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________________ २६६ महापुराणम् सैन्ये च कृतसन्नाहे शनैः समनुगच्छति । मरुद्धृतध्वजवातनिरुद्धपवनाध्वनि ॥२६॥ ध्वनत्सु सु रतूर्येषु नृत्यत्यम्सरसा गणे। गायन्तीषु कलक्वाणं किन्नरीषु च मङगलम् ॥२६॥ भगवानभिनिष्क्रान्तः पुण्य' कस्मिंश्चिदाश्रमे । स्थितः शिलातले स्वस्मिश्चेतसीवातिविस्तुते ॥२६२॥ निर्वाणदीक्षयात्मानं योजयन्नद्धतोदयः । सुराधिपः कृतानन्दचितः परयेज्यया ॥२६३॥ योऽत्र शेषो प्रविधियुक्तः केशपूजादिलक्षणः। प्रागेव स तु निर्णीतो निष्क्रान्तौ वृषभेशिनः ॥२६४॥ इति निष्क्रान्तिः । (परिनिष्क्रान्तिरेषा स्यात् क्रिया निर्वाणदायिनी । अतः परं भवेदस्य मुमुक्षोर्योगसम्महः ॥२६॥ यदायं त्यक्तबाह्यान्तस्सङगो "निःसङगमाचरेत् । "सदुश्चरं तपोयोगं जिनकल्पमनुत्तरम् ॥२६६।। तदाऽस्य क्षपकश्रेणीम् आरुढस्योचिते पदे । शुक्लध्यानाग्निनिर्दग्धघातिकर्मघनाटवेः ॥२६॥ प्रादुर्भवति निःशेषबहिरन्तर्मलक्षयात् । केवलाख्यं परं ज्योतिर्लोकालोकप्रकाशकम् ॥२६८॥.. तदेतत्सिद्धसाध्यस्य प्रापुषः परमं महः। योगसम्मह इत्याख्याम् अनुधत्ते क्रियान्तरम् ॥२६६) ज्ञानध्यानसमायोगो योगो यस्तत्कृतो महः । महिमातिशयः सोऽयम् प्राम्नातो योगसम्महः ॥३०॥ इति योगसम्महः । ततोऽस्य केवलोत्पत्तौ पूजितस्यामरेश्वरैः। बहिविभूतिरुद्भूता प्रातिहार्यादिलक्षणा ॥३०१॥ कर लिया है ऐसी सेना अपनी विशेष रचना बनाकर जिस समय धीरे धीरे उनके पीछे चलने लगती है तथा जिस समय देवोंके तुरही आदि बाजे बजते हैं, अप्सराओंका समूह नृत्य करता है और किन्नरी देवियां मनोहर शब्दोंसे मंगलगीत गाती हैं, उस समय वे भगवान् किसी पवित्र आश्रममें अपने चित्तके समान विस्तृत शिलातलपर विराजमान होकर दीक्षा लेते हैं। इस प्रकार जिनका उदय आश्चर्य करनेवाला है और जो निर्वाणदीक्षाके द्वारा अपने आपको युक्त कर रहे हैं ऐसे भगवान्की इन्द्र लोग उत्कृष्ट सामग्रीके द्वारा आनन्दके साथ पूजा करते हैं ॥२८७-२९३॥ इस क्रियामें केश लोंच करना, भगवान की पूजा करना आदि जो भी कार्य अवशिष्ट रह गया है उस सबका भगवान् वृषभदेवकी दीक्षाके समय वर्णन किया जा चुका है।।२९४।। इस प्रकार यह अड़तालीसवीं निष्क्रान्ति क्रिया है ।। यह निर्वाणको देनेवाली परिनिष्क्रान्ति नाम की क्रिया है । अब इसके आगे मोक्षकी इच्छा करनेवाले उन भगवान्के योगसंमह नामकी क्रिया होती है ॥२९५।। जब वे भगवान् बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रहको छोड़कर निष्परिग्रह अवस्थाको प्राप्त होते हैं और अत्यन्त कठिन तथा सर्वश्रेष्ठ जिनकल्प नामके तपोयोगको धारण करते हैं तब क्षपक श्रेणीपर आरूढ़ हुए और योग्य पद अर्थात गुणस्थानमें जाकर शुक्लध्यानरूपी अग्निसे घातियाकर्मरूपी सघन वनको जला देनेवाले उन भगवान्के समस्त बाह्य और अन्तरङ्ग मलके नष्ट हो जानेसे लोक तथा अलोकको प्रकाशित करनेवाली केवलज्ञान नामकी उत्कृष्ट ज्योति प्रकट होती है ॥२९६२९८॥ इस प्रकार जिनके समस्त कार्य सिद्ध हो चुके हैं और जिन्हें उत्कृष्ट तेज प्राप्त हुआ है नके यह एक भिन्न क्रिया होती है जो कि 'योगसम्मह' इस नामको धारण करती है ॥२९९॥ ज्ञान और ध्यानके संयोगको योग कहते हैं और उस योगसे जो अतिशय तेज उत्पन्न होता है वह योगसम्मह कहलाता है ।।३००। यह योगसम्मह नामकी उनंचासवी क्रिया है । तदनन्तर केवलज्ञान उत्पन्न होनेपर इन्द्रोंने जिनकी पूजा की है ऐसे उन भगवान्के ५ मुदुर्धरं १ पवित्रे। २ प्रदेशे। ३ विधिर्मुक्त-द०, ल०। ४ नैःसङग्य-द०, ल०,प० । प०,ल०, द०। ६ गुणस्थाने । ७ गतवतः । प्राप्तुषः द० । प्रायुषः ल० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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