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________________ ३१६ महापुराणम् ततो विधिमम सम्यग अवगम्य कृतागमैः । विधानेन प्रयोक्तव्याः क्रियामन्त्रपुरस्कृताः॥२२०॥ वसन्ततिलकावृत्तम् इत्थं स धर्मविजयी भरताधिराजो धर्मक्रियासु 'कृतधी पलोकसाक्षि । तान् सुव्रतान् द्विजवरान् विनियम्य सम्यक् धर्मप्रियः समसृजत् द्विजलोकसर्गम् ॥२२१॥ मालिनी इति भरतनरेन्द्रात् प्राप्तसत्कारयोगा वितपरिचयचारूदारवृत्ताः श्रुताढयाः । जिनवृषभमतानु"वज्यया पूज्यमानाः जगति बहुमतास्ते ब्राह्मणाः ख्यातिमीय :॥२२२॥ वृत्तस्थानथ तान् विधाय सभवानियाकुचूडामणिः" जैने वर्त्मनि सुस्थितान् द्विजवरान् सम्मानयन् प्रत्यहम् । स्वं मेने कृतिनं मुदा परिगतां स्वां सृष्टिमुच्चः कृतां पश्यन् कः सुकृती कृतार्थपदवी नात्मानमारोपयेत् ॥२२३॥ इत्या भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसडाग्रहे द्विजोत्पत्ती क्रियामन्त्रानुवर्णनं नाम चत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४०॥ सेनापतिके बिना कुछ भी नहीं कर सकते उसी प्रकार मंत्रोंसे रहित क्रियाएं भी प्रयोग करनेवाले पुरुषोंकी कुछ भी सिद्धि नहीं कर सकतीं ॥२१९।। इसलिये शास्त्रोंका अभ्यास करने वाले द्विजोंको यह सब विधि अच्छी तरह जानकर मन्त्रोच्चारणके साथ साथ सब क्रियाएं विधिपूर्वक करनी चाहिये ।।२२०। इस प्रकार जिसने धर्मके द्वारा विजय प्राप्त की है, जो धार्मिक क्रियाओंमें निपुण है और जिसे धर्म प्रिय है ऐसे भरतक्षेत्रके अधिपति महाराज भरतने राजा लोगोंकी साक्षीपूर्वक अच्छे अच्छे व्रत धारण करनेवाले उन उत्तम द्विजोंको अच्छी शिक्षा देकर ब्राह्मणवर्णकी सृष्टि की अर्थात् ब्राह्मणवर्णकी स्थापना की ॥२२१॥ इस प्रकार महाराज भरतसे जिन्हें सत्कारका योग प्राप्त हुआ है, व्रतोंके परिचयसे जिनका चारित्र सुन्दर और उदार हो गया है, जो शास्त्रोंके अर्थोको जाननेवाले हैं और श्रीवृषभ जिनेन्द्रके मतानुसार धारण की हुई दीक्षासे जो पूजित हो रहे हैं ऐसे वे ब्राह्मण संसारमें बहुत ही प्रसिद्धिको प्राप्त हुए और खूब ही उनका आदर-सन्मान किया गया ।।२२२॥ तदनन्तर इक्ष्वाकुकुलचूड़ामणि महाराज भरत जैनमार्गमें अच्छी तरह स्थित रहनेवाले उन ब्राह्मणोंको सदाचारमें स्थिर कर प्रतिदिन उनका सन्मान करते हुए अपने आपको धन्य मानने लगे सो ठीक ही है क्योंकि आनन्दसे युक्त तथा उत्कृष्टताको प्राप्त हुई अपनी सृष्टिको देखता हुआ ऐसा कौन पुण्यवान् पुरुष है जो अपने आपको कृतकृत्य न माने ।।२२३॥ इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके भाषानुवादमें द्विजोंकी उत्पत्तिमें क्रियामन्त्रोंका वर्णन करनेवाला यह चालीसवां पर्व समाप्त हुआ। १ सम्पूर्णशास्त्रैः । २ सम्पूर्णबुद्धिः। ३ वताभ्यास। ४ श्रुतार्थाः द०, ल०। ५ मतानुगमनेन। ६ चारित्रपदं गतान् । ७ पूज्यः । ८ सन्तोषेण सह । ६ समन्वितामित्यर्थः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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