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________________ ३०८ महापुराणम् चूणिः-दियसिंहासनभागी भव, विजयसिंहासनभागी भव, परमसिंहासनभागी (भव इति निषद्यामन्त्रः)। अन्नप्राशनक्रिया'प्राशनेऽपि तथा मन्त्रं पदैस्त्रिभिरुदाहरेत् । तानि स्युदिव्यविजयाक्षीणामृतपदानि वै ॥१४॥ भागी भव पदेनान्ते युक्तेनान गतानि तु । पदैरेभिरयं मन्त्रः प्रयोज्यः प्राशने बुधैः ॥१४२॥ __चूणिः--दिव्यामृतभागी भव, विजयामृतभागी भव, अक्षीणामतभागी भव । व्यष्टि:घुष्टिक्रियाश्रितं मन्त्रम इतो वक्ष्य यथाश्रुतम् । तत्रोपनयनं जन्मवर्षवर्द्धनवाग्युतम् ॥१४३॥ भागी भव पदं ज्ञेयम् प्रादौ शेषपदाष्टके । वैवाहनिष्ठशब्देन मनिजन्मपदेन च ॥१४४॥ सुरेन्द्रजन्मना मन्दराभिषेकपदेन च । यौवराज्यमहाराज्यपदाभ्यामप्यनुक्रमात् ॥१४॥ परमार्हन्त्यराज्याभ्यां वर्षवर्धनसंयुतम् । भागी भव पदं योज्यं ततो मन्त्रोऽयमुद्भवेत् ॥१४६॥ चूणिः-उपनयनजन्मवर्षवर्द्धनभागी भव, ववाहनिष्ठवर्षवर्द्धनभागी भव, मुनीन्द्रजन्मवर्षवर्द्धनभागी भव, सुरेन्द्रजन्मवर्षवर्द्धनभागी भव, मन्दराभिषेकवर्षवर्धनभागी भव, यौवराज्यवर्षवर्द्धनभागी भव, महराज्यवर्षवर्द्धनभागी भव, परमराज्यवर्षवर्द्धनभागी भव, प्रार्हन्त्यराज्यवर्षवर्धनभागी भव, (व्यु ष्टिक्रियामन्त्रः) आसनपर बैठनेवाला हो), 'विजयसिंहासनभागी भव' (चक्रवर्तीके विजयोल्लसित सिहासन पर बैठनेवाला हो) और 'परमसिंहासनभागी भव' (तीर्थ करके उत्कृष्ट सिंहासनपर बैटने वाला हो) ये तीन मन्त्र कहना चाहिये । ॥१४०॥ संग्रह-'दिव्यसिंहासनभागी भव, विजयसिंहासनभागी भव, परमसिंहासनभागी भव' । अब अन्नप्राशन क्रियाके मन्त्र कहते हैं-अन्नप्राशन क्रियाके समय तीन पदोंके द्वारा मन्त्र कहने चाहिये और वे पद दिव्यामृत, विजयामृत और अक्षीणामृत इनके अन्तमें भागी भव ये योग्य पद लगाकर बनाने चाहिये । विद्वानोंको अन्नप्राशन क्रिया में इन पदोंके द्वारा मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये। भावार्थ-इस क्रियामें निम्नलिखित मन्त्र पढ़ने चाहिये-'दिव्यामृतभागी भव' (दिव्य अमृतका भोग करने वाला हो), 'विजयामृतभागी भव' (विजयरूप अमृतका उपभोक्ता हो) और 'अक्षीणामृतभागी भव' (अक्षीण अमृतका भोक्ता हो) ॥१४१-१४२॥ संग्रहः-'दिव्यामृतभागी भव, विजयामृतभागी भव, अक्षीणामृतभागी भव'। अब यहाँसे आगे शास्त्रानुसार व्युष्टि क्रियाके मंत्र कहते हैं-सबसे पहले 'उपनयन' के आगे 'जन्मवर्षवर्द्धन' पद लगाकर 'भागी भव' पद लगाना चाहिये और फिर अनुक्रमसे वैवाहनिष्ठ, मुनीन्द्रजन्म, सुरेन्द्रजन्म, मन्दराभिषेक, यौवराज्य, महाराज्य, परमराज्य और आर्हन्त्यराज्य इन शेष आठ पदोंके साथ 'वर्षवर्द्धन' पद लगाकर 'भागी भव' यह पद लगाना चाहिये। ऐसा करनेसे व्यष्टिक्रियाके सब मन्त्र बन जावेंगे। भावार्थ-व्यष्टिक्रिया में निम्नलिखित मंत्रोंका प्रयोग करना चाहिये-'उपनयनजन्मवर्षवर्धनभागी भव' (यज्ञोपवीतरूप जन्मके वर्षका बढ़ानेवाला हो), 'वैवाहिनिष्ठवर्षवर्धनभागी भव' (विवाह क्रियाके वर्षका वर्धक हो), 'मुनीन्द्रजन्मवर्षवर्धनभागी भव' (मुनि पद धारण करनेवाले वर्षकी वृद्धिसे युक्त हो), 'सुरेन्द्रजन्मवर्षवर्धनभागी भव' (इन्द्र जन्मके वर्षका बढ़ानेवाला हो), 'मन्दराभिषेकवर्षवर्धनभागी भव' (सुमेरु पर्वतपर होनेवाले अभिषेककी वर्ष वृद्धि करनेवाला हो), यौवराज्यवर्षवर्धनभागी भव' (युवराज पदकी वर्ष वृद्धि करनेवाला हो), 'महाराज्यवर्षवर्धनभागी भव' (महाराज पदकी वर्षवृद्धिका उपभोक्ता हो) 'परमराज्यवर्षवर्धनभागी भव' (चक्रवर्तीके उत्कृष्ट राज्य १ अन्नप्राशने । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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