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________________ २५६ महापुराणम् योगो ध्यानं तदर्थों यो यत्नः संवेगपूर्वकः । तमाहुर्योगनिर्वाणसम्प्राप्तं परमं तपः ॥१७॥ कृत्वा परिकरं योग्यं तनुशोधनपूर्वकम् । शरीरं कर्शयेद्दोषः समं रागादिभिस्तदा ॥१८॥ तदेतद्योगनिर्वाणं संन्यासे पूर्वभावना' । जीविताशां मृतीच्छां च हित्वा भव्यात्मलब्धये ॥१८॥ रागद्वेषौ समुत्सृज्य श्रेयोऽवाप्तौ च संशयम् । अनात्मीयेषु चात्मीयसडकल्पाद विरमेत्तदा ॥१८२॥ माहं देहो मनो नास्मि न वाणी न च कारणम् । 'तत्त्रयस्यत्यनुद्विग्नो भजेदन्यत्वभावनाम् ॥१८॥ अहमेको न मे कश्चिन्नवाहमपि कस्यचित् । इत्यदीनमनाः सम्यगेकत्वमपि भावयेत् ॥१८४॥ यतिमाधाय लोकाग्रे नित्यानन्तसुखास्पदे । भावयेद् योगनिर्वाणं स योगी योगसिद्धये ॥१८॥ इति निवार्णसम्प्राप्तिः । ततो निःशेषमाहारं शरीरं च समत्सुजन् । योगीन्द्रो योगनिर्वाणसाधनायोधतो भवेत् ॥१८६॥ उत्तमार्थे'कृतास्थानः सन्यस्ततनुरुद्धधीः । ध्यायन् मनोवचः कायान बहिर्भतान स्वकान स्वतः ॥१८७॥ प्रणिधाय' मनोवृत्ति पदेषु परमेष्ठिनाम् । जीवितान्ते स्वसाकुर्याद् योगनिर्वाणसाधनम् ॥१८८॥ योगः समाधिनिर्वाणं तत्कृता चित्तनिर्वृतिः । तेनेष्टं साधनं यत्तद् योगनिर्वाणसाधनम् ॥१८६॥ इति योगनिर्वाणसाधनम् । पुरुष योगनिर्वाण क्रियाको प्राप्त हो ॥१७८।। योग नाम ध्यानका है उसके लिये जो संवेगपूर्वक प्रयत्न किया जाता है उस परम तपको योगनिर्वाण संप्राप्ति कहते हैं ॥१७९।। प्रथम ही शरीरको शद्ध कर सल्लेखनाके योग्य आचरण करना चाहिये और फिर रागादि दोषोंके साथ शरीरको कृश करना चाहिये ।।१८०।। जीवित रहने आशा और मरनेकी इच्छा छोड़कर 'यह भव्य है' इस प्रकारका सुयश प्राप्त करनेके लिये संन्यास धारण करनेके पहले भावना की जाती है वह योगनिर्वाण कहलाता है ॥१८१॥ उस समय रागद्वेष छोड़कर कल्याणकी प्राप्ति में प्रयत्न करना चाहिये और जो पदार्थ आत्माके नहीं हैं उनमें 'यह मेरे है। इस संकल्पका त्याग कर देना चाहिये ॥१८२।। न मैं शरीर ह, न मन ह, न वाणी है और न इन तीनोंका कारण ही हैं । इस प्रकार तीनोंके विषयमें उद्विग्न न होकर अन्यत्व भावनाका चिन्तवन करना चाहिये ॥१८३॥ इस संसारमें मैं अकेला हं न मेरा कोई है और न मैं भी किसीका है, इस प्रकार उदार चित्त होकर एकत्वभावनाका अच्छी तरह चिन्तवन करना चाहिये ॥१८४॥ जो नित्य और अनन्त सुख का स्थान है ऐसे लोकके अग्रभाग अर्थात मोक्षस्थानमें बुद्धि लगाकर उस योगीको योग (ध्यान) की सिद्धिके लिये योग निर्वाण क्रियाकी भावना करनी चाहिये । भावार्थसल्लेखनामें बैठे हुए साधुको संसारके अन्य पदार्थोंका चिन्तवन न कर एक मोक्षका ही चिन्तवन करना चाहिये ॥१८५॥ यह इकतीसवीं योगनिर्वाणसंप्राप्ति किया है। तदनन्तर-समस्त आहार और शरीरको छोड़ता हुआ वह योगिराज योगनिर्वाण साधनके लिये उद्यत हो ॥१८६॥ जिसने उत्तम अर्थात् मोक्षपदार्थमें आदर बुद्धि की है, शरीरसे ममत्व छोड़ दिया है और जिसकी बुद्धि उत्तम है ऐसा वह साधु अपने मन, वचन, कायको अपने भिन्न अनभव करता हआ अपने मनकी प्रवत्ति पञ्चपरमेष्ठियोंके चरणोंमें लगावे और इस प्रकार जीवनके अन्तमें योगनिर्वाण साधनको अपने आधीन करे-स्वीकार करे ॥१८७-१८८॥ योग नाम समाधिका है उस समाधिके द्वारा चित्तको जो आनन्द होता है उसे निर्वाण कहते हैं, चूंकि यह योगनिर्वाण इष्ट पदार्थोका साधन है-इसलिये इसे योगनिर्वाण साधन कहते हैं ॥१८९॥ यह बत्तीसवीं योगनिर्वाण साधनक्रिया है। १ तद् ध्यानम् अर्थप्रयोजनं यस्य । २ प्रथम भावना। ३ भव्याङकल-ल०, द०। ४ संश्रयेद् अ०, प०, स०। देहमनोवाक्त्रयस्य । ५ संन्यासे । ६ कृतादरः । ७हिरुग्भतात्मकान् स्वतः ट० । पृथग्भूतस्वरूपकान् । ८ एकाग्रं कृत्वा । ६ पञ्चपदेषु । १० चित्ताहादः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002723
Book TitleMahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages568
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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