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________________ २६० महापुराणम् 'विश्वेश्वरा जगन्माता महादेवी महासती । पूज्या सुमङगला चेति धत्ते रूढि जिनाम्बिका ॥२२५॥ कुलाद्रिनिलया देव्यः श्रीह्रोधो धृतिकीर्तयः । समं लक्ष्म्या षडेताश्च सम्मता जिनमातृकाः ॥२२६॥ जन्मानन्तरमायातैः सुरेन्द्रेर्मेरुमूर्द्धनि । योऽभिषेकविधिः क्षीरपयोधेः शुचिभिर्जलैः ॥ २२७॥ मन्दरेन्द्राभिषेकोऽसौ क्रियाऽस्य परमेष्ठिनः । सा पुनः सुप्रतीतत्वात् भूयो नेह प्रतन्यते ॥ २२८ ॥ इति मन्दरेन्द्राभिषेकः । ततो विद्योपदेशोऽस्य स्वतन्त्रस्य स्वयम्भुवः । शिष्यभावव्यतिक्रान्तिः गुरुपूजोपलम्भनम् ॥२२६॥ तदेन्द्राः पूजयन्त्य ेनं त्रातारं त्रिजगद्गुरुम् । श्रशिक्षितोऽपि देवत्व सम्मतोऽसीति विस्मिताः ॥ २३०॥ इति गुरुपूजनम् । ततः कुमारकालेऽस्य यौवराज्योपलम्भनम् । पट्टबन्धोऽभिषे कश्च तदास्य स्यान्महौजसः ॥२३१॥ इति यौवराज्यम् । स्वराज्यमधि राज्येऽभिषिक्तस्यास्य क्षितीश्वरः । शासतः सार्णवामेनां क्षितिमप्रतिशासनाम् ॥ २३२ ॥ इति स्वराज्यम् । चक्रलाभो भवेदस्य निधिरत्नसमुद्भवे । निजप्रकृतिभिः पूजा साभिषेकाऽधिराडिति ॥२३३॥ इति चक्रलाभः अर्थात् सुवर्णकी वर्षासे जन्मकी उत्कृष्टता सूचित होनेके कारण हिरण्योत्कृष्ट जन्म इस सार्थक नामको धारण करनेवाली क्रियाको धारण करते हैं ||२२४ || यह उनतालीसवीं हिरण्योत्कृष्ट जन्मता क्रिया है । उस समय वह भगवान्‌की माता विश्वेश्वरी, जगन्माता, महादेवी, महासती, पूज्या और सुमंगला इत्यादि नामोंको धारण करती है ।। २२५ ॥ कुलाचलोंपर रहनेवाली श्री, ही, बुद्धि, धृति, कीर्ति और लक्ष्मी ये छह देवियां जिनमातृका अर्थात् जिनमाताकी सेवा करनेवाली कहलाती हैं ॥ २२६ ॥ जन्मके अनन्तर आये हुए इन्द्रोंके द्वारा मेरु पर्वतके मस्तक पर क्षीरसागर के पवित्र जलसे भगवान् का जो अभिषेक किया जाता है वह उन परमेष्ठीकी मन्दराभिषेक क्रिया है । वह क्रिया अत्यन्त प्रसिद्ध है इसलिये यहां उसका फिरसे विस्तार नहीं किया जाता है ॥२२७ - २२८ ॥ यह चालीसवीं मन्दराभिषेक क्रिया है । तदनन्तर स्वतंत्र और स्वयंभू रहने वाले भगवान्‌के विद्याओंको उपदेश होता है वे शिष्यभावके बिना ही गुरुकी पूजाको प्राप्त होते हैं अर्थात् किसीके शिष्य हुए बिना ही सबके गुरु कहलाने लगते हैं ॥ २२९ ॥ | उस समय इन्द्र लोग आकर हे देव, आप अशिक्षित होनेपर भी सबको मान्य हैं इस प्रकार आश्चर्यको प्राप्त होते हुए सबकी रक्षा करनेवाले और तीनों जगत् के गुरु भगवान् की पूजा करते हैं ॥ २३०॥ यह इकतालीसवीं गुरुपूजन क्रिया है । तदनन्तर कुमारकाल आनेपर उन्हें युवराजपदकी प्राप्ति होती है, उस समय महाप्रतापवान् उन भगवान् के राज्यपट्ट बांधा जाता है और अभिषेक किया जाता है ॥२३१॥ यह बियालीसवीं यौवराज्य क्रिया है । तत्पश्चात् समस्त राजाओंने राजाधिराज ( सम्राट् ) के पदपर जिनका अभिषेक किया है और जो दूसरे के शासनसे रहित इस समुद्र पर्यन्तकी पृथिवीका शासन करते हैं ऐसे उन भगवान् के स्वराज्यकी प्राप्ति होती है ॥२३२॥ | यह तैतालीसवीं स्वराज्य क्रिया है । इसके बाद निधियों और रत्नोंकी प्राप्ति होनेपर उन्हें चक्रकी प्राप्ति होती है उस समय १ विश्वेश्वरी ल० । २ शिष्यत्वाभावः । ३ गुरुपूजाप्राप्तिः । स्वस्य स्वयमेव गुरुरिति भावः । ४ पूजयन्त्येतं ल०, द० । ५ रक्षतः । ६ आत्मीयप्रजापरिवारैः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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