प्रायुर्वेदे स दीर्वाधुरापुर्वेदो न मूर्तिमान । इति लोको निरारेकर० श्लाघते स्म निधीशिनम् ॥१४॥ सोऽधीतीपदविद्यायां स कृती वागलडाकृतौ । स छन्दसांप्रतिच्छन्द" इत्यासीत् सम्मतः सताम्॥१४६।। "तदुपर्श निमित्तानि शाकुनं तदुपक्रमम् । तत्सर्गो" ज्योतिषां ज्ञानं तन्मतं तेन तत्त्रयम् ॥१४७॥ समस्त पृथिवी जीत ली है और जो इस भरतक्षेत्रमें स्वतन्त्र हैं ऐसे उन भरतको अपने तथा परराष्ट्रकी कुछ भी चिन्ता नहीं थी, यदि चिन्ता थी तो केवल तन्त्र अर्थात् स्वराष्ट्र की ही चिन्ता थी ॥१३७॥ उन्होंने अपना अज्ञान नष्ट करनेके लिये ही छह गुणोंका अभ्यास किया था क्योंकि जब वे शत्रुरहित पृथिवीका पालन करते थे तब उन्हें सन्धि विग्रह आदिकी चर्चासे क्या प्रयोजन था ।।१३८॥ अतिशय विद्वान् महाराज भरत केवल प्रसिद्धिके लिये ही कभी कभी बड़े उत्साहके साथ राजपुत्रों के लिये आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति इन चार राजविद्याओंका व्याख्यान करते थे ।।१३९।। वे कभी कभी निधियों और रत्नोंका भी निरीक्षण करते थे। क्योंकि निधियों और रत्नों में से कुछ तो उनके भाण्डारमें थे और कुछ उनकी सेनामें थे ॥१४०॥ कभी कभी वे सर्वज्ञदेवका मत प्रकट करते हुए धर्मशास्त्रमें जो कुछ विवाद थे उन सबका निराकरण करते थे ॥१४१॥ भगवान् अरहन्तदेवके कहे हुए तत्त्वोंमें जिन किन्हीं को संदेह उत्पन्न होता था उन्हें वे उस संदेहसे हटाकर तत्त्वोंका यथार्थ निर्णय कराते थे ॥१४२।। इसी प्रकार वे अर्थशास्त्रके अर्थ में और कामशास्त्रमें अपना पूर्ण चातुर्य इस तरह प्रकट करते थे कि फिर इस संसारमें उनके समान दूसरा चतुर नहीं रह जाता था ॥१४३।। हस्तितन्त्र और अश्वतन्त्रमें महाराज भरतकी स्वतन्त्रता देखकर उन शास्त्रोंके जाननेवाले लोगोंको यही विश्वास हो जाता था कि इन सबके मूल शास्त्रोंके कर्ता यही हैं ॥१४४॥ आयुर्वेद के विषय में तो सब लोग निधियों के स्वामी भरतकी बिना किसी शंकाके यही प्रशंसा करते थे कि यह दीर्घायु क्या मूर्तिमान् आयुर्वेद ही है अर्थात् आयुर्वेदने ही क्या भरतका शरीर धारण किया है ॥१४५।। इसी प्रकार सज्जन लोग यह भी मानते थे कि वे व्याकरण-विद्यामें कुशल हैं, शब्दालंकारमें निपुण हैं, और छन्दशास्त्रके प्रतिविम्ब हैं ॥१४६॥ निमित्तशास्त्र सबसे पहले उन्हीं के बनाये हुए हैं, शकुनशास्त्र उन्हींके कहे हुए हैं और ज्योतिष शास्त्रका ज्ञान उन्हीं १ चक्रिणा। २ पर्याप्तम् । अलमित्यर्थः । ३ सन्धिविग्रहभावादिविचारेग । ४ आन्वीक्षिकीत्रयी वार्ता दण्डनीतिश्चतस्रो राजविद्याः । ५ कृतोत्साहः । ६ वदति स्म । ७ सैन्यस्थाने परिग्रहे बभूवुरित्यर्थः । ८ विसंवादाः । ६ निराकृतवान् । १० प्रकटीकुर्वन् । ११ सर्वज्ञमतम् । १२ संशयात्। १३ निर्णयमकारयत् । १४ नीतिशास्त्रार्थे। १५ कुशलः । १६ गजशास्त्रे। १७ मूलशास्त्रस्य । १८ इति बुद्धिः । १६ वैद्यशास्त्रे। २० निःशङ्कम् । २१ व्याकरणशास्त्रमधीतवान् । २२ कुशलः । २३ शब्दालङ्कारे । २४ प्रतिनिधिः । २५ तदुपज्ञनिमित्तानि ल०, म । तेन प्रथमोक्तम् । २६ शकुनशास्त्रम् । २७ तेन प्रथममुपक्रान्तम्। २८ तस्य भरतस्य सृष्टिः । २६ ज्योतिषशास्त्रम् । ३० तेन कारणेन । ३१ निमित्तादित्रयम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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